मतांतरण करके मिलेगा आरक्षण? मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला!

हृदयनारायण दीक्षित
हृदयनारायण दीक्षित

मतांतरण से आरक्षण नहीं मिलता। इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति अपना मत बदल कर मुसलमान हो सकता है लेकिन पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं रह जाता। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि ईसाई मिशनरियों और इस्लामी उपदेशकों ने सदियों तक अपने अपने पंथ की प्रशंसा की है कि उनके यहां सामाजिक समता है। बराबरी है। भेदभाव नहीं है। हिन्दुओं में जाति व्यवस्था है। कोर्ट ने कहा है कि उसका मत है कि कुछ वर्गों को पिछड़ा और कुछ को अगड़ा बताना कुरान की शिक्षा के विपरीत है। फिर इस्लाम का तो दावा ही बराबरी वाला समाज बनाना है। बहुत लम्बे समय से ईसाई और इस्लामी धर्म उपदेशक धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी पिछड़े वर्गों की सुविधाएं मांगते रहे हैं। भिन्न भिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं और फैसले सुनाए हैं। लेकिन राजनीतिक दलतंत्र द्वारा धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी आरक्षण की सुविधा मांगी जाती रही है। इस दफा न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मतांतरण करने से किसी व्यक्ति का वर्ग नहीं बदलता और मतांतरित व्यक्ति को पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।


मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के मार्च 2024 के आदेश को असंवैधानिक बताया है और उसे रद्द कर दिया है। सरकारी आदेश में मतांतरण करने वाले व्यक्ति को मुस्लिम पिछड़े वर्ग का सदस्य माना गया था। मतांतरित व्यक्ति को भी पिछड़े वर्गों के रूप में मान्यता देने का प्रावधान किया गया था। यह चर्चित फैसला मद्रास हाई कोर्ट की पीठ ने 25 जून को सुनाया है। कोर्ट ने यह निर्णय सम्यक विचारोपरान्त एक ऐसे मामले में दिया है, जिसमें एक व्यक्ति, जिसका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ था और बाद में उसने हिन्दू धर्म छोड़ कर फिर से अपना नाम समीर अहमद रख लिया था। मुसलमान हो जाने के बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का सदस्य बताया है। उसने अपने तहसीलदार से पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र की मांग की। तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। तब वो हाई कोर्ट पहुंचा। तमिलनाडु सरकार ने अपने आदेश में प्रावधान किया था कि अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग या डिनोटिफाइड समुदायों से आने वाले लोग यदि धर्मांतरण करते हैं, और इस्लाम धर्म अपनाते हैं, तो उन्हें भी पिछड़े वर्गों के रूप में आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। सरकार का तर्क था कि इससे मतांतरण करने वाले व्यक्तियों के भी अधिकार सुरक्षित रहेंगे। लेकिन कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी, और स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का आधार पंथ या मजहब नहीं होता। बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन होता है। कोर्ट ने साफ किया कि संवैधानिक श्रेणियों जैसे अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग को एक साथ मिला कर नई श्रेणी बनाना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है।


मद्रास हाई कोर्ट ने ही 1951 के फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि, “जब कोई हिन्दू इस्लाम अपनाता है, तो वह सिर्फ मुसलमान बनता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठा जाति के आधार पर नहीं होती। हिन्दू धर्म छोड़ते ही वह अपनी मूल जाति का सदस्य नहीं रह जाता।“ आरक्षण का मसला भारत की संविधान सभा में भी आया था। मजहबी आधार पर ही देश का विभाजन हो चुका था। संविधान सभा बड़े उदास क्षणों में आरक्षण पर विचार कर रही थी। संविधान सभा ने सरदार पटेल की अगुवाई में अल्पसंख्यकों के आरक्षण के मुद्दे पर विचार करने के लिए एक समिति बनाई थी। समिति ने अपनी सिफारिश में मजहबी आरक्षण को सिरे से खारिज कर दिया था।

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सभा की अल्पसंख्यक अधिकारों, मूलाधिकारों संबंधी समिति के सभापति सरदार पटेल ने संविधान सभा में समिति की रिपोर्ट (25 मई, 1949) पेश की। लगातार दो दिन (25 व 26 मई, 1949) बहस हुई। जगत नारायण लाल ने कहा, “भारत एक लौकिक (सेकुलर) राज्य होगा। उसके बाद रक्षणों की कोई मांग नहीं होनी चाहिए। जहाँ तक अनु. जातियों का प्रश्न है उन्हें आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए होने के कारण ही रक्षण दिया गया है।“ ज्यादातर सदस्यों ने अनु. जाति के अस्थाई आरक्षण को सही बताया, लेकिन ‘आरक्षण‘ की मूल भावना को कोसा। नजीरुद्दीन अहमद ने कहा, “मैं समझता हूँ कि किसी प्रकार के रक्षण स्वस्थ राजनीतिक विकास के प्रतिकूल हैं। उनसे एक प्रकार की हीन भावना प्रकट होती है। …..श्रीमान रक्षण ऐसा रक्षा उपाय है जिससे वह वस्तु जिसकी रक्षा की जाती है वह नष्ट हो जाती है। जहाँ तक अनु. जातियों का संबंध है, हमें कोई शिकायत नहीं है।“ जेड.एच. लारी ने मुस्लिम आरक्षण की पैरवी करते हुए कहा, “आपको अनु. जाति के हितों की चिंता है। मुसलमानों के हितों की परवाह नहीं। अनु. जाति के स्थान रक्षण सिद्धांत के साथ क्या आप यह भी नहीं स्वीकार करते कि आरक्षण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध नहीं है?“

आरक्षण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होता है। आरक्षण एक विशेष अस्थाई उपाय है। इसके नफा-नुकसान पर सम्यक् विचार नहीं हुआ।
लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे सामाजिक पुनर्निर्माण का औजार बनाया। अनुसूचित जातियों/जनजातियों को जन्मना आधारित अस्थाई आरक्षण मिला। पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोग बनाने की व्यवस्था (अनु. 340) की गई। पं. नेहरू के समय (1953) पिछड़े वर्गों की खोज के लिए काका कालेलकर आयोग बना। आयोग के कई सदस्य जन्मना जाति को पिछड़ेपन का आधार बनाने पर असहमत थे। आयोग ने राष्ट्रपति को लिखा, “समानता वाले समाज की ओर प्रगति में जाति प्रथा बाधा है। कुछ निश्चित जातियों को पिछड़ा मानने से यह हो सकता है कि हम जाति प्रथा के आधार पर भेदभाव को सदा के लिए बनाए रखें।“ नेहरू सरकार ने जाति के अलावा पिछड़ेपन का आधार जाँचने की कोई दीगर कसौटी खोजने की बात की।

वी.पी. मण्डल के नेतृत्व में दूसरा आयोग बना। मण्डल आयोग की रिपोर्ट (1980) में ‘जाति‘ को पिछड़ेपन का आधार बनाया गया। आयोग ने पिछड़ी जातियों की सूची भी बनाई। मण्डल ने गरीबी हटाने के राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आरक्षण से अलग रखने की आश्चर्यजनक बात कही, “गरीबी हटाने की राष्ट्रीय समस्या के अंतर्गत अन्य पिछड़ी जातियों को ऊपर उठाने की समस्या आती है। पर यह बात अंशतः ही सही है। अन्य पिछड़ी जातियों का अभावग्रस्त होना एक अलग बड़ी राष्ट्रीय समस्या है।“ (रिपोर्ट, पृ. 62) यानी देश के बाकी जनों की गरीबी अलग समस्या है। पिछड़ी जातियों की गरीबी भी विचारणीय है। लेकिन मजहबी आधार पर आरक्षण मान्य नहीं है।

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