क्या आउटसोर्स सेवा निगम संवैधानिक है?

क्या आउटसोर्स सेवा निगम संवैधानिक है? यह सवाल अब सिर्फ कर्मचारियों की नौकरी तक सीमित नहीं, बल्कि समान अवसर, रोजगार की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता से भी जुड़ गया है। आउटसोर्सिंग के जरिए सरकारी विभागों में बड़ी संख्या में लोग सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी व्यवस्था संविधान के मूल सिद्धांतों और समानता के अधिकार के अनुरूप है? क्या आउटसोर्स कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारियों की तरह समान काम के लिए समान अधिकार मिलना चाहिए? इन्हीं सवालों के बीच आउटसोर्स सेवा निगम की संवैधानिक वैधता को लेकर बहस तेज हो रही है।

अजय सिंह

लखनऊ। देश के हर राज्य में आउटसोर्स सेवा निगम बनाने को लेकर बहस तेज हो गई है। सवाल है कि क्या सरकार द्वारा निगम बनाकर बिना विज्ञापन, बिना परीक्षा के भर्ती करना संविधान की मूल भावना के अनुरूप है? ओमा फाउंडेशन ग्रुप के सचिव ओम प्रकाश ने भारत के संविधान का हवाला देकर कहा संविधान विशेषज्ञों के अनुसार इसका विश्लेषण 3 अनुच्छेदों से करना होगा।

1.अनुच्छेद 14 और 16 – समानता का अधिकार: सरकारी नौकरी में खुली प्रतियोगिता और समान अवसर जरूरी है। आउटसोर्स में अक्सर बिना विज्ञापन भर्ती होती है।

2.अनुच्छेद 309 – भर्ती के नियम: सरकारी पदों पर भर्ती के नियम राज्यपाल बनाते हैं। आउटसोर्स से इस प्रक्रिया को बायपास किया जाता है।
3.अनुच्छेद 16(4) – आरक्षण: नियमित भर्ती में SC/ST/OBC आरक्षण अनिवार्य है, आउटसोर्स निगम में आरक्षण लागू नहीं होता।

सुप्रीम कोर्ट का रुख कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि स्थायी प्रकृति के काम पर अस्थायी कर्मचारी रखना शोषण है। समान काम का समान वेतन लागू होना चाहिए।

सरकारें निगम क्यों बना रही हैं? इसके 4 बड़े कारण

1. आर्थिक कारण और सैलरी का गणित एक नियमित कर्मचारी की लागत आउटसोर्स से 2.5 से 3 गुना ज्यादा है।

  • नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को वेतन 25-30 हजार + महंगाई भत्ता (DA) 50% + मकान किराया (HRA) + यात्रा भत्ता (TA) + हर 10 साल में वेतन आयोग का लाभ + ग्रेच्युटी + मेडिकल + साल भर की छुट्टियां
  • वहीं आउटसोर्स कर्मचारी को सिर्फ 10 से 12 हजार न्यूनतम मजदूरी, न DA, न TA, न HRA, न पेंशन।

2. पेंशन का बोझ – 7वें वेतन आयोग के बाद केंद्र का वेतन बिल 3 गुना बढ़ा। पुरानी पेंशन योजना (OPS) में आजीवन पेंशन, NPS में भी सरकार को 14% देना पड़ता है। आउटसोर्स में पेंशन की जिम्मेदारी ही खत्म हो जाती है। वित्त विभाग के लिए यह भविष्य के खर्च से मुक्ति है।

3. भर्ती में देरी और आरक्षण का विवाद – आरक्षण रोस्टर, कोर्ट केस और पेपर लीक के कारण 10-15 साल भर्ती अटकी रहती हैं। आउटसोर्स में न विज्ञापन, न परीक्षा, न आरक्षण का झंझट।

4. जवाबदेही से बचना – अनुच्छेद 311 नियमित कर्मचारी को सुरक्षा देता है, उसे हटाना कठिन है। आउटसोर्स को 1 महीने के नोटिस पर हटाया जा सकता है। यही लचीलापन अफसरों को पसंद है।

दूसरा पहलू – कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यह “संविधान के शब्दों का पालन और आत्मा को बायपास” करने जैसा है। सरकार आदर्श नियोक्ता (Model Employer) होनी चाहिए, लेकिन खुद ही ठेकेदार बन गई है। इसी को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में “छुपा हुआ शोषण, जहाँ सरकार खुद ठेकेदार बन जाती है” कहा था।

इसी कारण कई हाईकोर्ट ने आउटसोर्स को “बैकडोर भर्ती” कहा और रोक लगाई है। अब लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में है। ओमा फाउंडेशन ग्रुप के अध्यक्ष चन्दन कुमार के साथ अन्य सदस्य अमर नाथ, भागीरथ बुद्धसेन गौतम समेत कई अन्य लोग मौजूद रहे।

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