अंग्रजों ने भारत को कितना लूटा

200 साल तक देश में अत्याचार करने वाले अंग्रेज वापस लौट तो गए, लेकिन इतने समय में उन्होंने हमारा काफी धन लूट लिया । जानी-मानी अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने अपने निबंध में लिखा कि अंग्रेज़ों ने भारत का करीब 45 ट्रिलियन डॉलर (3,19,29,75,00,00,00,000.50 रुपये) लूटा ।

नरेन्द्र भदौरिया


संसार की जानी मानी अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने भारत से अंग्रेजों द्वारा लूट कर ले जायी गयी संपत्तियों का गहन शोध किया है । इस शोध को संसार के अन्य अर्थशास्त्री अति विश्वशनीय शोध के रूप में मान्य करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने विशेष शोध के उपरान्त लिखा है कि अंग्रेज भारत से 200 वर्षों में लगभग 45 ट्रिलियन यानी 319 नील रुपये की धनराशि अपने देश ले गये । भारत से ले जायी गयी सम्पदा से इंग्लैण्ड की अर्थव्यवस्था बहुत उन्नत हो गयी । लूटी गयी सम्पदा में सोने चांदी और रत्नाभूषणों का आकलन ही चौकाने वाला है । अंग्रेजों के आने से पहले भारत इतना सम्पन्न था कि विश्व की कुल अर्थव्यवस्था में तीन चौथाई अंश भारत का था । अंग्रेजों ने हजारों वर्षों से उच्च नैतिक आदर्शों के आधार पर उत्पादन और व्यापार करने वाले भारत के अर्थतन्त्र को लूटने के साथ पूरी तरह विनष्ट कर दिया । किसानों से अन्न की वसूली जबरन करके बीज तक छीन लिये । उद्यमियों को कंगाल बना डाला । व्यापारी निढाल कर दिये गये । राजघरानों के खजानों को खाली कर दिया गया। जिस देश से सारे संसार की अर्थ व्यवस्था चलती थी उसके स्वतन्त्र तन्त्र को ग्रहण लगा दिया ।

आपने सुना होगा कि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, लेकिन ब्रिटिश शासन के बाद भारत का काफी धन लूट लिया गया।वैसे तो इसका अंदाजा लगाना ही काफी मुश्किल है, लेकिन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने वो संभावित रकम बताई, जितनी भारत से लूटी गई है । औपनिवेशिक भारत और ब्रिटेन के बीच राजकोषीय संबंधों पर शोध करने वाली पटनायक ने निंबध लिखा है, जिसमें उन्होंने इस बात का जिक्र किया है कि आखिर ब्रिटिश शासकों ने भारत से कितना धन लूटा है । ब्रिटिश शासकों की ओर से लूटे गए खजाने की वजह से अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ा है ।


अर्थशास्त्रियों ने भारत में अंग्रेजों की लूट पर बहुत से शोध किये हैं । एक शोध के अनुसार भारत को अंग्रेजों ने इतना कंगाल बनाया कि दो बार भयंकर सूखे और अकाल के कारण ब्रिटिश सत्ता के अधीन इस देश में लगभग तीन करोड़ लोग भूख से तड़प तड़प कर मर गये । जबकि इन्हीं वर्षों में भारत से जबरदस्ती वसूल कर इतना अनाज इंग्लैण्ड ले जाया गया कि उसे वहां रखने के लिए गोदाम नहीं बचे थे इसलिए समुद्र में ही तीन विशाल जहाज अनाज भरे लंगर डाले खड़े रखे गये । तब वहां की संसद में भारत के अकाल और यहां के अनाज से भरे जहाजों की बात उठी थी । जिसका उत्तर देते हुए उस समय के प्रधानमन्त्री बिस्टन चर्चिल ने कहा था कि अंग्रेज संसार की सर्वोच्च जाति और सर्वोच्च महारानी की प्रजा हैं । उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए भारतीयों से अनाज वसूल कर लाया गया है । कीड़ों मकोड़ों की भाँति मरते लोगों की चिन्ता इस देश के चन्द लोग संसद में करें यह अनुचित प्रलाप है ।

यह बात द्वितीय विश्वयुद्ध के समय की है । जिस युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने की वकालत भारत के महान अहिंसावादी नेता मोहन दास करम चन्द गाँधी ने भी की थी । भारत की सेना को अंग्रेज अपने पक्ष में लड़ने के लिए अनेक अग्रिम मोर्चों पर ले गये थे । जहां अंग्रेजों के लिए लड़ते हुए 45 हजार से अधिक भारतीय सपूत मारे गये थे अथवा विषम परिस्थितियों में असमय मर गये थे । उस समय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने इसका विरोध किया था । तब अंग्रेजों को गाँधी जी का साथ बड़ी सान्त्वना देने वाला सिद्ध हुआ था । गाँधी जी ने भारत की जनता से कहा था हम ब्रिटिश महारानी की सत्ता के जब तक अधीन हैं हमें उनके हितों की रक्षा करनी चाहिए ।

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