यूपी में अखिलेश के पीडीए के खिलाफ शाह का यूसीसी दांव

संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक की काट के लिए भारतीय जनता पार्टी यूसीसी मतलब समान नागरिक संहिता का मुद्दा लेकर आ गई है। इस बात का संकेत गृह मंत्री अमित शाह ने लखनऊ दौरे के दौरान दिया। शाह ने दो टूक कहा कि उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव केवल सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि वैचारिक मुद्दों, सामाजिक समीकरणों और विकास के दावों का बड़ा मुकाबला बनेगा। शाह ने लखनऊ में कार्यकर्ताओं के बीच कहा कि 2027 में तीसरी बार भाजपा सरकार बनते ही प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर दिया जाएगा। ऐसा लगता है कि शाह यूसीसी के सहारे यूपी में चुनावी बहस का रुख बदलने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखे हमले करके उन्होंने कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया कि अब चुनावी तैयारी में किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि शाह के यूसीसी लागू करने वाले बयान के पीछे एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा छिपा है। सवाल यह भी है कि क्या भाजपा अपनी उपलब्धियों के भरोसे तीसरी बार सत्ता में लौटना चाहती है या 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले झटके ने उसे नए सिरे से रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया है? बहरहाल, सपा के पीडीए के खिलाफ शाह का यूसीसी का ऐलान भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। यूसीसी के सहारे भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूत करेगी, वहीं सपा प्रमुख के लिए यूसीसी का विरोध करना आसान नहीं होगा। उधर, यूपी में तीसरी बार सरकार बनने पर यूसीसी लागू करने वाले अमित शाह के बयान पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने पलटवार किया है। अखिलेश यादव ने कहा, बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू करने का वादा करके भाजपा ने अपने पुराने वैचारिक एजेंडे को फिर चुनाव के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ शाह यूसीसी की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर शाह 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों का जिक्र करके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ा रहे हैं। 2017 में भाजपा ने 403 में से 312 सीटें हासिल की थीं और करीब 39.67 प्रतिशत वोट पाए थे। 2022 में पार्टी की सीटें घटकर 255 रह गईं, लेकिन वोट प्रतिशत बढ़कर 41.29 हो गया। इन आंकड़ों से भाजपा की मजबूत चुनावी स्थिति जरूर दिखाई देती है, मगर 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस आत्मविश्वास को चुनौती दी। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में समाजवादी पार्टी ने 37 और भाजपा ने 33 सीटें जीतीं। कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। यह नतीजा बताता है कि भाजपा के सामने विपक्ष की चुनौती वास्तविक है।

सपा ने सामाजिक समीकरणों और गठबंधन की राजनीति के सहारे अपनी ताकत बढ़ाई है। इसीलिए शाह का कार्यकर्ताओं से आपसी नाराजगी भुलाकर मैदान में उतरने का आग्रह महत्वपूर्ण है। शायद समय रहते शाह को कार्यकर्ताओं की नाराजगी का अहसास हो गया है। उनका चुनाव से पहले संगठन की एकजुटता पर इतना जोर देना बताता है कि पार्टी बूथ स्तर पर किसी भी कमजोरी को नजरअंदाज नहीं करना चाहती। टिकट की दावेदारी, स्थानीय नेताओं की खींचतान और जातीय समीकरण भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। 2024 ने दिखाया कि बड़े नेताओं की लोकप्रियता के बावजूद स्थानीय असंतोष चुनावी परिणाम बदल सकता है। भाजपा को अब केवल पुराने चुनावी आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी।

योगी सरकार की कानून-व्यवस्था को शाह ने चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश की। उन्होंने अपराध में कमी और माफिया के खिलाफ कार्रवाई को सरकार की बड़ी उपलब्धि बताया। सरकार के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 की तुलना में डकैती के मामलों में करीब 90 प्रतिशत और लूट में 84 प्रतिशत की गिरावट आई है। लेकिन कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल अपराध के प्रतिशत से नहीं हो सकता। महिलाओं की सुरक्षा, आम नागरिक की थाने में सुनवाई और अदालतों में न्याय मिलने की प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है। बुलडोजर कार्रवाई राजनीतिक संदेश दे सकती है, लेकिन कानून का राज निष्पक्ष जांच और संवैधानिक प्रक्रिया से ही स्थापित होता है।

निवेश के मोर्चे पर भी शाह ने 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्तावों और 15 लाख करोड़ रुपये के जमीन पर उतरने का दावा किया। यह प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी संभावना है, लेकिन जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल रोजगार का है। कितनी परियोजनाएं वास्तव में शुरू हुईं और उनसे कितने युवाओं को नौकरी मिली? निवेश सम्मेलन में हुए समझौते तभी सार्थक हैं, जब वे उद्योग, उत्पादन और रोजगार में बदलें। उत्तर प्रदेश का युवा आज भी बेहतर अवसरों के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन करता है। सरकार को यह साबित करना होगा कि निवेश के बड़े दावे आम परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी बदलाव ला रहे हैं।

इसके साथ ही शाह ने वोटरों को लुभाने के लिए गरीबी के सवाल पर केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। नीति आयोग के जनवरी 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 से 2022-23 के बीच देश में 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। उत्तर प्रदेश में यह संख्या करीब 5.94 करोड़ बताई गई। यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन हकीकत यह भी है कि गरीबी से बाहर निकलना और स्थायी आर्थिक सुरक्षा हासिल करना दो अलग बातें हैं। महंगाई, किसानों की आय, बेरोजगारी और छोटे कारोबारियों की समस्याएं अभी भी चुनावी बहस का हिस्सा रहेंगी। इन सवालों का जवाब केवल आंकड़ों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों से देना होगा।

लब्बोलुआब यह है कि भाजपा 2027 की लड़ाई में यूसीसी, कानून-व्यवस्था और विकास को एक साथ लेकर चलना चाहती है। लेकिन सत्ता की तीसरी पारी का रास्ता केवल नारों और राजनीतिक हमलों से नहीं निकलेगा। अंगद के पांव की तरह सरकार अडिग होने का दावा करने वाले शाह को भी पता है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है। भाजपा के सामने असली चुनौती यही है कि वह अपने वादों को जमीन पर उतारे और रोजगार, महंगाई, किसान तथा सामाजिक न्याय जैसे सवालों का ठोस जवाब दे। 2027 में चुनावी बिसात पर चालें सभी चलेंगे, लेकिन जीत उसी की होगी जो जनता का भरोसा कायम रख पाएगा।

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