विज्ञापनों में चमकता भारत, हकीकत में जूझता आम आदमी, विकास के दावों पर बड़े सवाल!

राजू यादव
राजू यादव

देश में विकास की चमकदार तस्वीर विज्ञापनों, बड़े-बड़े होर्डिंग और सरकारी उपलब्धियों के दावों में खूब दिखाई देती है, लेकिन जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े करती है। एक तरफ आर्थिक तरक्की और डिजिटल क्रांति की बातें हैं, तो दूसरी तरफ आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी, महंगे मोबाइल रिचार्ज और घटती बचत से जूझ रहा है। नोटबंदी से लेकर कोरोना और महंगाई तक के अनुभवों ने आम नागरिक के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। आखिर विकास की इस चमक का लाभ किसे मिल रहा है और आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया है? क्या देश की तरक्की का पैमाना सिर्फ विज्ञापन होंगे या जनता की खुशहाली भी?विज्ञापनों का भारत और हकीकत का भारत: चमकते होर्डिंग के पीछे संघर्ष करता आम आदमी।

देश में विकास की तस्वीर और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी के बीच बढ़ती दूरी आज एक गंभीर बहस का विषय है। एक तरफ अखबारों के पूरे पन्ने, टेलीविजन स्क्रीन और शहरों के बड़े-बड़े होर्डिंग विकास की चमकदार तस्वीर पेश करते हैं, तो दूसरी तरफ आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और घटती क्रय शक्ति जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। सवाल यह है कि क्या किसी देश की तरक्की का आकलन केवल विज्ञापनों, बड़े-बड़े दावों और चमकदार प्रचार अभियानों से किया जा सकता है? या फिर विकास की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि आम आदमी की जिंदगी कितनी आसान हुई, उसकी आमदनी कितनी बढ़ी और उसे रोजगार, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं कितनी सुलभ हुईं? इसी विरोधाभास को दो भारत की तस्वीर के रूप में देखा जा सकता है। एक भारत प्रचार और उपलब्धियों की चमक में दिखाई देता है, जबकि दूसरा भारत रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करता नजर आता है।

मोबाइल क्रांति से नोटबंदी तक: आम आदमी की जेब पर बढ़ता बोझ

एक समय था जब भारतीय दूरसंचार बाजार में कई कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा थी। नोकिया, सैमसंग, माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा और सोनी एरिक्सन जैसे ब्रांड मोबाइल बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे। वहीं टेलीकॉम क्षेत्र में एयरटेल, आइडिया, वोडाफोन, रिलायंस, टाटा डोकोमो, यूनिनॉर, एमटीएस और बीएसएनएल जैसे कई विकल्प मौजूद थे। सस्ती कॉल दरों और कम कीमत वाले रिचार्ज ने मोबाइल को आम आदमी की पहुंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टाटा डोकोमो की एक पैसा प्रति सेकंड कॉल दर जैसी योजनाओं ने प्रतिस्पर्धा को नई दिशा दी थी।

आज दूरसंचार बाजार की तस्वीर बदल चुकी है। कंपनियों की संख्या और बाजार में प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदलने के साथ रिचार्ज योजनाओं की कीमतों में भी समय-समय पर वृद्धि हुई है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि बाजार में केवल दो कंपनियां रह गई हैं। TRAI के मार्च 2025 के आंकड़ों के अनुसार जियो की बाजार हिस्सेदारी 40.60 प्रतिशत, एयरटेल की 33.69 प्रतिशत, वोडाफोन आइडिया की 17.75 प्रतिशत और बीएसएनएल की 7.87 प्रतिशत थी। यानी निजी कंपनियों का दबदबा जरूर है, लेकिन सरकारी बीएसएनएल भी बाजार में मौजूद है। Telecom Regulatory Authority of India+1 यहां असली सवाल यह है कि डिजिटल क्रांति के दौर में मोबाइल और इंटरनेट आम नागरिक के लिए कितने किफायती बने हुए हैं? क्या दूरसंचार सेवाओं की कीमतों में वृद्धि के साथ आम आदमी की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी है?

नोटबंदी के आठ साल बाद भी बहस जारी

8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने का फैसला किया था। सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली मुद्रा और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने जैसे उद्देश्य बताए थे। इस फैसले से उस समय प्रचलित मुद्रा के मूल्य का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ था। लेकिन बाद में भारतीय रिजर्व बैंक की 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट में सामने आया कि नोटबंदी के दौरान वापस ली गई मुद्रा का लगभग 99.3 प्रतिशत हिस्सा बैंकिंग प्रणाली में लौट आया। इस आंकड़े ने नोटबंदी के जरिए काले धन पर कार्रवाई के परिणामों को लेकर नई बहस खड़ी कर दी। Reserve Bank of India+1

नोटबंदी के दौरान छोटे दुकानदारों, दिहाड़ी मजदूरों, किसानों और नकदी पर निर्भर कारोबारियों को नकदी की कमी और लेनदेन संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। इसके आर्थिक प्रभाव और छोटे कारोबारों पर पड़े असर को लेकर आज भी अलग-अलग मत हैं। सवाल यह है कि इस बड़े आर्थिक फैसले से आम आदमी और छोटे कारोबारियों को दीर्घकाल में कितना लाभ मिला?

कोरोना महामारी ने व्यवस्था की परीक्षा ली

इसके बाद कोरोना महामारी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों का पलायन, रोजगार का संकट, अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन की कमी तथा परिवारों की आर्थिक परेशानियां देश ने देखीं। थाली बजाने और दीप जलाने जैसे कार्यक्रमों ने महामारी के दौरान एकजुटता का संदेश दिया, लेकिन इन प्रतीकात्मक आयोजनों के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं, आर्थिक सहायता और प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा के सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। महामारी ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी देश की मजबूती का आकलन केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि संकट के समय नागरिकों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा से भी होना चाहिए।

READ ALSO : महंगाई से आम आदमी बेहाल, मीडिया की बहस में क्यों गायब हैं रोटी और रोजगार के सवाल?

महंगाई और रोजगार: आम आदमी की सबसे बड़ी चिंता

महंगाई का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल-डीजल की कीमतों से परिवहन महंगा होता है, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से घरेलू बजट बिगड़ता है और शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च परिवारों की बचत को प्रभावित करता है। दूसरी ओर रोजगार की गुणवत्ता, नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा भी बड़ी चुनौतियां हैं। सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। हालांकि बेरोजगारी दर के साथ रोजगार की गुणवत्ता, वेतन, कार्य की स्थिरता और श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा को भी समझना जरूरी है। June, 2024] आम नागरिक का सवाल सीधा है: यदि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है तो उसकी आय, बचत और जीवन स्तर में उस विकास का लाभ कितना पहुंच रहा है?

अमीरी की चमक और गरीब की जरूरतों के बीच दूरी

देश में आर्थिक विकास के साथ संपत्ति और अवसरों के वितरण पर भी चर्चा जरूरी है। एक तरफ बड़े उद्योग, बुनियादी ढांचा और निवेश अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं, तो दूसरी तरफ छोटे कारोबारी, किसान, मजदूर और मध्यम वर्ग अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझते हैं।

एयरपोर्ट, बंदरगाह, ऊर्जा, सीमेंट, स्टील और अन्य क्षेत्रों में बड़े कारोबारी समूहों की बढ़ती भूमिका के बीच प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और समान अवसरों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार की नीतियों का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उनका लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस सीमा तक पहुंच रहा है। विकास का अर्थ केवल बड़े निवेश और कंपनियों की सफलता नहीं, बल्कि छोटे उद्यमों का विस्तार, युवाओं को रोजगार और आम परिवारों की आर्थिक मजबूती भी है।

विज्ञापनों की डोली और जनता के कंधों पर बढ़ता बोझ

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए गांवों की एक पुरानी तस्वीर याद आती है। जब किसी गांव में डोली निकलती थी तो कहार आवाज लगाते थे—’हो-हो-हो, रास्ता छोड़ो।’ डोली में बैठी दुल्हन आराम से आगे बढ़ती थी, जबकि उसे उठाने का पूरा बोझ कहारों के कंधों पर होता था। आज इस तस्वीर को एक रूपक के तौर पर देखा जा सकता है। डोली की जगह विकास के बड़े-बड़े विज्ञापन और प्रचार अभियान हैं, जबकि उन्हें वास्तविकता में सफल बनाने का बोझ आम जनता के कंधों पर है।

जनता महंगाई से राहत मांग रही है, युवा रोजगार की तलाश में हैं, किसान अपनी उपज का उचित मूल्य चाहते हैं और मध्यम वर्ग अपनी बचत बचाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ हर तरफ विकास की उपलब्धियों का प्रचार दिखाई देता है। सवाल यह नहीं है कि विकास के विज्ञापन क्यों दिए जा रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली उपलब्धियों का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंच रहा है?

विकास का मूल्यांकन विज्ञापनों से नहीं, जनता की जिंदगी से हो

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार को अपनी उपलब्धियां बताने का अधिकार है, लेकिन जनता को उन उपलब्धियों का हिसाब मांगने का भी पूरा अधिकार है। विपक्ष का दायित्व है कि वह जनहित के मुद्दों को उठाए और मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सरकार तथा विपक्ष दोनों से जवाबदेही सुनिश्चित करे। नोटबंदी, कोरोना प्रबंधन, महंगाई, रोजगार, दूरसंचार सेवाओं की कीमतें और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर भावनाओं के बजाय तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए।

देश को मजबूत बनाने के लिए उद्योगपतियों का विकास भी जरूरी है और छोटे कारोबारियों का संरक्षण भी। बड़े उद्योगों में निवेश भी जरूरी है और युवाओं के लिए रोजगार भी। डिजिटल क्रांति भी जरूरी है और उसकी सेवाओं का आम आदमी की पहुंच में रहना भी। आखिर विकास का असली चेहरा वह नहीं है, जो विज्ञापन में दिखाई देता है, बल्कि वह है जो आम आदमी की जिंदगी में दिखाई देता है।

जब तक किसान की आमदनी, मजदूर की मजदूरी, युवा का रोजगार, बच्चे की शिक्षा और गरीब का इलाज विकास की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं होंगे, तब तक चमकदार प्रचार और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर बहस का विषय बना रहेगा। देश को विज्ञापनों में विश्वगुरु दिखाने से ज्यादा जरूरी है कि देश का आम नागरिक सम्मान, सुरक्षा, रोजगार और बेहतर जीवन के साथ आगे बढ़े। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल विज्ञापन देखने वाली दर्शक नहीं, बल्कि विकास की असली हिस्सेदार है।

किसी देश की वास्तविक तरक्की बड़े-बड़े विज्ञापनों, चमकदार होर्डिंग और नारों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के जीवन में आए बदलाव से तय होती है। किसान की आमदनी, मजदूर की मजदूरी, युवा का रोजगार, बच्चों की शिक्षा और गरीब का इलाज ही विकास की असली कसौटी हैं। सरकार अपनी उपलब्धियां बताए, विपक्ष सवाल उठाए और मीडिया तथ्यों के साथ जनता की आवाज बने, यही लोकतंत्र की सार्थकता है। क्योंकि भारत की असली चमक विज्ञापनों में नहीं, बल्कि आम आदमी के चेहरे की मुस्कान, उसकी भरी हुई थाली और सुरक्षित भविष्य में दिखाई देनी चाहिए।

Related Articles

Back to top button