भाजपा की जीत में छिपा 2028 का सियासी अलार्म  

अजय कुमार
अजय कुमार


राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा बड़ी ताकत बनकर उभरी है, लेकिन यह जीत जश्न से ज्यादा चेतावनी पढ़ने का मौका देती है। 10,244 घोषित वार्डों में भाजपा को 4,179, कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 सीटें मिली हैं। यानी भाजपा कांग्रेस से 566 सीट आगे है, मगर निर्दलीयों की ताकत इतनी बड़ी है कि कई जगह दोनों राष्ट्रीय दल बहुमत की दहलीज पर खड़े होकर भी सत्ता से दूर हैं। यही इस चुनाव का असली संदेश है: राजस्थान का शहरी मतदाता भाजपा से नाराज होकर कांग्रेस की गोद में नहीं गया, लेकिन उसने भाजपा को भी खुला चेक नहीं दिया।309 शहरी निकायों में हुआ यह चुनाव केवल पार्षद चुनने की कवायद नहीं था।

यह भजनलाल शर्मा सरकार के कामकाज, भाजपा के संगठन और कांग्रेस की जमीन की परीक्षा थी। 9 और 11 सितंबर को मतदान के बाद 14 सितंबर की गिनती ने तस्वीर साफ की। भाजपा ने जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा जैसे बड़े निगमों में बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को बीकानेर में स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन इसके बीच जोधपुर की 44-44 की बराबरी, अजमेर में कांग्रेस की 37 और भाजपा की 32 सीटें, पाली में कांग्रेस की 29 और भाजपा की 21 सीटें तथा भरतपुर में 36 निर्दलीय सीटें बता रही हैं कि सत्ता का रास्ता सीधा नहीं है।

भाजपा के लिए सबसे असहज सवाल भरतपुर है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले के 65 वार्डों में 36 निर्दलीयों का जीतना सामान्य स्थानीय उलटफेर मानकर टाला नहीं जा सकता। भाजपा 20 पर रही और कांग्रेस केवल सात पर। इसका अर्थ यह नहीं कि मुख्यमंत्री का प्रभाव खत्म हो गया, लेकिन इतना जरूर है कि स्थानीय मतदाता पार्टी के बड़े नाम से अलग अपना फैसला सुनाने में सक्षम है। यही लोकतंत्र की खूबी भी है और सत्ता के लिए चेतावनी भी।जोधपुर की तस्वीर दिलचस्प है।भाजपा और कांग्रेस 44-44 पर रुक गईं और बाकी दस सीटें निर्दलीयों के पास गईं। राष्ट्रीय राजनीति में दोनों दलों की ताकत के बावजूद शहर ने मुकाबला बराबरी पर ला दिया।

अब महापौर किसका होगा, यह चुनाव से ज्यादा चुनाव बाद की राजनीति तय करेगी। यही स्थिति अजमेर, पाली और कई दूसरे निकायों में है। यहां सवाल यह नहीं कि सबसे बड़ी पार्टी कौन है; सवाल यह है कि जनता ने उसे बहुमत क्यों नहीं दिया।इस चुनाव ने एक और भ्रम तोड़ा है। राजस्थान में शहरी मतदाता सिर्फ बड़े मुद्दों पर वोट करता है, ऐसा मानना अधूरा है। स्थानीय चुनाव में सड़क की हालत, पानी की सप्लाई, सीवर, सफाई, स्ट्रीट लाइट, पार्क, अतिक्रमण और पार्षद की उपलब्धता जैसे मुद्दे राष्ट्रीय नारों से ज्यादा वजन रखते हैं। विधानसभा चुनाव 2028 से पहले भाजपाको यही समझना होगा कि सत्ता की असली परीक्षा जयपुर के मंच पर नहीं, मोहल्ले की गली में होती है। जनता को भाषण नहीं, नतीजा चाहिए।

कांग्रेस के लिए तस्वीर भी राहत की नहीं है। बीकानेर में 42 सीटों का स्पष्ट बहुमत, अजमेर में बढ़त और पाली में जीत की स्थिति उसके लिए जमीन बचने का संकेत हैं। झालावाड़ में 45 में से 29 वार्ड जीतकर कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मजबूत राजनीतिक गढ़ में बड़ा संदेश दिया है। लेकिन कुछ शहर जीत जाना राज्यव्यापी वापसी नहीं है।भाजपा से 566 सीट पीछे रहना बताता है कि कांग्रेस अभी भी संगठन और नेतृत्व की उस कमजोरी से बाहर नहीं निकली है, जिसने उसे राजस्थान में लंबे समय से परेशान किया है।सबसे बड़ा राजनीतिक विस्फोट शायद निर्दलीयों ने किया है। 2,273 सीटें किसी मामूली असंतोष की संख्या नहीं हैं।

भरतपुर में वे 36 के साथ अपने दम पर बहुमत में हैं। हनुमानगढ़ में भी 32 निर्दलीय 60 में बहुमत के आंकड़े से ऊपर हैं। अजमेर, पाली, अलवर, जोधपुर, दौसा और कई अन्य निकायों में वे बोर्ड गठन की चाबी पकड़े हुए हैं। इसका अर्थ है कि दलों की टिकट व्यवस्था और स्थानीय नेतृत्व के बीच बड़ा खाली स्थान पैदा हुआ है, जिसे निर्दलीयों ने भरना शुरू कर दिया है।वजह है कि 21 सितंबर को होने वाले महापौर, सभापति और अध्यक्ष पदों के चुनाव असली राजनीतिक परीक्षा बनेंगे। वोटर ने अपना फैसला दे दिया है; अब पार्षदों को अपने विवेक, स्थानीय हित और राजनीतिक दबाव के बीच रास्ता चुनना होगा। यहां से बाड़ाबंदी, समर्थन, समझौते और समीकरणों की राजनीति तेज होगी। अगर जनता के दिए जनादेश का सम्मान हुआ तो यह स्थानीय लोकतंत्र की ताकत होगी। अगर पद के लिए खरीद-फरोख्त जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो पार्टियों की नैतिकता पर सवाल उठेंगे।

छोटे दलों ने इस चुनाव में कांग्रेस की कमजोरी का फायदा उठाया है। बारां नगर परिषद में आम आदमी पार्टी ने 60 में 31 सीटें जीतकर साफ बहुमत बनाया। नोखा में माकपा ने 45 में 29 वार्ड जीतकर अपनी स्थानीय पकड़ दिखाई। यानी मतदाता के पास अब भाजपा और कांग्रेस के अलावा भी विकल्प हैं। इन्हें राज्यव्यापी चुनौती कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन 2028 की जमीन पर इनके बीज दिखाई देने लगे हैं। राजनीति में तीसरे विकल्प की शुरुआत अक्सर ऐसे ही छोटे नगरों से होती है। भाजपा को इसलिए अपनी जीत का अर्थ सावधानी से पढ़ना चाहिए। सत्ता में रहने का लाभ, मजबूत संगठन और शहरी आधार उसे बढ़त देते हैं। फिर भी कुछ गढ़ों में दरारें दिखी हैं और कई निकायों में बहुमत नहीं मिला।

यह परिणाम भाजपा की हार नहीं, लेकिन आत्मसंतोष के खिलाफ जनादेश जरूर है। कांग्रेस की वापसी भी पूरी नहीं, मगर उसकी मौजूदगी खत्म नहीं हुई। निर्दलीयों का उभार बताता है कि दोनों दलों के बीच नाराज मतदाता अब अपने उम्मीदवार को खड़ा करने और जिताने की ताकत रखता है। राजस्थान की राजनीति में 2028 की विधानसभा लड़ाई अभी दूर है, लेकिन उसका पहला संदेश शहरों से आया है। भाजपा आगे है, कांग्रेस मुकाबले में है और निर्दलीय सत्ता की भाषा बदल रहे हैं। सरकार को इस नतीजे को विजय समारोह की तरह नहीं, जनमत की रिपोर्ट की तरह पढ़ना होगा। जहां सड़क टूटी है, पानी रुका है, सफाई कमजोर है या नागरिक की शिकायत अनसुनी है, वहां चुनावी आंकड़ा चेतावनी बन सकता है। राजस्थान के शहरी मतदाता ने एक बात साफ कर दी है: सत्ता बड़ी हो सकती है, लेकिन स्थानीय नाराजगी उससे बड़ी हो सकती है।

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