
दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश इण्डोनेशिया है। वह भारत को लेकर पारिवारिक रिश्ते की घोषणा कर चुका है। इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने भारत के साथ इण्डोनेशिया के संबंधों का खूबसूरत उल्लेख किया है। इण्डोनेशिया की यात्रा पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वागत करते हुए राष्ट्रपति सुबियांतो ने आगे बढ़कर मोदी की प्रशंसा की है। भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष प्राचीन है। अपने जन्म स्थान भारत में इस संस्कृति और सभ्यता की जड़ें गहरी हैं। व्यवसायिक व अन्य कारणों से भारत छोड़कर विदेश में रहने वाले भारतीय सभ्यता और संस्कृति को लेकर स्वाभिमान अनुभव करते हैं। 28 करोड़ आबादी वाला इण्डोनेशिया भारतीय संस्कृति से भरा पूरा है। यहां लगभग 10000 उपासना स्थल व मंदिर हैं। श्रीराम इण्डोनेशिया की संस्कृति में छाए हुए हैं। पूरे देश के कोने कोने रामकथा होती रहती है।
इण्डोनेशिया और भारत के रिश्ते बहुत पुराने हैं। इण्डोनेशिया के लोग अपने अंतःकरण में भारत को अनुभव करते हैं। इण्डोनेशिया की हवाई सेवा का नाम गरुण एयरवेज रहा है। भारत में जो उपजिलाधिकारी प्रशासक होते हैं, इण्डोनेशिया में उन्हें महिपाल कहते हैं। इण्डोनेशिया के लोग विजयादशमी, होली आदि भारतीय त्योहारों का आनंद लेते हैं। इण्डोनेशिया में रामलीला होती है। और उसके अधिकांश पात्रों का मजहब इस्लाम होता है। इण्डोनेशिया के लोग मानते हैं कि वे धर्म से और मजहब से इस्लामी हैं, लेकिन संस्कृति से भारतीय हैं। यही संस्कृति इण्डोनेशिया और भारत का एकात्मक स्वरूप गढ़ती है।
प्रधानमंत्री के इस दौरे में स्वाभाविक ही दोनों पक्ष बढ़ चढ़ कर एक दूसरे की आवभगत कर सकते थे। लेकिन यहां बात कुछ दूसरी ही थी। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने अपना डीएनए टेस्ट करवाया है। और पाया है कि उनका डीएनए भारतीय है। यही कारण है कि वे भारतीय संगीत सुनते समय शरीर को थिरकता हुआ पाते हैं। बात सही भी है। अपनी जड़ों से जुड़ना सबको आनंदित करता है। इण्डोनेशिया की संस्कृति और भारत की संस्कृति की जड़ें एक हैं। इन जड़ों को सींचते रहना सबका दायित्व है। जैसे जड़ से सूखे पेड़ पर फूल नहीं खिलते। उन पर पक्षी गीत नहीं गाते। पाकिस्तान को ही लीजिए पाकिस्तान और भारतीय संस्कृति की जड़ें एक हैं। इस सभ्यता का विकास सिन्धु और सरस्वती नदियों की जड़ों से निकला है। पाकिस्तान अपनी मूल संस्कृति से पृथक है। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने भारत को दो देश माना था। मजहब के आधार पर देश बनाने से राष्ट्रीय क्षति हुई है।
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पाकिस्तानी भूभाग में उदासी रहती है। नदियां उदास होकर बहती हैं। मजहबी कट्टरपंथ के कारण पाकिस्तान आतंकवाद की यूनिवर्सिटी बन चुका है। वे संस्कृति सत्य स्वीकार नहीं करते। यह संस्कृति हजारों वर्ष के साहचर्य से विकसित हुई है। पूर्वजों ने दीर्घकाल के अनुभवों के आधार पर इसे बड़े प्यार से गढ़ा है। दर्शन और विज्ञान ने इस सांस्कृतिक अभियान का नेतृत्व किया है। यहां हजारों वर्ष प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता है। वैदिक काल के पूर्व के समाज में संपूर्ण मनुष्यता के प्रति एक प्रेमपूर्ण प्रवाह है। ऋग्वेद में उसकी झलक मिलती है। फिर उत्तर वैदिक काल में भी वही सांस्कृतिक निरंतरता प्रकट होती है। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने कहा है कि, ”हमारी सभ्यता और संस्कृति पर भारतीय सभ्यता का गहरा प्रभाव है।” उन्होंने बताया है कि, ”उनकी भाषा का लगभग पचास प्रतिशत हिस्सा संस्कृत से आया है। हमारे बहुत से नाम संस्कृत में हैं, इसलिए हमारे बीच ऐसी स्वाभाविक निकटता है।”
संस्कृति का निर्माण दीर्घकाल में होता है। प्रकृति प्रतिपल नया गढ़ती है। मनुष्य प्रकृति के सत्य, शिव और सुंदर को अंगीकृत करते हैं। ऐसे ही मनुष्य संस्कृति गढ़ते हैं। भारतीय संस्कृति का यह प्रवाह और प्रभाव भौगोलिक नहीं था। यह आर्याना में भी व्याप्त थी। आर्याना ही आज ईरान है। यही गांधार में प्रवाहित थी। कौरव वंशी राजा धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहीं की थीं। यही गांधार आज का अफगानिस्तान है। यह खोतान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार, श्याम (थाईलैंड), कम्बोडिया, चम्पा और मलेशिया तक व्याप्त रही। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। कभी वह भी हिन्दू सांस्कृतिक क्षेत्र था। इंडोनेशिया आज भी अपनी पुरानी सांस्कृतिक परम्परा से अनुरक्त हैं। फिलीपाइन्स, तिब्बत, बेरूबाड़ी तीन बीघा क्षेत्र तक व्याप्त यही हिन्दू संस्कृति महर्षि और्व के क्षेत्र अरब में भी प्रवाहित थी। जापान, कोरिया, मंगोलिया, साइबेरिया, इंग्लैंड, आयरलैंड, इटली, ग्रीस, मिस्र और आस्ट्रेलिया जैसे राज्य-क्षेत्र भी इस संस्कृति के उपासक रहे। दक्षिण अफ्रीका, फिजी, मारीशस, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनीडाड आदि देशों में इसका प्रभावक्षेत्र सुविदित है। बेशक किन्हीं खास भौगोलिक सीमाओं में ही संस्कृति का विकास होता है। देश, राष्ट्र या राज्य जैसी सीमाएँ संस्कृतिबोधक नाम पाती हैं पर दुनिया के सभी क्षेत्रों/देशों/राज्यों की संस्कृति दर्शन, विचार-शैली, काव्य-साहित्य और विभिन्न कलाओं के रूप में ही प्रकट होती है।
भारतीय संस्कृति का अध्ययन भी इसी सामग्री के आधार पर किया जाना चाहिए। ऋग्वेद दुनिया का प्राचीन साहित्य, काव्य, समाजशास्त्र और तत्कालीन समाज-संस्कृति का दर्पण है। समूचा वैदिक साहित्य लोकमंगल की कामना है। इसमें सामाजिक संगठन के साथ-साथ अकरणीय-करणीय के सूत्र भी हैं। यहाँ शरीरविज्ञान, नक्षत्रविज्ञान, जंतुविज्ञान, वनस्पतिशास्त्र, भौतिकी, रासायनिकों का विवेचन है। अणुविज्ञान के विश्लेषण की भी समझदारी है। उपनिषद सृष्टि रचना के आदितत्त्व की खोजबीन करते हैं और इन्हें पूरी मानवता के सत्यखोजी बताते हैं। पुराण लोकजीवन को संगठित करने और प्राचीन ज्ञान से फायदा उठाने के साथ-साथ लगातार सत्यखोजी बने रहने की प्रेरणा देते हैं। रामायण और महाभारत महाकाव्य हैं, इतिहास भी हैं। वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में स्वविवेक से जीवनयापन की प्रेरणा देते हैं।
प्रकृति प्रसाद है, विकृति विषाद है लेकिन संस्कृति महाप्रसाद है। संस्कृति का निर्माण अचानक नहीं होता। राष्ट्र के सभी अंगभूत घटक एक स्वर, एक लय, एक प्रीति, एक छंद और एक रस में स्पंदित होकर अपनी संस्कृति गढ़ते हैं। संस्कृति सभी राष्ट्रजनों के दर्शन, भाषा, धर्म, कला, संवेदना, आशा, निराशा, प्रतीति, अनुभूति, धीरज, साहस और संयम मर्यादा का अंतस होती है। भारत की संस्कृति हजारों वर्षों की तप-साधना के बाद बनी। सर जान मार्शल ने भी बताया, “अनेक प्रमाणों में भारत में एक अत्यंत विकसित संस्कृति की उपस्थिति का पता चलता है। इसके पीछे अवश्य ही भारत की धरती पर लम्बा इतिहास होना चाहिए।“ भारतीय संस्कृति दीर्घकालीन तर्क, अनुभव और दर्शन का सुफल है।



