छोटा हूँ तो क्या हुआ…

छोटा हूँ तो क्या हुआ, मन में बड़ा विचार। बूँद-बूँद से भर रहा, सागर का भंडार।।

नन्हा दीपक क्या करे, पूछे जग संसार। अँधियारा छँटता वही, जब जले एक बार।।

कद छोटा हो तो रहे, हौसला आसमान। पर्वत भी झुकता कभी, देखे दृढ़ इंसान।।

कण-कण मिलकर बन गया, धरती का आकार। छोटा कोई भी नहीं, यदि भीतर है सार।।

बूँद अकेली क्या करे, हँसे अगर संसार। बूँद-बूँद मिलकर बने, सागर देख अपार।।

चींटी छोटी है मगर, चढ़ती ऊँचा शैल। मेहनत जिसके साथ हो, जीत उसी का खेल।।

नन्हा बीज दिखे मगर, भीतर वन का राज। समय मिले तो दे सके, धरती को नव साज।।

छोटी सी मुस्कान में, छिपा बड़ा संसार। जिसने दिल से दे दिया, उसका ऊँचा प्यार।।

शब्द भले हों चार ही, रखते गहरा मोल। सच्चे मन से निकलकर, खोलें मन के बोल।।

छोटी सी कोशिश करे, बदल सके हालात। एक कदम ही खोलता, मंजिल तक की बात।।

नन्ही किरणें भोर की, हरती तम हर बार। छोटा होकर भी बने, सूरज का आधार।।

माटी का कण क्या करे, सोच रहा हर हाल। मिलकर वही बना सके, सुंदर भवन विशाल।।

छोटी नाव भँवर फँसी, रखती अपना मान। जिसके भीतर साहस हो, पार करे तूफान।।

छोटी गलती मानकर, बड़ा बने इंसान। झुकने वाला ही सदा, पाता सच्चा मान।।

कम साधन से भी रचे, सपनों का संसार। हिम्मत जिसके पास हो, उसको क्या दरकार।।

नन्हे पंखों से उड़ें, सपने लेकर साथ। आकाशों की दूरियाँ, बन जाती दो हाथ।।

छोटा हूँ तो क्या हुआ, भीतर मेरा मान। कर्मों से पहचान हो, यही बड़ी पहचान।।

—–डॉ. प्रियंका सौरभ

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