भाषा हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान

हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित

समाज का गठन भाषा से हुआ है। भाषा हम सब को समाज से जोड़ती है। हजारों वर्ष पहले लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था। उन्हीं दिनों भारत के ऋषियों ने वेदों की रचना की थी। भाषा का विकास धीरे धीरे हुआ है। सभ्यता और संस्कृति भाषाई विकास के आदर्श हैं। भारतीय संस्कृति में दर्शन का प्रवाह है। इसलिए यहां के भाषाई विकास में दर्शन की छाप दिखाई पड़ती है। दर्शन सृष्टि का अध्ययन है। यहां भारत में देवताओं से भी वार्ता करने वाली भाषा विद्यमान है। ऋग्वेद की ऋचाएं सृष्टि और व्यष्टि के बीच संवाद हैं। भाषा का सदुपयोग उत्कृष्ट समाज के गठन में सहायक है। पतंजलि ने अपने महाभाष्य में लिखा है, ”एक ही शब्द अपने मूल स्थान से हटकर नया अर्थ देता है।” लेकिन पीछे लगभग 10 साल से सार्वजनिक बहस का स्तर गिरा है। न्यूज चैनलों की बहसों में अपशब्द और गालीगलौच चलते हैं। स्वतंत्र चेता और मर्यादा का पालन करने वाले इससे आहत हो जाते हैं। इन बहसों में कभी कभी जूता आदि के भी प्रदर्शन होते हैं। नई पीढ़ी गलत संस्कार ग्रहण करती है। जेनजी की बात बहुत चली है, चल रही है। हम सोशल मीडिया के मर्यादाविहीन प्रसारणों के माध्यम से आखिरकार नई पीढ़ी को क्या देना चाहते हैं? बहस का यह निम्न स्तर सार्वजनिक चर्चा के दौरान भी देखा जा सकता है।


मूलभूत प्रश्न है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं? पश्चिम के विख्यात विचारक बर्ट्रेंड रसेल ने सामाजिक पुनर्निर्माण के सिद्धान बताते हुए लिखा था, मनुष्य के आवेगों को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला रचनात्मक आवेग है। इस आवेग के सम्बंध में रसेल ने बताया था कि ये रचनात्मक आवेग होता है। रचनात्मक आवेग में कुछ नया रचने की तीव्रता होती है। उन्होंने दूसरे आवेग का नाम अधिकारपरक आवेग रखा। इस आवेग में दूसरों पर अपना अधिकार करने या बनाए रखने की तीव्रता होती है। रसेल ने लिखा है, ”सर्वोत्तम जीवन वह है, जिसमें रचनात्मक आवेग सबसे अधिक हो। अधिकारपरक आवेग की मानसिकता से ही अपशब्द और गलियां निकलती हैं।” दुनिया की सबसे प्राचीन संस्कृति के उत्तराधिकारी हम भारत के लोग परस्पर प्रेमपूर्ण संवाद नहीं कर पाते। आखिरकार यह कैसा समाज बन रहा है? इस समाज में बाजार की शक्तियां प्रभावी हैं। सिनेमा है। सोशल मीडिया है। रील हैं। विदेशी सभ्यता का आकर्षण है। हमारे जैसे लोग दिखाऊ संकोच के साथ इसे स्वीकार कर रहे हैं।


लोकतंत्र विचार विमर्श के साथ चलता है। विचार विमर्श की सफलता के लिए एक प्रतिपूर्ण भाषा की आवश्यकता होती है। लोकतंत्र भारत की जीवनशैली है। इस जीवनशैली को अमर्यादित भाषा के प्रयोग ने क्षत विक्षत कर रखा है। विधानमण्डल और संसद घोर अव्यवस्था के शिकार हैं। कभी कभी पूरा सत्र निकल जाता है और कोई बैठक नहीं होती। भाषा की मर्यादविहीनता ने समाज के सभी रिश्तों पर सेंध लगा रखी है। राष्ट्र के लिए संकट की घड़ी है। रामचरितमानस में गरुण और कालभुसुंडि जैसे पक्षियों के संवाद हैं। जिस राष्ट्र में पशु पक्षी भी मधुर वार्ता करते हों, उस राष्ट्र में भाषा की मर्यादाहीनता ने समाज और छन्दस को नष्ट कर दिया है।


भारतीय दर्शन चिन्तन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। महाभारत युद्ध से आहत व्यास ने कहा था कि, ‘‘शब्द अब ब्रह्म नहीं रहे।‘‘ शब्द केवल ध्वनि नहीं हैं। प्रत्येक शब्द के गर्भ में अर्थ होता है। अर्थ का ध्यान रखते हुए ही शब्द का प्रयोग किया जाता है। पतंजलि ने महाभाष्य में शब्द के सम्यक प्रयोग पर जोर दिया है, ‘‘शब्द का सम्यक ज्ञान और सम्यक प्रयोग ही अपेक्षित परिणाम देता है।‘‘ लेकिन भारत के सामाजिक जीवन में शब्द अराजकता का वातावरण है। विपरीत विचार के प्रति आक्रामक होना स्वाभाविक है। डॉ० राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मधुलिमये आदि अनेक सांसद तत्कालीन सरकार पर आक्रामक रहते थे। लेकिन उनके शब्द प्रयोग वाक् सौंदर्य प्रकट करते थे। विपक्षी राजनैतिक कार्यकर्ता भी उनसे प्रेरित होते थे। सम्प्रति अपशब्दों ने सुन्दर शब्दों को विस्थापित कर दिया है।


समाज का गठन भाषा से हुआ। परस्पर संवाद हुआ। सहमति और असहमति भी चली। भाषा संस्कृति की संवाहक है। समाज को सांस्कृतिक बनाने का काम भी संयमपूर्ण भाषा से ही संभव है। भाषा विज्ञानी मोलनिवसी ने 1923 में कहा था कि, ‘‘भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।‘‘ जर्मन भाषाविद् ने यही बात 1932 में बात दोहराई थी। ज्ञान, विज्ञान और दर्शन व राजनैतिक विचार भाषा के माध्यम से ही दूर दूर तक प्रवाहित होते हैं। शब्द मधुरता भारत के राष्ट्रजीवन की अभिलाषा रही है। अथर्ववेद (9.1) में प्रार्थना है, ‘‘हमारी वाणी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें। वैदिक, पौराणिक साहित्य में मंत्रों, श्लोकों के छोटे विभाजनों को सूक्त कहा गया है। सूक्त वस्तुतः सु-उक्त हैं। सूक्त का अर्थ है सुन्दर कथन। सूक्तियां भी सुन्दर कथन हैं। ऋग्वेद में प्रार्थना है कि, “हमारा पुत्र सभा में सुन्दर बोले और यशस्वी हो।”


भाषा बेहद अराजक हो रही है। वह सोच-विचार, चिंतन-मनन की सहज सामान्य पद्धतियों से विमुख हो गयी है। शब्द प्रयोग के तल पर वह नितांत अराजक है। हमारी राजनीति सत्य में सौंदर्य और सौंदर्य में आनन्द खोजने की भारतीय परम्परा से भी पथ-च्युत हो गयी है। उसे भारत के राष्ट्रीय स्वभाव से चिढ़ है। उसे प्रत्येक कर्म को लगातार संवारने वाली राष्ट्रीय प्यास से भी खुन्नस है, क्योंकि इसी राष्ट्रीय अभीप्सा का नाम संस्कृति है। भारत का राष्ट्रवाद मूलतः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही है। लेकिन शब्द अपना अर्थ खो रहे हैं। अर्थ अनर्थ कर रहे हैं। मनुष्य और बाकी प्राणियों के बीच भेद का मूल श्संस्कृतिश् है। यों मनुष्य भी प्राणी ही है, पर वह एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिकता के तत्व को लगातार रसमय, सत्य-मय, आनन्दमय और आत्ममय-एकात्ममय बनाने का मनुष्य कर्म ही संस्कृति कहलाया। संस्कृति अंग्रेजी के कल्चर का अनुवाद नहीं है। कल्चर नीतिगत वाह्य अवधारणा है। संस्कृति आत्मपरक सत्यशोधक आन्तरिक रसमयता का प्रवाह है।


भारतीय संस्कृति एक सतत् संगीत है। कह सकते हैं एक वीणा। वीणा के तार संघर्षण से बजते हैं। स्वर से स्वर नहीं आते। बांसुरी में स्वर से स्वर निकलते हंै। तब संगीत आता है। वीणा वाद्य यंत्र है। यहाँ संघर्षण और छेड़खानी ही संगीत देती है। भारतीय संस्कृति एक वीणा है। भारत ने इसीलिए ज्ञान, वाणी और विद्या की देवी सरस्वती के हाथ में वीणा पकड़ाई। वीणा प्रतीक है संघर्षण में संगीत की खोज का। सतत खोजी, सदा आनन्द अभीप्सु सनातन तार्किक, निरंतर लोकतंत्रीय-भारत की यही प्रकृति संस्कृति कहलाती है। ध्यान रहे व्यक्ति की तरह देश के भी वैशिष् य होते हैं। व्यक्ति के वैशिष्ट्य व्यक्ति का व्यक्तित्व बनते हैं। राष्ट्र के वैशिष्ट्य राष्ट्र का राष्ट्रीयत्व बनते हैं। भारत का वैशिष्ट्य भारत की यही सनातन संस्कृति है। इसीलिए भारतीय राष्ट्र का प्राण संस्कृति है। राष्ट्र की काया में संस्कृति का प्राण। सम्प्रति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राजनीतिक बहस का मुद्दा बना हुआ है। सवाल यह है कि हम राष्ट्र है या नहीं ? राष्ट्र हैं तो क्यों है ? भारतीय राष्ट्र का बीज क्या है? गंगा है तो गोमुख भी होगा ही। बेशक संयुक्त राष्ट्र संघ के पास आज भी राष्ट्र की कोई परिभाषा नहीं है। वे सम्प्रभु राज्य को राष्ट्र मानते हैं।

पाकिस्तान और बांग्लादेश बेशक राज्य हैं। कह सकते हैं कि सम्प्रभु भी। पर वे राष्ट्र नहीं हो सकते। इस्लामी विचार के आधार पर पाकिस्तान अलग हुआ। लेकिन पाकिस्तानी मांग के मूल में इस्लाम ही था। इस्लाम राष्ट्र निर्माण की शर्तों के लिए काफी होता तो बांग्लोदश न बनता। राष्ट्र दरअसल भूसांस्कृतिक भावात्मक अवधारणा है। भूसांस्कृतिक लगाव दुराव ही राष्ट्रों के जन्म और मरण का कारण बनते हैं। इस सब का मूल है भाषा। व्यक्ति की तरह राष्ट्र भी मरते हैं। सृष्टि की पहली आभा के साथ दिव्यता आयी। भारत का शाब्दिक अर्थ ही है भा-प्रकाश तथा रत-संलग्न। भारत अजन्मा है। सुमेरियन आदि सभ्यताएँ सिंधु सभ्यता के बाद की हैं। भारत से पुरानी विश्व में कोई संस्कृति नहीं है। इस संस्कृति में नित्य नूतन होते जाने का स्वभाव है। इसलिए इससे आधुनिक भी दूसरी कोई संस्कृति नहीं।

Related Articles

Back to top button