राष्ट्रीय त्योहार पर विरोध: असहमति, गरिमा और लोकतांत्रिक मर्याद

डॉ.सत्यवान सौरभ

राष्ट्रीय त्योहार किसी भी देश के लिए केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे नागरिक भावनाओं, सामूहिक स्मृति और राज्य की संवैधानिक गरिमा के प्रतीक भी होते हैं। ऐसे अवसरों पर यदि कोई समूह अपनी बात रखता है, तो उसे केवल भावनात्मक नजरिए से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि विरोध का अधिकार असीमित नहीं होता। जब विरोध हिंसा, पथराव, बाधा, अपमान या सार्वजनिक अव्यवस्था का रूप ले लेता है, तब वह लोकतांत्रिक असहमति की सीमा से बाहर चला जाता है। इसी संतुलन को समझना आज सबसे जरूरी है।

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में असहमति कोई अपवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है। किसान आंदोलन हों, छात्र आंदोलनों की आवाज़ हो, श्रमिकों की मांगें हों या किसी स्थानीय हत्याकांड और प्रशासनिक उपेक्षा के विरुद्ध जनाक्रोश—इन सबका एक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ होता है। यह मान लेना कि हर विरोध राष्ट्र-विरोधी मानसिकता का परिणाम है, एक खतरनाक सरलीकरण होगा। लोकतंत्र में नागरिक इसलिए सवाल उठाते हैं क्योंकि वे व्यवस्था से संबंध बनाए रखना चाहते हैं, उसे तोड़ना नहीं। यदि व्यवस्था समय पर जवाब दे, न्याय दे और संवाद बनाए रखे, तो विरोध टकराव में बदलने से पहले ही शांत किया जा सकता है।

इसी के साथ यह भी सच है कि राष्ट्रीय पर्वों के दिन विरोध का तरीका और स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस केवल सरकार के आयोजन नहीं, बल्कि देश की सामूहिक पहचान के अवसर हैं। यदि किसी आंदोलन की मांग वास्तविक है, तो उसे व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए; लेकिन यदि वह प्रदर्शन ऐसे समय और ऐसे ढंग से किया जाए जिससे सार्वजनिक समारोह बाधित हो, सुरक्षा खतरे में पड़े और शांति भंग हो, तो वह अपनी नैतिक वैधता खोने लगता है। लोकतंत्र केवल अधिकारों का नहीं, जिम्मेदारियों का भी ढांचा है। अधिकार की रक्षा तभी टिकाऊ होती है जब वह मर्यादा के साथ प्रयोग किया जाए।

यहां प्रशासन की भूमिका भी निर्णायक बनती है। राज्य का पहला कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन केवल बल प्रयोग कानून-व्यवस्था नहीं होता। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय से असंतोष है—जैसे किसी हत्याकांड की जांच, ग्रामीण इलाकों की उपेक्षा, किसानों की शिकायतें या स्थानीय समुदायों का अविश्वास—तो प्रशासन को पहले से संवाद करना चाहिए। बड़ी रैलियों, सरकारी समारोहों और संवेदनशील दिनों के लिए पूर्व-समन्वय, वार्ता, और वैकल्पिक प्रदर्शन-स्थल जैसी व्यवस्थाएं तनाव घटा सकती हैं। जब प्रशासन केवल अंतिम क्षण में सख्ती दिखाता है, तो कई बार स्थिति और बिगड़ जाती है। इसलिए शासन का लक्ष्य केवल भीड़ हटाना नहीं, भरोसा बहाल करना होना चाहिए।

विरोध का स्वरूप भी बहुत कुछ तय करता है। शांतिपूर्ण धरना, ज्ञापन, पदयात्रा, प्रतीकात्मक प्रदर्शन या मीडिया-संवाद लोकतांत्रिक दबाव के स्वीकृत तरीके हैं। लेकिन पथराव, तोड़फोड़, लाठीचार्ज की स्थिति पैदा करना या वाहन-आवागमन रोकना भीड़ को नागरिक नहीं रहने देता। ऐसे व्यवहार का बचाव नहीं किया जा सकता, चाहे उसके पीछे कितना भी वैध आक्रोश क्यों न हो। साथ ही, विरोधकारियों को भी यह समझना चाहिए कि जब वे सार्वजनिक सम्मान के मंच को निशाना बनाते हैं, तो वे अपनी मांगों के प्रति सहानुभूति को कमजोर करते हैं। मुद्दा जितना गंभीर होगा, तरीका उतना ही संयमित होना चाहिए।

दूसरी ओर, केवल विरोधकारियों को दोष देना भी उचित नहीं होगा। यदि जनता में बार-बार यह भावना बने कि उसकी शिकायतें अनसुनी हैं, कि न्याय में देरी है, कि स्थानीय प्रशासन सत्ता के संरक्षण में काम कर रहा है, तो आक्रोश स्वाभाविक है। लोकतंत्र में असंतोष का उभरना असफलता का प्रमाण नहीं, बल्कि सुधार की सूचना है। समस्या तब पैदा होती है जब शासन संस्थाएं इस संकेत को सुनने के बजाय उसे दमन का विषय बना देती हैं। इससे सामाजिक दूरी बढ़ती है और हर अगला विरोध अधिक तीखा होने लगता है। इसलिए राज्य को चाहिए कि वह केवल कानून के कठोर चेहरे के साथ नहीं, संवाद के मानवीय चेहरे के साथ भी उपस्थित हो।

राष्ट्रीय त्योहारों पर विरोध को “देश-विरोधी” कह देना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यह अक्सर हानिकारक होता है। यह शब्दावली समाज को दो खांचों में बांटती है—एक ओर “देशभक्त”, दूसरी ओर “देशद्रोही”—जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल होती है। कई बार असहमति देश के प्रति प्रेम से ही जन्म लेती है। नागरिक यह मानता है कि व्यवस्था सुधर सकती है, इसलिए वह विरोध करता है। यही लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन इस शक्ति की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब विरोध करने वाला पक्ष अपनी मर्यादा बनाए रखे और सत्ता पक्ष अपनी सहनशीलता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विरोध और राष्ट्रभावना को एक-दूसरे का विरोधी न मानें। राष्ट्रभावना का अर्थ केवल झंडा फहराना, नारे लगाना या प्रतीकों का सम्मान करना नहीं है। उसका गहरा अर्थ है—न्याय, समता, अनुशासन, पारदर्शिता और संवैधानिक आचरण। यदि कोई नागरिक किसी स्थानीय अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाता है, तो उसे सुनना राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा है। लेकिन यदि वह आवाज़ सार्वजनिक व्यवस्था को चोट पहुंचाती है, तो उसे भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। राष्ट्र की गरिमा और नागरिक अधिकारों के बीच यही संतुलन लोकतंत्र की असली कसौटी है।

इसलिए, राष्ट्रीय त्योहार पर विरोध का प्रश्न केवल भावनाओं का नहीं, शासन-प्रणाली की परिपक्वता का भी है। परिपक्व राज्य वह है जो असहमति से डरता नहीं, बल्कि उसे नियमों और संवाद के भीतर स्थान देता है। परिपक्व नागरिक वह है जो अपने हक़ के लिए खड़ा होता है, लेकिन देश की सामूहिक गरिमा को चोट नहीं पहुंचाता। और परिपक्व समाज वह है जो न हर विरोध को देश-विरोधी मानता है, न हर राष्ट्रीय प्रतीक-रक्षा को आलोचना से परे समझता है। यही संतुलन भारत के लोकतंत्र को मजबूत करेगा। यही संतुलन टकराव को संवाद में बदलेगा। और यही संतुलन राष्ट्रीय पर्वों को सचमुच जन-उत्सव बनाए रखेगा, न कि संघर्ष का मैदान।

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