जानें कैसे विरोध के बावजूद गांधी ने पूरा किया हरिजन दौरा

सनातनियों के लाख विरोध के बावजूद भी गांधी ने पूरा किया हरिजन दौरा।

शिव कुमार शुक्ला

महात्मा गांधी ने भारत में अस्पृश्यता मिटाने के लिए लगातार दस महीने (7 नवंबर, 1933 से 2 अगस्त, 1934 तक) की एक लंबी यात्रा की थी, जिसे ‘हरिजन दौरा’ के नाम से जाना जाता है।

बारह हजार पांच सौ मील की इस यात्रा में उन्होंने न केवल भरपूर जन-जागृति पैदा की, बल्कि हरिजन कल्याण कोष के लिए 8 लाख रुपये भी एकत्रित किए।

गांधी की इस यात्रा से पूरे देश के कुछ मूढ़मति कथित सनातनी बौखला गए थे। उन्होंने गांधी पर झूठे व्यक्तिगत आरोपों की बौछार शुरू कर दी। गांधी के बारे में बेहूदे आरोपों और गालियों से भरे परचे छपवाकर बांटे जाने लगे।

गांधी के इस दौरे में शायद ही कोई ऐसा शहर बचा होगा, जहाँ इन कथित सनातनियों ने उन्हें काले झंडे न दिखाए हों। 19 जून, 1934 को जब गांधी पुणे स्टेशन पर पहुँचे, तो ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे के साथ उन्हें काला झंडा दिखाया गया।

25 जून की शाम को जिस कार से गांधी जानेवाले थे, उसपर किसी अज्ञात हमलावर ने बम फेंका। संयोग से गांधी उस कार में नहीं थे, लेकिन उस बम विस्फोट में दो कांस्टेबल समेत सात लोग बुरी तरह घायल हो गए।

इस दौरे में गांधी का विरोध करनेवाले कथित सनातनियों में एक पंडित लालनाथ बढ़-चढ़कर आगे रहते थे। 5 जुलाई, 1934 को अजमेर में जिस मंच से गांधी बोलने वाले थे, उसी मंच पर चढ़कर लालनाथ ने हरिजन आंदोलन के विरोध में भाषण देना चाहा।

इससे नाराज होकर किसी ने उनपर लाठी से हमला कर दिया। सभा में पहुँचने पर गांधी को इस बात की जानकारी मिली।

गांधीजी ने लालनाथ पर हमले की निंदा की और लालनाथ को अपनी बात कहने के लिए फिर से उसी मंच पर बुलाया। इसके प्रायश्चित्त के तौर पर गांधी ने सात दिन के उपवास की घोषणा की थी।

24 मार्च, 1931 को गांधी जैसे ही कराची के पास मालीर स्टेशन पर पहुँचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की। वे ‘गांधीवाद का नाश हो’ और ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगा रहे थे।

गांधी ने स्वयं आगे बढ़कर काले फूलों की वह माला अपने हाथों से स्वीकार की थी। गांधी को काला झंडा दिखानेवाले किसी भी व्यक्ति पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की गई। एक वह दौर भी था।

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