सैलाब का सवाल…

पर्वत से सैलाब अब, बहा रहा सब साथ। कुदरत के इस क्रोध से, काँप उठा हर हाथ।।

पल में उजड़े आशियाँ, पल में बिखरा गाँव। बाढ़ बनी जब काल-सी, सूना हर इक ठाँव।।

जल ने अपना रूप जब, दिखलाया विकराल। जीवन की खुशियाँ बही, हाल हुआ बेहाल।।

घाव पहाड़ों को दिये, काटे जंगल खूब। अब धरती के आँसुओं, में रहे आज डूब।।

नदियों का सम्मान कर, मत कर इनसे छेड़। प्रकृति अगर रूठी कभी, कहाँ बचेगी मेड़।।

जल जीवन का मूल है, जल ही जीवन-प्राण। बाढ़ बने अभिशाप जब, समझो भूल महान।।

पेड़ों को जब काटकर, हमने खोले द्वार। बादल बरसे तो बना, जल का प्रचंड प्रहार।।

कुदरत देती चेतना, फिर भी रहे न जाग। आज सैलाबों में बहा, कल का अपना भाग।।

माटी, पर्वत रो रहे, रोई नदिया धार। मानव की हर भूल कब, प्रकृति रखती उधार।।

घर-आँगन सब बह गए, टूटी जीवन-डोर। किस्मत से यूँ आदमी, देख प्रकृति का जोर।।

प्रकृति संग जो छेड़ता, पाता उसका दंश। हरियाली को बचाइए, तभी बचेगा वंश।।

आती हर इक त्रासदी, से ले मानव ज्ञान। प्रकृति-रक्षा के बिना, व्यर्थ सभी निर्माण।।

कुदरत माँ को मत दुखा, समझ समय की बात। पेड़ बचाओ, जल बचा, तभी सुरक्षित रात।।

—–डॉ. प्रियंका सौरभ

Related Articles

Back to top button