राम मंदिर चढ़ावा चोरी का सबसे बड़ा खुलासा! आखिर किसके फोन पर रुकी थी FIR?
“क्या राम मंदिर में करोड़ों रुपये के चढ़ावे की चोरी का मामला जानबूझकर दबाया गया? क्या 27 मई को ही सब कुछ सामने आ गया था? आखिर वह फोन किसका था, जिसके बाद एफआईआर दर्ज नहीं हुई? और क्या अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में बड़ा बदलाव होने वाला है?”
आज हम बात करेंगे उस मामले की जिसने पूरे देश को चौंका दिया है। यह सिर्फ चोरी का मामला नहीं है, बल्कि सवाल पारदर्शिता, जवाबदेही और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का भी है। वीडियो को अंत तक जरूर देखिए क्योंकि आखिर में बताएंगे कि इस पूरे मामले के बाद ट्रस्ट के भविष्य को लेकर क्या बड़ा फैसला सामने आ सकता है।
ट्रस्ट के पदाधिकारी चंपत राय, अनिल मिश्रा व अन्य तमाम लोग मामला दबाने में जुटे थे। उनकी मंशा थी कि रकम बरामद कर ली जाए और फिर मामला रफादफा कर दिया जाए। इसलिए पहले केस दर्ज नहीं कराया। लेकिन, पुलिस की मदद से अधिकारियों की तरह काम करते हुए ये पदाधिकारी छानबीन में खुद ही जुटे थे। सूत्रों के मुताबिक, पुलिस भी इन पदाधिकारियों के दबाव में थी, इसलिए चुप्पी साधे थी। जैसा निर्देश ये पदाधिकारी कर रहे थे, वह वैसा ही करते जा रहे थे।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। ताजा जानकारी के अनुसार, चोरी की घटना 27 मई को ही ट्रस्ट और पुलिस के संज्ञान में आ गई थी। बताया जा रहा है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय एफआईआर दर्ज कराने थाने भी पहुंचे थे।
लेकिन तभी एक फोन आया… दावा है कि ट्रस्टी डॉक्टर अनिल मिश्रा ने किसी से उनकी बातचीत कराई और उसके बाद चंपत राय बिना तहरीर दिए वापस लौट आए। यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर मामला 27 मई को सामने आ गया था… तो एफआईआर तुरंत क्यों नहीं हुई? करीब दस दिन तक मामला सार्वजनिक क्यों नहीं होने दिया गया? और आखिर वह फोन किसका था जिसने पूरी कार्रवाई रोक दी? इन सवालों का जवाब अब हर श्रद्धालु जानना चाहता है।
बताया जा रहा है कि सात जून को समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडेय ने इस मुद्दे को उठाया। अगले दिन आठ जून को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर मामला उठाया।इसके बाद मामला तेजी से सुर्खियों में आया और पुलिस ने कार्रवाई शुरू की।
इस बीच पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव, मनीष, टिन्नू यादव,रमाशंकर मिश्रा, करुणेश और अवनीश शुक्ला शामिल हैं। सभी को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया।
कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद पुलिस ने जेल में करीब दो घंटे तक आरोपियों से पूछताछ की। सूत्रों के अनुसार सबसे लंबी पूछताछ अवनीश शुक्ला से हुई क्योंकि सबसे अधिक बरामदगी उसी से हुई थी। पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर करोड़ों रुपये की चोरी स्वीकार की। उन्होंने बताया कि चोरी कोई एक दिन की घटना नहीं थी बल्कि पूरी योजना बनाकर की जाती थी। बताया गया कि टिन्नू के पास गणना कक्ष की एक चाबी रहती थी। दूसरी चाबी बैंक कर्मियों के पास होती थी। आरोप है कि इसी मिलीभगत से रकम बाहर निकाली जाती थी। एक व्यक्ति पैसे निकालता था जबकि बाकी लोग उसे घेरकर खड़े हो जाते थे ताकि कैमरे में साफ दृश्य न आ सके। इसके बाद रकम बाथरूम में छिपाई जाती थी और मौका मिलते ही बाहर ले जाई जाती थी। आरोपियों का यह भी कहना है कि उन्हें अच्छी तरह पता था कि कैमरे कहां लगे हैं। और कंट्रोल रूम में निगरानी केवल औपचारिकता बनकर रह गई थी। यही वजह थी कि लंबे समय तक किसी को शक नहीं हुआ।
पूछताछ के दौरान ट्रस्टी डॉक्टर अनिल मिश्रा का नाम भी सामने आने का दावा किया गया। बताया गया कि दान राशि की गणना प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। हालांकि किसी भी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही होगा। इधर एसआईटी और पुलिस की जांच में आरोपियों के बैंक खातों की भी जांच की गई। सूत्रों के मुताबिक कई खातों में उनकी घोषित आय से कहीं अधिक लेनदेन मिला है। अब संपत्तियों, प्लॉट, मकानों और अन्य निवेशों का भी आकलन किया जा रहा है। यानी जांच अब सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक गतिविधियों की भी गहराई से पड़ताल की जा रही है।
ट्रस्ट के संचालन में सबसे अधिक भूमिका चंपत राय व डॉक्टर अनिल मिश्र की ही रही है। अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास व कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि की भूमिका भी सीमित ही रही, जबकि संस्थापक ट्रस्टी के. परासरन, जगद्गुरु वासुदेवाचार्य, जगद्गुरु विश्वप्रसन्न तीर्थ और युगपुरुष परमानंद अधिक आयु के कारण नियमित रूप से सक्रिय नहीं रह सके। महंत दिनेंद्र दास को भी हाशिये पर रखा गया। कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद हाल ही में डॉ. कृष्ण मोहन को ट्रस्ट में शामिल किया गया। मंदिर प्रकरण में एफआईआर भी उनकी तहरीर पर दर्ज कराई गई है। बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद एक ट्रस्टी का पद पहले से रिक्त है।
धर्म सेना भारत ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चोरी और गबन प्रकरण के आरोपियों के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट व राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की मांग उठाई है।
अब सबसे बड़ी नजर 6 जुलाई को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक पर है। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में पूरे घटनाक्रम की समीक्षा हो सकती है। चंपत राय और डॉक्टर अनिल मिश्रा के इस्तीफों पर भी चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है तो ट्रस्ट के तीन महत्वपूर्ण पद रिक्त हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में ट्रस्ट के पुनर्गठन की चर्चा भी तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि भविष्य में तिरुपति और वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर अधिक पेशेवर प्रशासनिक व्यवस्था लागू की जा सकती है। जिसमें एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ की नियुक्ति भी संभव मानी जा रही है।
कोषाध्यक्ष गोविंददेव गिरी से होगी पूछताछ
जांच एजेंसियां जल्द ही श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देवगिरी से पूछताछ करेंगी। जांच का फोकस इस बात पर रहेगा कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष के रूप में दानराशि के प्रबंधन, वित्तीय निगरानी और जवाबदेही के संबंध में उनकी क्या भूमिका रही और उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किस प्रकार किया। संवाद
चंपत राय दोषी हुए तो धर्मदंड छोड़ दूंगा
जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने कहा कि यदि जांच में चंपत राय एक रुपये की भी चोरी के दोषी पाए जाते हैं तो वह अपना धर्मदंड छोड़ देंगे। चंपत राय ने राम मंदिर आंदोलन से लेकर मंदिर निर्माण तक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चंपत राय “देव तुल्य” हैं और उनकी ईमानदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता।
राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होना बेहद जरूरी है। जो भी दोषी हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं जिन लोगों पर आरोप लगे हैं, उनकी जिम्मेदारी और दोष का अंतिम फैसला जांच एजेंसियों और न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही तय होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
- क्या सच पूरी तरह सामने आएगा?
- क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
- और क्या ट्रस्ट की व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे?



