देश का राष्ट्रीय खेल घोषित हो हॉकी

श्याम कुमार

टोक्यो। ओलम्पिक में भारत की हॉकी टीम को कांस्य पदक मिलने से हमारे देश में मृत अवस्था में पड़ी हुई हॉकी को जैसे पुनर्जीवन प्राप्त हो गया। जिस प्रकार हम भारत के प्राचीन गौरवपूर्ण इतिहास को भूल गए थे, उसी प्रकार हमने अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी का स्वर्णिम इतिहास विस्मृत कर दिया था। इतना ही नहीं, जिस प्रकार हम प्राचीन भारत में स्वर्ण युग लाने वाले सम्राट विक्रमादित्य, सम्राट समुद्रगुप्त आदि अनेक महान राष्ट्रनायकों को भूल गए, उसी प्रकार हॉकी के जीवन में स्वर्णयुग लाने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद को भी भूल गए थे। नहीं तो क्या कारण था कि कोई मांग हुए बगैर सचिन तेंदुलकर को ‘भारत रत्न’ का सर्वाेच्च राष्ट्रीय सम्मान दे दिया, किन्तु दशकों से देशवासी मांग कर रहे हैं कि ध्यान चंद को ‘भारत रत्न’ दिया जाय, पर उस मांग को कोई तवज्जो नहीं दी गई।

क्रिकेट ने कुष्ती, कबड्डी आदि तमाम भारतीय खेलों का तो विनाश किया ही, हॉकी व फुटबाॅल को भी उसने बुरी तरह डस लिया। यही कारण है कि आज की पीढ़ी को यह भी याद नहीं रह गया है भारत स्वर्ण पदक जीतकर दीर्घकाल तक हॉकी में विष्व में सिरमौर रहा है तथा इसका एकमात्र श्रेय मेजर ध्यान चंद को था। पूरा विश्व ध्यान चंद के हॉकी -कौशल पर चकित था और उन्हें हॉकी का जादूगर मानता था। लेकिन नेहरू वंश अपने से अधिक महान किसी को समझता ही नहीं था तथा यही कारण है कि प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू एवं इंदिरा गांधी ने बेशर्मी से खुद को ‘भारत रत्न’ दे दिया था, लेकिन दशकों से जनता की मांग होने के बावजूद ध्यान चंद को यह सर्वाेच्च राष्ट्रीय सम्मान नहीं प्रदान किया गया। कांग्रेस सरकार ने देश के सबसे बड़े खेल-पुरस्कार का नाम भी ध्यान चंद के नाम पर रखने के बजाय दागी प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नाम पर रख दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस पाप को धो डाला है तथा जनभावना का आदर करते हुए सर्वाेच्च खेल पुरस्कार का नाम ‘राजीव गांधी खेल पुरस्कार’ से बदलकर ‘ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ कर दिया है। नेहरू वंश का तलुआ चाटने वालों को छोड़कर सम्पूर्ण देश ने मोदी सरकार के इस कदम का जोरदार स्वागत किया है।

टोक्यो -ओलम्पिक में भारतीय हॉकी टीम को कांस्य पदक मिलने से हॉकी के पक्ष में जो वातावरण बना है, उसे कायम रखना अब मोदी सरकार का बहुत बड़ा दायित्व है। ऐसी रणनीति बनाई जानी चाहिए कि जिस किसी प्रकार से संभव हो, देश में हॉकी को बढ़ावा दिया जाय तथा उसके पक्ष में जो जाग्रति आई है, वह ठंडी न पड़ने पाए। मुझे अपने बचपन की याद है, हमारे मामा व अन्य तमाम रिष्तेदार नित्य हॉकी या फुटबाॅल खेलने जाया करते थे। इन दो खेलों तथा कबड्डी के लिए सर्वत्र दीवानगी रहती थी। शिक्षणसंस्थाओं में जितना पढ़ाई पर जोर दिया जाता था, उतना ही जोर खेलों व व्यायाम(पीटी) पर दिया जाता था। प्राणायाम का गुण समाहित होने के कारण कबड्डी को जबरदस्त महत्व प्राप्त था। दौड़ प्रतियोगिताएं, कूद प्रतियोगिताएं तथा शरीर को मजबूत बनाने वाली इस प्रकार की अन्य अनेक प्रतियोगिताएं खूब हुआ करती थीं। षिक्षणसंस्थाओं में ही नहीं, आम जनजीवन में भी कबड्डी आदि उपर्युक्त खेलों का बहुत व्यापक महत्व था। कुछ दशक पूर्व जब मैं ट्रेन द्वारा देश में कहीं जाता था तो ट्रेन से दिखाई देने वाले हर ग्रामीण क्षेत्र में कबड्डी व कुश्तियों के दृश्य दिखाई दिया करते थे। लेकिन सतर्कता नहीं बरती गई, जिसके परिणामस्वरूप उन खेलों की बलि लेते हुए सर्वत्र क्रिकेट हावी हो गया।

अब तो ट्रेन से जाते समय रास्ते में पड़ने वाले सभी ग्रामीण क्षेत्रों में कबड्डी-कुश्ती आदि के स्थान पर क्रिकेट के दृश्य दिखाई देते हैं। क्रिकेट एक तकनीकी खेल है, जिसका ज्ञान तो होता नहीं, बस ईंटें रखकर कहीं से कोई टूटाफूटा बल्ला लाकर अथवा बल्ले के बजाय डंडे आदि से ही सही, लड़के क्रिकेट खेलते हैं। इस प्रकार युवा पीढ़ी की शक्ति और समय बिलकुल फालतू नष्ट हो रहा है तथा इससे लड़कों के शरीर एवं स्वास्थ्य को कोई लाभ नहीं पहुंच पाता है। कांग्रेस सरकार को तो देशहित से कोई मतलब रहता नहीं था तथा उसका एकसूत्री कार्यक्रम नेहरू वंश को महान बताकर हर तरह से उसका प्रचार करना रहता था। इसका ताजा उदाहरण यह है कि मोदी सरकार ने जब ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ का नाम ‘ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार’ कर दिया तो महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन वाली षिवसेना सरकार ने बेशर्मी दिखाते हुए अपने यहां ‘राजीव गांधी खेल पुरस्कार’ शुरू करने की घोशणा की है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी हमारे देशी खेलों तथा हॉकी व फुटबाॅल को बढ़ावा देने के बजाय क्रिकेट पर ही अपना ध्यान केंद्रित करने में लग गई। केंद्र सरकार में क्रिकेटप्रेमी अनुराग ठाकुर के खेलमंत्री बन जाने से यह खतरा बढ़ गया है कि केंद्र सरकार अन्य खेलों के बजाय क्रिकेट में ही अधिक रुचि लेगी। केंद्र सरकार को चाहिए कि ‘बोर्ड आॅफ कंट्रोल फाॅर क्रिकेट इन इंडिया’(बीसीसीआई) को बाध्य करे कि उसके पास धन का जो भारी खजाना है, उसका आधा हिस्सा हॉकी , फुटबाॅल, कबड्डी, एथलेटिक्स आदि खेलों के उत्थान पर व्यय करे। इस समय सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि जो खिलाड़ी भाला फेंकने, भारोत्तोलन, दौड़ आदि में देश का नाम रोशन कर रहे हैं, वे बड़ी गरीबी में पले। उनके पास कोई साधन नहीं था, किन्तु अपने हौसले व घरवालों के त्याग के बल पर वे आगे बढ़ सके।

भारत सरकार या तो स्वयं आगे आकर इन खेलों एवं खिलाड़ियों को प्रोत्साहन व संरक्षण प्रदान करे अथवा कानून बनाकर ‘बोर्ड आॅफ कंट्रोल फाॅर क्रिकेट इन इंडिया’(बीसीसीआई) को बाध्य करे कि वह अपनी बेषुमान आमदनी का आधा हिस्सा इन खेलों और उसके खिलाड़ियों के हित में व्यय करे। अंत में महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार इस बार अवष्य देशवासियों की पुरानी मांग को पूरा करते हुए ध्यानचंद को ‘भारत रत्न’ का सर्वाेच्च राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करे, साथ ही हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा प्रदान किया जाय। मैंने जब पिछले दिनों फेसबुक पर हॉकी को राष्ट्रीय खेल घोशित किए जाने की मांग की तो कुछ लोगों ने टिप्पणी की कि हॉकी पहले से देश का राष्ट्रीय खेल है। किन्तु ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी हॉकी को राष्ट्रीय खेल घोषित किए जाने की मांग करते हुए स्पष्ट किया कि व्यवहार में जनमानस हॉकी को देश का राष्ट्रीय खेल समझता है, किन्तु यथार्थ में सरकार ने हॉकी को कभी भी राष्ट्रीय खेल की मान्यता नहीं प्रदान की। उल्लेखनीय है कि ओलम्पिक में जाने के लिए जब भारतीय हॉकी टीम को ‘स्पाॅन्सर’ नहीं मिल रहा था तो ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने हॉकी टीम को ओडिशा सरकार की ओर से स्पाॅन्सर किया।

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