सीतापुर जेल का हाल बेहाल, अधीक्षक मस्त, बंदी त्रस्त, व्यवस्था ध्वस्त! सीतापुर अधीक्षक का मातहतों पर कोई नियंत्रण नहीं। डीआईजी के लचर रवैए से बेलगाम हुए जेल अफसर। जेल प्रशासन की अवैध वसूली और उत्पीड़न से बंदी त्रस्त।.
राकेश यादव
लखनऊ। नई जेल अधीक्षक को आए अभी छह माह भी नहीं हुए कि सीतापुर जेल का हाल बेहाल हो गया है। अधीक्षक का मातहत अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। शिथिल नियंत्रण की वजह से जेल में बंदियों का जमकर शोषण और दोहन किया जा रहा है। मारपीटकर की जा रही अवैध वसूली से बंदियों में खासा आक्रोश व्याप्त है। आलम यह है कि जेल प्रशासन की दहशत कारण बंदी उत्पीड़न के इस गंभीर मामले पर चुप्पी साधे हुए है। उधर लखनऊ परिक्षेत्र के उप महानिरीक्षक (डीआईजी) जेल को जेल प्रशासन की तानाशाही और बंदियों का उत्पीड़न दिखाई ही नहीं पड़ रहा है।
मिली जानकारी के मुताबिक अधीक्षक सुरेश कुमार के सेवानिवृत होने के बाद काफी दिनों तक यह जेल अधीक्षक विहीन रही। सूत्रों का कहना है कि आगरा जेल में बतौर सहायक अधीक्षक के पद पर तैनात प्रीति यादव ने शासन में जुगाड और सेटिंग गेटिंग के बल पर सत्र से पूर्व अपना तबादला सीतापुर जेल पर बतौर अधीक्षक करा लिया। सूत्रों की माने तो जेल का प्रभार ग्रहण करने के कुछ समय बाद से ही जेल में मातहतों के माध्यम से बंदियों का शोषण और उत्पीड़न करवाना शुरू कर दिया।
सीतापुर पिछड़ा जिला है। जेल में गरीब बंदियों संख्या अधिक है। सूत्रों बताते है कि जेल में बंदियों से मुलाहिजा, हाता, मशक्कत, बैठकी, गिनती कटवाने के नाम पर मनमानी वसूली की जा रही है। यही नहीं बंदियों के साथ ही साथ बंदियों के परिजनों का भी शोषण किया जा रहा है। मुलाकात कराने के नाम पैसा नहीं देने वाले परिजनों को यह कहकर वापस कर दिया जाता है कि मुलाकात ड्यू (सप्ताह में निर्धारित मुलाकातें पूरी होने पर)नहीं है अगले हफ्ते आना। बंदियों के पास कपड़े, खानपान की वस्तुएं आदि भेजने के लिए भी पैसा वसूल किया जाता है। नगद धनराशि भेजवाने पर उसमें भी कटौती कर ली जाती है। मसलन 200 रुपए भेजने पर बंदी को सिर्फ 100 रुपए ही मिल पाते है। उधर इस संबंध में जब जेल अधीक्षक प्रीति यादव से उनका पक्ष जानने के लिए फोन (9454418246) किया तो कई प्रयासों के बाद भी उनका फोन नहीं उठा।

परिक्षेत्र डीआईजी को रहता सिर्फ लिफाफे का इंतजार!
राजधानी से सटी सीतापुर जेल लखनऊ जेल परिक्षेत्र में आती है। परिक्षेत्र डीआईजी कारागार मुख्यालय में बैठते है। सूत्रों के मुताबिक डीआईजी को परिक्षेत्र की प्रत्येक जेल का दो माह में एक बार विस्तृत और तीन माह में एक बार औचक निरीक्षण करने का निर्देश है। विस्तृत निरीक्षण में वह गल्ला गोदाम में राशन की नापतौल, खरीद फरोख्त की पड़ताल करने के साथ कार्यालयों के दस्तावेजों की विस्तृत पड़ताल करेंगे। इस काम को नहीं करने के एवज में डीआईजी को जेल की ओर से प्रतिमाह लिफाफे दिए जाते हैं। डीआईजी निरीक्षण के नाम पर औपचारिकता पूरी कर लिफाफे का इंतजार करते है। जब डीआईजी रामधनी से बात करने का प्रयास किया गया तो उनका फोन (9454418170) किसी और ने उठाया और नाम सुनते ही बात करने के बजाए फोन काट दिया।
नियंत्रण होता तो बीज का बजट गटक नहीं जाते अफसर
प्रदेश की जेलों को सब्जी की आपूर्ति करने वाली सीतापुर जेल खुद सब्जी खरीद कर बंदियों को खिला रही है। सूत्र बताते है कि ठेकेदार के माध्यम से सब्जी और दैनिक उपयोग की वस्तुओं मांगकर इनकी फर्जी बिलिंग से प्रतिमाह मिलने वाले लाखों रुपए के कमिशन की खातिर यह सोची समझी साजिश के तहत किया गया है। सब्जी उत्पादन होने पर बाहर से हरी सब्जी मंगवानी नहीं पड़ती तो जेल प्रशासन के अधिकारियों को कमीशन से वंचित रहना पड़ता। सूत्रों की माने तो यह काम बगैर अधीक्षक की मिलीभगत के संभव ही नहीं हो सकता। इस खरीद फरोख्त की निष्पक्ष जांच करा ली जाए तो दूध का दूध पानी खुद ही सामने आ जाएगा।



