कुलदीप वर्मा
एक बेटा अपने पिता का इंतजार कर रहा था… एक परिवार हर दिन आसमान की ओर देख रहा था… और एक गांव बस यही दुआ कर रहा था कि किसी तरह अपने लाल का पार्थिव शरीर वतन लौट आए। लेकिन सवाल था… हजारों किलोमीटर दूर सऊदी अरब में मौत के बाद आखिर शव भारत कैसे आएगा?”
रुदौली विधानसभा क्षेत्र के ग्राम सरांय अहमद निवासी गैसराम रावत रोजी-रोटी कमाने के लिए सऊदी अरब गए थे। अरार शहर में वह बकरी चराने का काम करते थे। सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत लगातार गंभीर होती चली गई और वह कोमा में चले गए। कुछ दिनों बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गैसराम रावत का निधन हो गया।
जब यह खबर गांव पहुंची तो पूरे परिवार में मातम छा गया। परिजनों की सबसे बड़ी चिंता थी कि आखिर गैसराम रावत का पार्थिव शरीर भारत कैसे आएगा, ताकि अंतिम संस्कार अपने गांव में हो सके। परिवार ने कई जगह मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई रास्ता नजर नहीं आया। तभी परिवार और रिश्तेदार पूर्व विधायक एवं पूर्व मंत्री अब्बास अली जैदी रुश्दी मियां के पास पहुंचे।
परिवार की पीड़ा को देखते हुए रुश्दी मियां ने तत्काल सऊदी अरब में अपने संपर्कों को सक्रिय किया। उनके निर्देश पर शमसुद्दीन खान, मोहम्मद शारिक हुनहुना, मोहम्मद जावेद तेली और अन्य सहयोगियों ने अस्पताल से लेकर प्रशासनिक प्रक्रिया तक हर स्तर पर मदद शुरू की।करीब 30 दिनों तक लगातार कागजी कार्रवाई, सऊदी अधिकारियों से संपर्क और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने की जद्दोजहद चलती रही।आखिरकार लंबी कोशिशों के बाद वह दिन आया जिसका परिवार बेसब्री से इंतजार कर रहा था। गैसराम रावत का पार्थिव शरीर भारत लाने की प्रक्रिया पूरी हो गई। “क्या अब किसी मृतक के शव पर भी राजनीति होगी? क्या किसी परिवार के दुख और आंसुओं के बीच भी श्रेय लेने की होड़ लग सकती है?अयोध्या के रुदौली से सामने आई एक घटना ने यही सवाल खड़ा कर दिया है।”
सऊदी अरब में बीमारी के चलते सराय अहमद गांव निवासी गैस राम रावत का निधन हो गया। परिवार के लिए यह किसी बड़े सदमे से कम नहीं था। विदेश में हुई मौत के बाद सबसे बड़ी चुनौती थी पार्थिव शरीर को भारत लाना। परिजनों के मुताबिक इस कठिन समय में समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक रुश्दी मियां ने लगातार अधिकारियों से संपर्क किया, जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा कराने में मदद की और परिवार के साथ खड़े रहे। करीब एक महीने की लंबी जद्दोजहद के बाद गैस राम रावत का शव भारत पहुंच सका।
लेकिन जैसे ही शव गांव पहुंचा, शोक का माहौल अचानक राजनीतिक चर्चा में बदल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, भाजपा विधायक रामचंद्र यादव के पुत्र आलोक चंद्र यादव भी मौके पर पहुंचे। इसके बाद शव को भारत लाने के श्रेय को लेकर दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच बहस और नोकझोंक शुरू हो गई। देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए और दुख का माहौल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदलता नजर आया।
बड़ा सवाल ग्रामीणों का कहना है कि जिसने संकट की घड़ी में परिवार की मदद की, सम्मान और श्रेय भी उसी को मिलना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का आरोप है कि आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इस विवाद पर भाजपा पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक परिवार अपने प्रियजन को खोने के दुख से गुजर रहा था। ऐसे समय में राजनीति नहीं, बल्कि संवेदना की जरूरत होती है। मृतक के परिजनों ने उन सभी लोगों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने शव को भारत लाने में किसी भी रूप में सहयोग किया।
जब शव गांव पहुंचा तो परिवार की आंखों में आंसू थे। दुख तो था, लेकिन एक सुकून भी था कि गैसराम रावत अब अपनी मिट्टी में अंतिम विदाई पाएंगे। यह सिर्फ एक शव को वापस लाने की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों प्रवासी भारतीयों की कहानी है जो अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए विदेशों में संघर्ष करते हैं। और यह कहानी हमें याद दिलाती है कि मुश्किल वक्त में किसी परिवार का साथ देना ही सबसे बड़ी इंसानियत है। लेकिन सवाल अब भी कायम है… क्या किसी परिवार के शोक के क्षण में श्रेय की राजनीति होनी चाहिए? क्या संवेदना से बड़ा कोई राजनीतिक लाभ हो सकता है?



