योगी बनाम अखिलेश:जमीन से सोशल मीडिया तक सियासी संग्राम

अजय कुमार
अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच की चुनावी तनातनी अब केवल राजनैतिक रैलियों या सदन के पटल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह संघर्ष एक बेहद आक्रामक और वर्चुअल जंग का रूप ले चुका है। जैसे-जैसे आगामी विधानसभा चुनावों का समय नजदीक आ रहा है, दोनों दलों के बीच राजनीतिक और वैचारिक द्वंद के तौर-तरीके भी पूरी तरह बदल चुके हैं। अब मंच के भाषणों से ज्यादा एक्स (पूर्व में ट्विटर), इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड होने वाले तीखे वीडियो, मीम्स, एआई जनरेटेड कंटेंट और ताबड़तोड़ बयानों ने मुख्य राजनीतिक युद्धभूमि का स्थान ले लिया है। इस वर्चुअल रणक्षेत्र में दोनों नेता एक-दूसरे की नीतियों, व्यक्तिगत छवि और राजनीतिक अतीत को कटघरे में खड़ा करने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे उत्तर प्रदेश का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।

ताजा मामला आज का है, जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सहारनपुर दौरे के दौरान उनके हेलीकॉप्टर को उतरने की अनुमति न मिलने पर सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर गरमा गया। समाजवादी पार्टी ने इस घटना को सत्ताधारी दल की गहरी राजनीतिक बौखलाहट और तानाशाही रवैये का प्रतीक करार दिया है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि बढ़ते जनाधार से घबराई भारतीय जनता पार्टी सरकार जानबूझकर विपक्षी दलों के कार्यक्रमों में प्रशासनिक अड़ंगे लगा रही है, ताकि लोकतंत्र की आवाज को दबाया जा सके। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और प्रशासनिक अधिकारियों ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि हेलीकॉप्टर की लैंडिंग की अनुमति सुरक्षा और ऐनवक्त पर तय किए गए सुरक्षा मानकों के अनुपालन न होने के कारण नहीं दी गई थी। सत्तारूढ़ दल का कहना है कि विपक्ष हर प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक रंग देकर सनसनी फैलाने की कोशिश करता है और कानून के नियमों से ऊपर उठकर काम करना चाहता है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से राज्य में सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्षी दल के बीच की राजनीतिक रस्साकशी को और अधिक तीखा बना दिया है, जहां हर छोटी घटना पर दोनों दल एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।

प्रदेश की राजनीति में इस हाई-टेक टकराव का सबसे बड़ा और प्रमुख आधार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे बने हुए हैं, जिनमें विशेष रूप से अयोध्या और राम मंदिर से जुड़े विषय शामिल हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से मंदिर निर्माण में दान और चढ़ावे में हेराफेरी जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों को उठाकर सीधे तौर पर सरकार की पारदर्शिता को कटघरे में खड़ा किया है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा खेमे ने भी सोशल मीडिया पर आक्रामक रुख अपनाते हुए विपक्ष पर सनातन आस्था को ठेस पहुंचाने और धार्मिक स्थलों की गरिमा को धूमिल करने के षड्यंत्र रचने का करारा आरोप लगाया है। इस वैचारिक और डिजिटल रस्साकशी के दौरान कई बार मामला तब और अधिक बिगड़ जाता है, जब दोनों तरफ से एआई-जनरेटेड वीडियो या डिजिटल कैरिकेचर का इस्तेमाल करके एक-दूसरे के शीर्ष नेतृत्व को सीधे तौर पर निशाना बनाया जाता है। इस तरह के विजुअल और ऑडियो टूल्स के जरिए जब तीखे व्यंग्य और आरोप प्रसारित किए जाते हैं, तो इंटरनेट पर दोनों दलों के समर्थकों के बीच एक वर्चुअल युद्ध छिड़ जाता है, जो कई बार राजनीतिक मर्यादाओं की सीमा को भी लांघने लगता है।

डिजिटल जंग का दूसरा सबसे बड़ा और धारदार आधार कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक कार्यशैली और व्यक्तिगत आक्षेप हैं, जिन्हें दोनों नेता अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए मुख्य हथियार बना रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी हर सभा और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सपा के पुराने शासनकाल को गुंडाराज, माफिया राज और तुष्टीकरण की पराकाष्ठा के रूप में चित्रित करते हैं, वहीं वे समाजवादी पार्टी को परिवार का सिंडिकेट करार देते हुए यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि इस पार्टी की पूरी धुरी केवल एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके विपरीत, अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को आगे बढ़ाते हुए मौजूदा सरकार पर तानाशाही, बेरोजगारी, युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ और भेदभावपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई के गंभीर आरोप मढ़ते हैं। अखिलेश यादव अक्सर मुख्यमंत्री के दौरों, उनके भाषणों के तेवर और प्रशासनिक कदमों पर सवाल उठाते हुए तीखे व्यंग्य भरे पोस्ट करते हैं, जिनका सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता और खुद मुख्यमंत्री आंकड़ों और तीखे बयानों के साथ पलटवार करते हैं।

यह डिजिटल और सियासी द्वंद्व इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले चुनावों में जीत-हार का फैसला केवल रैलियों से नहीं, बल्कि जनमानस की सोच को सोशल मीडिया के जरिए प्रभावित करने की क्षमता से भी तय होगा। जब भी सत्ता पक्ष की ओर से कोई विकास परियोजना का उद्घाटन किया जाता है या कोई बड़ा नीतिगत निर्णय लिया जाता है, तो विपक्ष फौरन डिजिटल प्लेटफार्म्स पर उसके दूसरे पहलुओं को उजागर कर देता है, और इसके उलट विपक्ष के हर हमले का जवाब देने के लिए सत्ताधारी दल का आईटी सेल और वरिष्ठ नेता पूरी मुस्तैदी से मैदान में डटे रहते हैं। इस वर्चुअल संघर्ष ने न केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बेहद व्यक्तिगत और आक्रामक बना दिया है, बल्कि आम जनता और खासतौर पर युवा वर्ग के स्मार्टफोन की स्क्रीन पर हर पल राजनीतिक सरगर्मी को जिंदा रखा है। दोनों ही नेता जनता के बीच यह संदेश देने की होड़ में हैं कि कौन उत्तर प्रदेश के असल मुद्दों का सच्चा हितैषी है और कौन केवल डिजिटल प्रोपेगैंडा में व्यस्त है, जिसके चलते यह चुनावी जंग अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां हर एक ट्वीट, हर एक वीडियो और हर एक बयान का राजनीतिक नफा-नुकसान बहुत दूर तक असर डालता है।

Related Articles

Back to top button