अनुकम्पा के आधार पर पति की नियुक्ति पुनर्विवाह का उसका मौलिक अधिकार नहीं छीनेगी : इलाहाबाद हाईकोर्ट

⚫इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले माह व्यवस्था दी कि अपनी पत्नी की मौत के बाद उसकी जगह अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पाने वाले पति (याचिकाकर्ता) को पुनर्विवाह करने से नहीं रोका जा सकता।

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल ने व्यवस्था दी,

?”महज इसलिए कि याचिकाकर्ता को अनुकम्पा के आधार पर नियुक्ति प्रदान की गयी थी, उसे अपने पूर्ववर्ती जीवन साथी की मौत के बाद पुनर्विवाह के मौलिक अधिकार से वंचित रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा,

“किसी व्यक्ति को इस आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता और न ही उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।”

कोर्ट के समक्ष मामला

?याचिकाकर्ता (पति) को उसकी पत्नी की मौत के बाद अनुकम्पा के आधार पर नौकरी दी गयी थी। याचिकाकर्ता अपनी पत्नी की छोटी बहन (साली) से शादी करने का इच्छुक था, इसलिए उसने बेसिक शिक्षा अधिकारी से पुनर्विवाह की इजाजत मांगी थी।

कोर्ट के समक्ष सरकारी वकील ने दलील दी कि किसी कर्मचारी के पुनर्विवाह के लिए उसे किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट का निष्कर्ष

?कोर्ट ने उत्तर प्रदेश रिक्रूमेंट ऑफ डिपेंडेंट्स ऑफ गवर्नमेंट सर्वेंट डाइंग इन हार्नेस रूल्स, 1974 के नियम पर विचार किया और पाया कि इस नियम में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पाने वाले व्यक्ति को पुनर्विवाह के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है।

कोर्ट ने कहा,

?”इसमें केवल इस बात का उल्लेख किया गया है कि अनुकम्पा के आधार पर नियुक्त व्यक्ति मृत सरकारी नौकर के परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करेगा, अन्यथा उसकी सेवा समाप्त हो सकती है।”

इस प्रकार कोर्ट ने कहा,

“कानून में इस बात के प्रावधान नहीं हैं कि किसी व्यक्ति के पुनर्विवाह के लिए नियोक्ता से अनुमति की आवश्यकता होती है।”

?कोर्ट ने ‘श्रीमती संतोषी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य, रिट-ए नंबर 834 / 2020’ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि “अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का ही आंतरिक हिस्सा है।”

अंत में, कोर्ट ने कहा,

?”कानून के दायरे में उस कर्मचारी को पुनर्विवाह के उद्देश्य से बेसिक शिक्षा अधिकारी से अनुमति मांगने की वैधानिक जरूरत नहीं होती है, जिन्हें अनुकम्पा के आधार पर नियुक्त किया गया हो, ऐसे में मेरा मत है कि याचिकाकर्ता ने इस कोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल बेवजह किया है।”

केस का नाम : मोहम्मद हैदर बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य [रिट – ए नंबर – 8797 / 2020]

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