सात राज्यों में चुनावी महासंग्राम, 2029 से पहले मोदी-विपक्ष की बड़ी परीक्षा!

सात राज्यों की चुनावी जंग, 2029 से पहले मोदी-विपक्ष की अग्निपरीक्षा। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सात राज्यों की चुनावी जंग देश की राजनीति के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। इन चुनावों में NDA और INDIA गठबंधन की रणनीति, सियासी ताकत और जनसमर्थन की परीक्षा होगी। सवाल है—क्या ये चुनाव 2029 की राजनीति की दिशा तय करेंगे?

स्वदेश कुमार
स्वदेश कुमार

देश की राजनीति में 2029 का लोकसभा चुनाव दूर है, लेकिन उसकी पटकथा 2027 में लिखी जाएगी। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश की 940 विधानसभा सीटें तथा उनसे जुड़ी 132 लोकसभा सीटें सत्ता की ताकत और विपक्ष की विश्वसनीयता परखेंगी। यह केवल सात मुख्यमंत्रियों का चुनाव नहीं, नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय पकड़, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व, अखिलेश यादव के पीडीए और कांग्रेस की प्रासंगिकता की परीक्षा भी है। इन राज्यों की 940 सीटों में भाजपा के पास 557 विधायक हैं। सहयोगियों के 47 और समर्थन दे रहे 12 निर्दलीयों को जोड़ें तो एनडीए की संख्या 616 है। कांग्रेस के 98 और आम आदमी पार्टी के 101 विधायक हैं, जिनमें अधिकांश पंजाब से हैं। पांच राज्यों में भाजपा, हिमाचल में कांग्रेस और पंजाब में आप की सरकार है। 2024 में भाजपा लोकसभा में 240 सीटों पर सिमटी और केंद्र में सहयोगियों पर निर्भर हुई।

सबसे बड़ा रण उत्तर प्रदेश में होगा। 403 सीटों वाले राज्य में 2022 में भाजपा ने 255 और सपा ने 111 सीटें जीती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली: सपा 37 सीटों पर पहुंची, भाजपा 33 पर रही और कांग्रेस ने छह सीटें जोड़ीं। यह भाजपा के लिए चेतावनी थी कि मंदिर, राष्ट्रवाद और संगठन के बावजूद स्थानीय असंतोष वोट में बदल सकता है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, महंगाई, किसान और सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल चुनावी बहस में रहेंगे। योगी सरकार कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे को उपलब्धि बताएगी; विपक्ष पूछेगा कि इनका लाभ किसे मिला। योगी आदित्यनाथ के सामने सत्ता बचाने के साथ लगातार तीसरी बार भाजपा को जीत दिलाने की चुनौती है। हार या कमजोर बहुमत भाजपा के भीतर नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों पर सवाल खड़े करेगा। हिंदुत्व और सख्त प्रशासन का संदेश कितना असरदार है, इसका फैसला रोजगार, महंगाई और स्थानीय नाराजगी के बीच होगा। भाजपा को उम्मीदवार चयन, सहयोगियों का सम्मान और बूथ स्तर की शिकायतें संभालनी होंगी।

अखिलेश यादव के लिए 2027, 2024 की बढ़त को स्थायी जनाधार में बदलने की परीक्षा है। पीडीए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक ने सपा को नई सामाजिक भाषा दी और लोकसभा में भाजपा से आगे पहुंचाया। पिछड़ों के भीतर हिस्सेदारी, दलितों का भरोसा, मुस्लिम प्रतिनिधित्व, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और बूथ प्रबंधन निर्णायक होंगे। अखिलेश को साबित करना होगा कि पीडीए केवल चुनावी गणित नहीं, शासन का ठोस कार्यक्रम है। कांग्रेस के सामने उत्तर प्रदेश में कमजोर संगठन और बड़ी महत्वाकांक्षा का विरोधाभास है। दो विधायकों वाली पार्टी बहुत अधिक सीटें मांगेगी तो सपा से टकराव बढ़ेगा; कम सीटों पर समझौता करेगी तो कार्यकर्ताओं को जवाब देना होगा। 2024 का गठबंधन विधानसभा में उसी तरह वोट हस्तांतरित करा पाएगा, यह तय नहीं। कांग्रेस को सीटों की सौदेबाजी से आगे बढ़कर स्थानीय नेतृत्व, बूथ संगठन और स्पष्ट मुद्दों पर काम करना होगा।

182 सीटों में 2022 में पार्टी ने रिकॉर्ड 156, कांग्रेस ने 17 और आप ने पांच सीटें जीती थीं। रोजगार, किसान, आदिवासी क्षेत्र और स्थानीय नेतृत्व के सवाल विपक्ष के अवसर बन सकते हैं। कांग्रेस को विश्वसनीय चेहरा और जमीनी मौजूदगी चाहिए; आप को पिछला प्रदर्शन दोहराने से आगे बढ़ना होगा। पंजाब में आप के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है। 2022 में उसने 117 में से 92 सीटें जीती थीं। अब कानून-व्यवस्था, नशा, कृषि, कर्ज, रोजगार और राज्य की वित्तीय स्थिति पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सात और आप ने तीन सीटें जीतीं। अकाली दल की वापसी और भाजपा का विस्तार भी समीकरण बदल सकते हैं। आप के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष का हमला नहीं, अपने विशाल जनादेश से पैदा हुई अपेक्षाओं का बोझ है।

उत्तराखंड में भाजपा ने 2022 में 70 में से 47 सीटें जीतकर सत्ता परिवर्तन की परंपरा तोड़ी थी। अब पलायन, रोजगार, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण और समान नागरिक संहिता पर बहस होगी। गोवा में 40 सीटों की लड़ाई में दलबदल और राजनीतिक विश्वसनीयता बड़े सवाल हैं। 2022 में भाजपा 20 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी; बाद में कांग्रेस के आठ विधायक उसके साथ चले गए। मणिपुर को सामान्य सत्ता संघर्ष की तरह पढ़ना संवेदनहीनता होगी। मई 2023 में शुरू हिंसा में 250 से अधिक लोगों की मौत और हजारों के विस्थापन ने राज्य को गहरी चोट पहुंचाई। मुख्यमंत्री बदलने और राष्ट्रपति शासन के बाद नई सरकार बनने से संकट खत्म नहीं हुआ। कुकी-जो समुदाय की अलग प्रशासन की मांग, घाटी-पहाड़ का अविश्वास, सुरक्षा और पुनर्वास चुनावी घोषणापत्र से बड़े सवाल हैं। भाजपा को सीटों से आगे शांति और भरोसे की राह दिखानी होगी।

हिमाचल में कांग्रेस सरकार के सामने सत्ता बचाने के साथ आर्थिक दबाव और चुनावी वादे पूरे करने की चुनौती होगी। इसलिए सातों राज्यों के नतीजों को एक ही राष्ट्रीय लहर का प्रमाण मानना भूल होगी। जुलाई 2027 के राष्ट्रपति चुनाव में नए विधायक मतदान करेंगे। उत्तर प्रदेश के एक विधायक के मत का मूल्य 208 है, जो देश में सबसे अधिक है। इसलिए यूपी का जनादेश केवल लखनऊ की सरकार नहीं, राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल का संतुलन भी प्रभावित करेगा। हालांकि इन चुनावों से केंद्र सरकार तत्काल नहीं गिरेगी; असर राजनीतिक मनोबल, गठबंधन की सौदेबाजी और 2029 की जमीन पर होगा।

हाल के विधान परिषद चुनावों ने दोनों खेमों को चेताया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा वाराणसी की शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटें सपा से हार गई, जबकि वहां नौ मंत्रियों और सात विधायकों ने प्रचार किया था। चार राज्यों की 28 सीटों में भाजपा ने 13 और एनडीए ने 16 जीतीं; कांग्रेस को नागपुर में एक जीत मिली और कर्नाटक की चारों सीटें गंवानी पड़ीं। इससे न भाजपा विरोधी लहर साबित होती है, न विपक्ष की वापसी। संदेश है कि संगठन के बावजूद स्थानीय नाराजगी रास्ता बना सकती है।

भाजपा के पास संसाधन, संगठन, नेतृत्व और सत्ता का लाभ है; विपक्ष के पास असंतोष, स्थानीय मुद्दे और क्षेत्रीय चेहरे। भाजपा के लिए अति आत्मविश्वास, टिकट वितरण और रोजगार जोखिम हैं। विपक्ष के लिए बिखराव, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और वोट हस्तांतरण सबसे बड़ी बाधाएं हैं। यदि विपक्ष हर राज्य में अलग रणनीति और भरोसेमंद गठबंधन बनाएगा तो मुकाबला कठिन होगा; केवल भाजपा विरोध को एकता समझेगा तो अवसर गंवाएगा।2027 किसी एक नेता की लोकप्रियता का जनमत संग्रह नहीं होगा। मतदाता सरकारों के काम, उम्मीदवारों, सामाजिक प्रतिनिधित्व, सुरक्षा, रोजगार और रोजमर्रा के अनुभव पर फैसला करेगा। भाजपा को 2024 की चेतावनी याद रखनी होगी और विपक्ष को अपनी पिछली जीत को स्थायी विजय नहीं मानना चाहिए। 940 सीटें सत्ता पक्ष को ताकत परखने और विपक्ष को विश्वसनीयता साबित करने का मौका देंगी। 2029 की राह उसी की आसान होगी जो नारों से आगे बढ़कर जनता के सवालों का जवाब देगा।

Related Articles

Back to top button