संजाल और भ्रम का भंवर

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संजाल और भ्रम का भंवर
संजाल और भ्रम का भंवर
विजय गर्ग
विजय गर्ग

सूचना पारंपरिक जनसंचार माध्यमों में सूचना पाने के लिए व्यक्ति को अलग समय निकालना पड़ता था। मगर आज डिजिटल मीडिया के जरिए व्यक्ति का सूचनाओं से अनवरत जुड़ाव बना रहता है। इसमें ‘रील’, ‘शार्ट’ जैसे वीडियो प्रारूप पहुंच के मामले में सबसे प्रभावी हो चले हैं। हालांकि, सोशल मीडिया के उभार से सूचनाओं पर सांस्थानिक कब्जा कम होता गया और इस विकेंद्रीकरण का लाभ समाज में व्यक्तिगत स्तर तक पहुंचा है। डिजिटल मीडिया की सर्वाधिक उपयोगिता यह है कि इसके जरिए न्यूनतम समय में वैश्विक पहुंच संभव है। मगर यह भी है कि सोशल मीडिया की सूचनाएं ही सबसे अधिक संदिग्ध हैं। इन खतरों का कोई समाधान निकला भी न था कि इसमें कृत्रिम मेधा की रचनात्मकता और ‘डीप फेक’ की धूर्तताएं भी शामिल हो गईं। अब हर व्यक्ति, जिसके हाथ में स्मार्टफोन है, वह पत्रकार भी है और प्रसारक भी अब कोई भी पेशा ऐसा नहीं है, जिसका विशेषज्ञ ‘यूट्यूब पर न मिल जाए। संजाल और भ्रम का भंवर

सत्य इसकी सकारात्मकता तो उत्साहजनक हो सकती है, क्योंकि कोई चिकित्सक, वकील, चार्टड अकाउंटेंट, सिविल अभियंता, तकनीकी विशेषज्ञ जैसा अति व्यावसायिक व्यक्ति प्रायः निशुल्क वीडियो समाज के लिए परोस रहा है। बदले में उसकी अपेक्षा अपने दर्शकों से महज यह है कि वह उस वीडियो को पसंद और प्रसारित करे और उसके उस चैनल की सदस्यता ग्रहण करे। इन्हीं मानकों पर उस वीडियो का अर्थ-तंत्र संचालित होता है। ऐसे लोगों को ‘यूट्यूबर’ कहा जा रहा है, जो एक पूर्णरूपेण पेशा बन चुका “और अनेक ऐसे लोकप्रिय ‘यूट्यूबर’ या डिजिटल वक्ता, जिनकी सामाजिक उपयोगिता बनती है, उन्हें ‘सोशल मीडिया एन्फ्लूएंसर’ की संज्ञा दी जा रही है और सरकारें उनको उनकी सामाजिक भूमिकाओं को देखते हुए अलग से सम्मानित भी कर रही हैं। जाहिर है कि डिजिटल माध्यम सिर्फ एक वैकल्पिक माध्यम नहीं, बल्कि पूंजी, यश और सत्ता प्राप्ति का माध्यम भी बन चुका है। यही कारण है कि में सैकड़ों मुख्यधारा के पत्रकार, बुद्धिजीवी, दूसरे पेशे के लोग यूट्यूब आदि माध्यमों के लिए वीडियो, और ‘रील’ बनाने में व्यस्त हो चुके हैं, बल्कि स्थापित चैनलों के अपने यूट्यूब चैनल भी समांतर प्रसारण में हैं और लाभ कमा रहे हैं।

शार्ट इस पूरी प्रक्रिया में पूंजी और सत्ता की सहभागिता ने डिजिटल मीडिया को संदिग्ध, उबाऊ और भ्रामक बनाया है। आज इसमें शामिल शातिर लोगों ने इसे अपने निजी अभियानों की शरणस्थली बना दिया है, जिनकी मंशा सामाजिक सरोकार से अधिक भेड़चाल वाला दर्शक वर्ग तैयार करना है। लोकतंत्र में तथ्यपरक विश्लेषण, सत्याग्रही रिपोर्टिंग से अधिक अपनी तात्कालिक जरूरत और निष्ठा के अनुरूप जनमत तैयार करने का उपक्रम यहां सामान्य सी परिघटना होती जा रही है। टेलीविजन की टीआरपी वाली बीमारी का समाधान हम खोज भी नहीं पाए थे, कि इससे अधिक संक्रामक बीमारी यूट्यूब वाली पत्रकारिता में शामिल हो चुकी है, जिसमें कई बार हिंसक, सनसनी और उन्मादी ‘थंबनेल’ लगाकर वैसे पत्रकार भी अपना वीडियो परोस रहे हैं, जिनकी कभी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा रही है।

दूसरी तरफ, इंटरनेट की दुनिया में सोशल मीडिया पर समाचारों के शीर्षक ऐसे तैयार किए जाते हैं, जिसमें सूचनाएं परोसने से अधिक छिपाने का यत्न होता है, ताकि पाठक तुरंत उस लिंक को खोले और अधिक समय तक खोले रखे। इन शीर्षकों को आकर्षक बनाने में न्यूनतम भाषाई संजीदगी बनाए रखना तो दूर, सामान्य स्पष्टता की कमी होती है। ऐसे डिजिटल सामग्री निर्माता पत्रकार या समाजसेवी से अधिक सूचनाओं के आखेटक लगते हैं, जिनकी प्राथमिकता में सब कुछ शामिल हो सकता है, समाज का हित नहीं। यह हाल तो शिक्षित तबके का है, जबकि यहां ऐसा तबका भी तेजी उभरा है, जो डिजिटल मीडिया को अपनी कुंठा, अश्लीलता, खुराफात, करतब को परोसने का सहज माध्यम बना चुका है। इसका दर्शक वर्ग भी है और फलस्वरूप पूंजी का लाभ भी। संजाल और भ्रम का भंवर संजाल और भ्रम का भंवर

‘रील’ और ‘शार्ट’ के माध्यम से यह तबका डिजिटल मीडिया के लिए एक संक्रामक बीमारी सिद्ध हो रहा है। अधकचरी समझ के आधार पर धर्म, संप्रदाय, जाति का दंभ यहां खुलेआम तैर रहा है। फूहड़ चुटकुलों, शेरो-शायरी, अश्लील लोकगीतों से बनी ‘रील’https://nishpakshdastak.com/child-starvation-becoming-a-difficult-challenge/ की भरमार ने इस प्रदूषण को और फैलाया है। खुराफात और करतब के नशे का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक रपट के अनुसार उत्तराखंड में रेल से होने वाली दुर्घटनाओं में 67 फीसद की वृद्धि हुई है। इसका कारण लोगों का ट्रेन के इर्दगिर्द ‘सेल्फी’ लेना और ‘रील’ बनाना है। एक शोध में पाया गया कि अक्तूबर 2011 से नवंबर 2017 के मध्य 137 मौतें सिर्फ सेल्फी लेने के क्रम में हुई थीं और मरने वालों की औसत उम्र लगभग 22 वर्ष थी। यह रहा है, कि कुछ दिनोंदिन नशा आकर्षक वीडियो और फोटो मिल जाए और इसे डिजिटल मीडिया पर डाल कर ‘वायरल’ हुआ जा सके। ऐसे अनेक शरारत भरे वीडियो बनाने के क्रम में आसपास के लोग भी दुर्घटना के शिकार होते हैं।

डिजिटल मीडिया ने एक नई संस्कृति को प्रश्रय दिया है, जिसमें नए प्रतीक, प्रतिमान और मूल्यबोध के साथ नए मुहावरे और भाषा-शैली विकसित हो रही है, जो आम समाज के लिए सहज नहीं है, बल्कि कई मामलों में इसमें व्याप्त भाषिक और कथ्य के संक्षिप्तीकरण की प्रवृत्ति से सूचनाओं की अभिव्यक्ति से अधिक भ्रम फैल रहा है। सामाजिक बुराइयों का विस्तार अलग से हो रहा है। हालांकि डिजिटल मीडिया के सामग्री निर्माताओं में अनेक ऐसे भी हैं, जो अपने सत्याग्रही रुख और सकारात्मक भूमिकाओं के लिए प्रतिबद्ध हैं। मगर इनमें एक बहुत ही शातिर तबका हैं, जो अपने निजी एजेंडे, कुंठा को लेकर सक्रिय है, जो किसी सार्वजनिक बयान, तथ्य और प्रसंग से जुड़े वीडियो/तस्वीर को संपादित करके अपने उद्देश्य के अनुकूल बना लेता है। भारत जैसे लोकतंत्र में, जहां हर छपे रको सत्य और प्रसारित वीडियो को अकाट्य मानकर चलने वालों की कमी नहीं है, यही शातिर तबका डीप फेक तकनीक से जिम्मेदार नेताओं के मुख से अपना प्रत्यारोपित झूठ बोलवा कर प्रसारित कर देता है।” इससे डिजिटल मीडिया पर संदेह, कुप्रचार, पक्षधरता, अनैतिक लाभ की मंशा के साथ चालाकी चुहलबाजी वाली मानसिकता उभर कर सामने आती है। हालांकि, सच्चाई इससे परे भी हो सकती है पर इसका वृहत्तर कि वह संवेदनशील जिज्ञासु समाज, जो तथ्यपरक और नुकसान यह तटस्थ सूचनाओं के लिए डिजिटल मीडिया से अपेक्षा पाल सकता था, उसे सिर्फ निराशा मिल रही है। लोकतंत्र में मीडिया की संसूचित और जागरूक समाज के निर्माण की आदर्श भूमिका से इतर डिजिटल मीडिया द्वारा सूचनाओं को अपनी निहित मंशा के अनुरूप मथने के बाद जो पानी सामने आ रहा है, उसे सजग व्यक्ति पीने से परहेज कर रहा और भोलीभाली जनता पीकर बीमार हो रही है। ऐसे में सत्ताओं की वह इच्छा अनायास ही पूरी होती दिख रही है, जिसमें वह अपने नागरिकों को सूचनाओं से वंचित करना चाहती हैं। जाहिर है, यह सब किसी भी स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए घातक और समाज के लिए बीमारी की तरह है। संजा ल और भ्रम का भंवर

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट