ट्रालियों में रेडियम पट्टी लगाई जाय


श्याम कुमार


हमारे देश में सड़कों को दुर्घटनामुक्त करने की जितनी बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, सड़कें उतनी ही अधिक दुर्घटनायुक्त होती जा रही हैं। इसका मूल कारण यह है कि समस्या की जड़ में न जाकर उसका सतही इलाज किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अच्छी-अच्छी योजनाओं का नतीजा हवाहवाई होकर रह जाता है। कुछ समय पूर्व अम्बेडकरनगर जनपद में सम्मनपुर थानाक्षेत्र के अंतर्गत आजमगढ़-अकबरपुर राजमार्ग पर ज्योतिबाफुले राजकीय इंटर कॉलेज के समीप हुई सड़क-दुर्घटना में आठ लोगों की दर्दनाक मृत्यु हो गई थी।

स्कॉर्पियो में सवार चालक सहित नौ लोग इलाज के लिए लखनऊ जा रहे थे। वे प्रातःकाल लगभग साढ़े चार बजे अपने गांव से लखनऊ के लिए रवाना हुए थे तथा खाली सड़क देखकर चालक तेज रफ्तार से गाड़ी चला रहा था। अचानक अंधेरे में उक्त स्कॉर्पियो ज्योतिबाफुले राजकीय इंटर कॉलेज के पास सड़क पर आगे मिट्टी से लदी जा रही ट्रॉली में घुस गई। टक्कर इतनी जोर की थी कि स्कॉर्पियो के परखच्चे उड़ गए तथा दो महिलाओं और बच्चों समेत कुल छह लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी। बाद में दो अन्य लोग भी जीवित नहीं बचे। टक्कर की आवाज सुनकर स्थानीय लोग दौड़कर वहां पहुंचे तथा सूचना पाकर पुलिस भी पहुंच गई। बताया जाता है कि स्कॉर्पियो जिस ट्राली से भिड़ी, उसे अंधेरे में चालक देख नहीं पाया। ट्राली के पीछे कोई प्रकाष का संकेत नहीं था, इसलिए चालक समझ नहीं पाया कि आगे मिट्टी से लदी ट्राली जा रही है।


राजमार्गाें पर ट्रालियों से टकराकर बड़ी संख्या में वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते हैं तथा बड़ी संख्या में ही लोगों की जानें जाती हैं और लोग घायल होते हैं। मैं सड़क मार्ग से काफी यात्राएं करता हूं और रास्ते में तरह-तरह की दुर्घटनाओं के दृष्य मिलते हैं। बड़ी संख्या ऐसी दुर्घटनाओं की होती है, जिनमें वाहन ट्रालियों से टकरा गए होते हैं। वैसी दुर्घटनाओं की बहुत कम खबरें अखबारों में आ पाती हैं।

ट्रालियों से वाहनों के टकराने का मुख्य कारण यह होता है कि ट्रालियों के पीछे प्रकाष का कोई संकेत नहीं होता है, अतः अंधकार में वाहनों को वे ट्रालियां दिखाई नहीं देतीं तथा उनसे टक्कर हो जाती है। ट्रालियां चाहे आगे जा रही हों अथवा किनारे खड़ी हों, उनके पीछे कोई प्रकाष-संकेत न होने के कारण वे अंधेरे में नहीं दिखाई देतीं। जाड़ों में कुहरे के समय ऐसी दुर्घटनाओं की भरमार हो जाती है। ट्रकों की तरह ट्रैक्टर-ट्रालियां भी राजमार्गाें पर मौत का परवाना बनी हुई हैं।

मैं विगत लगभग तीन दशकों में शासन व प्रशासन को, विषेश रूप से परिवहन विभाग को इस आषय के सैकड़ों पत्र लिख चुका हूं कि ट्रालियों के पीछे किसी रूप में प्रकाष की व्यवस्था अनिवार्य की जाय अथवा यह अनिवार्यता कर दी जाय कि ट्रालियों के पीछे रेडिएम की चौड़ी पट्टी लगाई जाय। उक्त पट्टी ट्रालियों के पीछे दोनों छोरों पर लगाई जाय, ताकि अंधेरे में ट्राली व उसकी चौड़ाई का पूरा अनुमान लग सके। ऐसा होने पर ट्रालियों से टकराकर होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुष लग सकेगा। पहले मैं ट्रेन से यात्रा किया करता था, किन्तु ट्रेनों की लेटलतीफी एवं कुलियों की ठगी से इतना परेषान हो गया कि ट्रेन के बजाय बस द्वारा यात्रा करने लगा।

किन्तु बसों का भी बुरा हाल झेलना पड़ा। एक तो बसें प्रायः रास्ते में खराब हो जाती थीं तथा दूसरे, बस-चालक व परिचालक मुफ्त में खाने के लिए ढाबों पर देर तक बस रोक कर फालतू समय नश्ट करते थे। ऊबकर मैंने चौपहिया वाहन से सफर शुरू किया। किन्तु इनमें भी दो भीशण कश्ट झेलने पड़ते हैं। प्रायः सड़कें छोटे-बड़े गड्ढों से भरी होती हैं, जिन पर वाहन बड़ी कठिनाई से चल पाते हैं।
दूसरी घोर यातना ट्रकों से मिलती है। वस्तुतः ट्रकों ने सड़कों का सत्यानाष कर डाला है।

वे तो सड़कों की दुष्मन हैं। ‘ओवरलोडिंग’ से ट्रकें सड़कों का विनाष तो करती ही हैं, अकसर कोई ट्रक रास्ते में खराब हो जाती है तो उसके कारण मीलों लम्बा जाम लग जाता है। लगभग हर यात्रा में मुझे सड़कों पर कहीं न कहीं, किसी न किसी कारणवश लम्बा जाम झेलना पड़ता है। जाम इतना लम्बा होता है कि पीछे वालों को कुछ पता नहीं लग पाता कि जाम का कारण क्या है तथा रास्ता कब खुलेगा? पुलिस के कहीं दर्षन नहीं होते तथा होते भी हैं तो वह ट्रकों से वसूली करने में लिप्त रहती है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे पुलिसजनों की एकमात्र ड्यूटी ट्रकों से वसूली करना है। पुलिस को पटाकर ट्रक-चालक सड़कों पर जमकर मनमानी करते हैं।

रास्ते के ढाबों पर वे सड़क के दोनों ओर आड़ी-तिरछी ट्रकें खड़ी कर देते हैं, जिनके कारण अन्य वाहनों का वहां से गुजरना मुष्किल हो जाता है। प्रेषरहॉर्नाें पर अदालतों ने पाबंदी लगा रखी है, लेकिन ट्रकों में उनका खुलकर प्रयोग होता है। प्रेषरहॉर्नाें का तो निजी बसों के अलावा सरकारी बसों में भी जमकर इस्तेमाल हो रहा है। बसें षहरों से गुजरते समय भी धड़ल्ले से प्रेषरहॉर्नाें का भयंकर षोर पैदा करती हैं, लेकिन उनके विरुद्ध कभी कार्रवाई नहीं होती। मैं इस मामले में भी षासन-प्रषासन तथा परिवहन व यातायात विभागों को सैकड़ों पत्र लिख चुका हूं।

सड़कों पर अकसर ऐसे चार-पहिया वाहन दिखाई देते हैं, रात में जिनकी दाहिनी ओर की लाइट खराब होने के कारण बंद रहती है। रात में जब वैसे वाहन सामने से आ रहे होते हैं तो विपरीत दिषा से आने वाले वाहन को अंधेरे में सामने से आ रहे वाहन में एक बत्ती जलती देखकर आभास होता है कि कोई बाइक या स्कूटर जा रहा है। गलत अनुमान के कारण वह वाहन उस एक बत्ती वाले चौपहिया वाहन से टकरा जाता है तथा जानलेवा दुर्घटना हो जाती है। ऐसी प्राणघातक दुर्घटनाएं अकसर घटित होती हैं। बुझी हुई एक बत्ती वाले चौपहिया वाहन रातों में बेखटके घूमते हैं और लोगों की जान ले लेते हैं।

राजमार्गाें पर गतिरोधकों(स्पीडब्रेकर) का निर्माण प्रतिबंधित है, किन्तु षहरों की सड़कों की तरह अब राजमार्गाें पर भी कहीं-कहीं गतिरोधक बनाए जाने लगे हैं। षहरों में सड़कों पर गतिरोधक मानकों के बिलकुल विपरीत बनाए जाते हैं। गतिरोधकों का मानक यह है कि उनकी ऊंचाई मात्र छह इंच हो तथा दोनों ओर पर्याप्त दूरी तक ढाल हो, ताकि गतिरोधक पार करते समय पार करने वाले वाहन को झटका न लगे। गतिरोधकों पर ‘जेब्रा पेंटिंग’ होनी चाहिए तथा उन पर पर्याप्त प्रकाष की व्यवस्था भी रहनी चाहिए।

गतिरोधकों से पहले यह सूचनापट लगा होना चाहिए कि आगे गतिरोधक है। सच्चाई यह है कि षासन, जिला प्रशसन, परिवहन विभाग, यातायात विभाग, किसी को जनता के हित की कोई चिंता या परवाह नहीं होती है, जिसके परिणामस्वरूप सड़कों से यात्रा करना नरक भोगना हो गया है तथा राजमार्ग दुर्घटनामुक्त नहीं हो पा रहे हैं। होना तो यह चाहिए कि दुर्घटनाओं के लिए अफसरों को जिम्मेदार मानकर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाय।

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