सीता की छवि पर पहरा,क्या देवत्व भी रंग से तय होगा?

अजय कुमार
अजय कुमार

नितेश तिवारी की रामायण में साई पल्लवी को सीता बनाए जाने पर उठे सवाल अभिनय या सिनेमाई कल्पना तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया पर उनकी त्वचा, घुंघराले बाल और चेहरे की बनावट को लेकर टिप्पणियां हो रही हैं। साफ है कि यहां देवी के चरित्र से ज्यादा अभिनेत्री के रंग-रूप की चिंता है। यह कैसी भक्ति है, जिसमें सीता की गरिमा बचाने के नाम पर एक जीवित स्त्री की गरिमा कुचली जा रही है? सोशल मीडिया पर असहमति जताना दर्शक का अधिकार है, लेकिन किसी अभिनेत्री के चेहरे पर अपमानजनक टिप्पणी करना न तो समीक्षा है और न धार्मिक संवेदना की रक्षा। फिल्म की पहली झलक अधूरी होती है; उसमें अभिनय का पूरा संदर्भ और चरित्र का विकास दिखाई नहीं देता।

सीता की छवि किसी एक चेहरे की जागीर नहीं। वाल्मीकि रामायण से रामचरितमानस और दक्षिण भारतीय रामकथाओं तक प्रस्तुति में समय और समाज की छाप रही है। संस्कृत काव्य में सौंदर्य-वर्णन हैं, लेकिन उन्हें अभिनेत्री के लिए फोटोग्राफिक निर्देश मान लेना साहित्य की समझ नहीं, सुविधा का आग्रह है। कमल, स्वर्ण या चंद्रमा की उपमा से यह तय नहीं होता कि सीता की त्वचा कितनी उजली हो या बाल सीधे ही हों। अलग-अलग रामायणों में कथानक और चरित्रों के प्रसंगों तक में अंतर मिलता है। यही इस महाकाव्य की जीवंतता है। उसे किसी एक दौर के टीवी मेकअप, हेयरस्टाइल और कैमरा-फ्रेम से बांध देना परंपरा को बचाना नहीं, उसे संग्रहालय की वस्तु बना देना है।

1987 में दूरदर्शन पर शुरू हुई रामानंद सागर की रामायण ने दर्शकों की स्मृति में सीता की प्रभावशाली छवि बनाई। दीपिका चिखलिया उस भूमिका में इतनी लोकप्रिय हुईं कि बाद की पीढ़ियों ने भी उसी चेहरे को सीता का पर्याय मान लिया। 2020 के लॉकडाउन में दोबारा प्रसारण ने उस स्मृति को और मजबूत किया। प्रसार भारती के मुताबिक पुनः प्रसारण ने 2015 के बाद हिंदी मनोरंजन कार्यक्रमों में सबसे ऊंची रेटिंग हासिल की; 16 अप्रैल 2020 को दूरदर्शन ने 7.7 करोड़ वैश्विक दर्शकों का आंकड़ा जारी किया। लेकिन लोकप्रियता किसी कलाकार को हमेशा के लिए भूमिका का मालिकाना हक नहीं देती।

दीपिका की सीता यादगार हैं, अंतिम सीता नहीं।दीपिका चिखलिया ने जुलाई 2026 में साई पल्लवी की प्रतिभा की तारीफ की, साथ ही कहा कि पुरानी रामायण को दर्शकों के मन से हटाना आसान नहीं होगा। अगस्त में उन्होंने भरोसा जताया कि फिल्म रिलीज होने पर दर्शक साई को स्वीकार कर लेंगे। पुराने कलाकार का सम्मान नई अभिनेत्री के अपमान की अनुमति नहीं बन सकता। विरासत का अर्थ दरवाजा बंद करना नहीं, अगली पीढ़ी को अपनी व्याख्या करने देना है।

इस विवाद की असली जड़ भारतीय समाज का रंगभेदी सौंदर्यबोध है। 2024 में एएससीआई, यूएन वुमन के अनस्टिरियोटाइप एलायंस और कांतर के अध्ययन ने 13 भाषाओं के 250 से अधिक भारतीय विज्ञापनों का विश्लेषण किया। केवल 4 प्रतिशत विज्ञापनों में त्वचा के रंगों की विविधता दिखाई गई, जबकि वैश्विक औसत 27 प्रतिशत था। जातीय विविधता दिखाने वाले भारतीय विज्ञापन महज 3 प्रतिशत थे, जबकि वैश्विक औसत 19 प्रतिशत था। इतने विविध देश के विज्ञापन अब भी सीमित सौंदर्य-ढांचे में फंसे हैं। यह आंकड़ा केवल विज्ञापन की कमी नहीं बताता; यह तय करता है कि स्क्रीन पर किसे सामान्य, सुंदर और स्वीकार्य माना जा रहा है। जब विज्ञापन भारत की त्वचा-विविधता का सिर्फ छोटा हिस्सा दिखाते हैं, तब फिल्मी चेहरों से भी एक ही रंग-रूप की अपेक्षा पैदा होती है।

2024 में जर्नल ऑफ कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन ने 2010 से 2023 के बीच दक्षिण एशिया के 152 फेयरनेस क्रीम विज्ञापनों को परखा। इनमें 128 विज्ञापन महिलाओं को लक्ष्य करके बने थे, यानी 84.21 प्रतिशत; पुरुषों को लक्ष्य करने वाले 24, यानी 15.79 प्रतिशत थे। 118 विज्ञापनों में सेलिब्रिटी शामिल थे। अध्ययन में 47.37 प्रतिशत विज्ञापनों ने खास सामग्री या घटकों का उल्लेख किया। यानी सौंदर्य को त्वचा की सेहत से जोड़ने के बजाय उसे बदलने की बिक्री-भाषा बनाई गई। बाजार महिलाओं को बताता रहा है कि सुंदर दिखने के लिए रंग हल्का करना जरूरी है और उसी सोच को बेचने के लिए लोकप्रिय चेहरों का इस्तेमाल करता है। 2025 में 30 अखबारों के वैवाहिक विज्ञापनों पर हुए अध्ययन ने भी 2010 से 2024 तक गोरी त्वचा को प्राथमिकता देने वाला पूर्वाग्रह लगातार मौजूद पाया।

साई पल्लवी का इस बहस में खड़ा होना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने चेहरे को बाजार की मांग के मुताबिक नहीं बदला। 2019 में दो करोड़ रुपये के कथित फेयरनेस क्रीम विज्ञापन को ठुकराने की खबर आई; बाद में उन्होंने खुद भी इसकी पुष्टि की। दो करोड़ रुपये की रकम की खबर उस समय व्यापक चर्चा में आई थी; इसे हर रिपोर्ट में पुष्ट अनुबंध राशि की तरह पेश करना ठीक नहीं। अहम बात यह है कि साई ने फेयरनेस उत्पाद का प्रचार करने से इनकार किया और त्वचा के रंग को हीनता से जोड़ने वाली सोच का विरोध किया। प्रेमम, फिदा, लव स्टोरी, श्याम सिंघा रॉय और गार्गी में उनकी पहचान सहजता और अभिनय से बनी। रंगत को योग्यता का पैमाना बनाना आलोचना नहीं, पूर्वाग्रह है।

इसमें लैंगिक दोहरा मापदंड भी है। राम की भूमिका में रणबीर कपूर की कास्टिंग पर चर्चा हुई, लेकिन बहस का बड़ा हिस्सा उनकी त्वचा या बालों पर नहीं अटका। सीता की भूमिका में अभिनेत्री आते ही शरीर, रंग और बाल जांच का विषय बन जाते हैं। पुरुष कलाकार को किरदार में ढलने का अवसर मिलता है; महिला से पहले ही आदर्श सौंदर्य की शर्त पूरी करने की उम्मीद की जाती है। यह तुलना किसी कलाकार की त्वचा को दूसरी से बेहतर बताने के लिए नहीं, आलोचना के असमान पैमाने को दिखाने के लिए है। राम के लिए अभिनय और व्यक्तित्व की बात होती है, सीता के लिए पहले चेहरा जांचा जाता है।

रामायण जैसी संवेदनशील कथा में कॉस्ट्यूम, आभूषण, संवाद, भाषा, मेकअप और दृश्यांकन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि स्टाइलिंग प्रसंग से मेल नहीं खाती तो निर्देशक और डिजाइन टीम से जवाब मांगा जाना चाहिए। साई की हिंदी या अभिनय पर भी दर्शक फिल्म देखने के बाद राय बना सकते हैं। भाषा की दिक्कत हो तो प्रशिक्षण, संवाद-निर्देशन और डबिंग के रास्ते मौजूद हैं। किसी कलाकार की जन्मभूमि को उसकी सांस्कृतिक पात्रता का प्रमाणपत्र बना देना भारतीय सिनेमा की साझी परंपरा के खिलाफ है। सीता का चरित्र सौंदर्य प्रतियोगिता का मंच नहीं। अशोक वाटिका में रावण के सामने प्रतिरोध, विपत्ति में धैर्य और आत्मसम्मान उनकी पहचान हैं। उनकी शक्ति चेहरे की बनावट से नहीं, निर्णय और नैतिक दृढ़ता से आती है।

पर्दे पर यह शक्ति अभिनय, पटकथा और निर्देशन से दिखाई देगी, त्वचा के रंग से नहीं। फिल्म का पहला भाग 5 नवंबर 2026 को रिलीज होना तय है। फिल्म दो भागों में बनाई जा रही है और दूसरा भाग दिवाली 2027 में प्रस्तावित है। दर्शक उसे देखकर फैसला करें कि साई ने भूमिका के साथ न्याय किया या नहीं। रामायण की ताकत किसी एक कलाकार की स्थायी तस्वीर में नहीं, उसके मूल्यों और नए अर्थ देने की क्षमता में है। हर युग ने अपने राम और अपनी सीता देखी है। अगर आज की सीता को 1987 की तस्वीर की हूबहू नकल होना पड़े, तो नई फिल्म बनाने का औचित्य क्या है? सीता की गरिमा के नाम पर साई पल्लवी की रंगत पर हमला करने वाले उसी सोच को मजबूत कर रहे हैं, जो महिला को पहले सुंदर और बाद में सक्षम मानती है। सवाल यह नहीं कि साई सीता जैसी दिखती हैं या नहीं; सवाल है कि क्या हम उनके साहस, स्वाभिमान और गरिमा को पहचानने लायक नजर रखते हैं?

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