हिन्दुत्व के पुरोधा अशोक सिंहल

अशोक सिंहल भारतीय सार्वजनिक जीवन में हिन्दुत्व विचारधारा और राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों में रहे। विश्व हिंदू परिषद के लंबे समय तक नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्होंने धार्मिक-सामाजिक मुद्दों को व्यापक जनआंदोलन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन, विचार और सार्वजनिक योगदान आज भी भारतीय राजनीति और समाज में चर्चा का विषय है।

बृजनन्दन राजू
बृजनन्दन राजू

अशोक सिंहल का नाम आते ही लोगों के मन मस्तिष्क पर राम मंदिर आन्दोलन का परिदृश्य आ जाता है। अशोक सिंहल श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के ही महानायक नहीं थे। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, सामाजिक समरसता के अग्रदूत, गो गंगा गायत्री के उपासक व हिन्दुत्व के पुरोधा थे। राम मंदिर आन्दोलन के माध्यम से उन्होंने हिन्दू समाज में शौर्य का जागरण किया। हिन्दू समाज जो जाति पांत में बंटा था। देश में उत्तर व दक्षिण का भेद था। राम मंदिर आन्दोलन ने सबको एक किया। ‘बच्चा—बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’। यह नारे देशभर में गूंजने लगा। सम्पूर्ण देश राममय हो गया। उन्होंने मंदिर आन्दोलन के माध्यम से देश को जगाने का काम किया।


अशोक सिंहल का जन्म 27 सितम्बर 1926 को आगरा में हुआ था। उनके पिता महावीर सिंघल शासकीय सेवा में उच्च पद पर थे। 1942 में प्रयाग में पढ़ाई के दौरान रज्जू भैय्या उन्हें लेकर संघ की शाखा में गये। रज्जू भैय्या के साथ ही 1943 में अशोक सिंहल ने संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष किया। संघ के वरिष्ठ प्रचारक बापूराव मोघे व भाऊराव देवरस का सानिध्य विद्यार्थी जीवन से रहा। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगा, तो अशोक सिंहल सत्याग्रह कर जेल गये। वहाँ से आकर उन्होंने बी.ई. अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और इसके बाद संघ के प्रचारक बन गये।


 गोरखपुर,वाराणसी व सहारनपुर में जिला प्रचारक रहे। प्रचारक जीवन का अधिकांश भाग सहारनपुर, कानपुर और दिल्ली में व्यतीत हुआ कानपुर में विभाग प्रचारक और संभाग प्रचारक रहे। दिल्ली के प्रान्त प्रचारक रहे। 1़981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम की घटना ने सम्पूर्ण देश को झकझोर कर रख दिया। क्योंकि वहां भेदभाव के कारण अनुसूचित समाज के 800 लोगों ने सामूहिक रूप से इस्लाम स्वीकार कर लिया था । इस घटना के बाद दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पूर्व उप प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा व कश्मीर के महाराजा कर्ण सिंह उपस्थित थे। सम्मेलन का सफल संयोजन दिल्ली प्रान्त प्रचारक के नाते अशोक सिंहल ने किया। इस कार्यक्रम के बाद उन्हें विश्व हिन्दू परिषद में भेजा गया। विहिप को उन्होंने नई ऊंचाई प्रदान की। अनेक क्षेत्रों में काम करने के लिए गोरक्षा,धर्मप्रसार,सामाजिक समरसता जैसे विहिप में कई आयाम प्रारम्भ कराये। विहिप के संयुक्त महामंत्री से लेकर महामंत्री,कार्यकारी अध्यक्ष,अध्यक्ष तथा जीवन के अंतिम सांस तक संरक्षक की भूमिका का निर्वहन किया।


जब उनकी योजना विहिप में हुई इसके बाद राम मंदिर आन्दोलन में संघ का सहभाग हो इसके लिए वह तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस से मिले। बाला साहब देवरस ने स्वीकृति दे दी। इसके बाद तो उन्होंने राम मंदिर आन्दोलन को अपना ध्येय मान लिया और इसके लिए प्राण—पण से जुट गये। देशभर में अहर्निश प्रवास,सतत चिंतन,पूज्य संतों से भेंट,आन्दोलन व अभियानों के साथ—साथ कानूनी लड़ाई भी जारी रखी। इसके साथ—साथ राजस्थान से पत्थरों को मंगाकर कार्यशाला में पत्थर तराशने का कार्य भी शुरू करा दिया। नेतृत्व की असाधारण क्षमता थी उनमें। उन्होंने जो तय कर लिया उस को पूरा किये बिना वह रूके नहीं फिर चाहे कितने भी संकट क्यों न आये हों। 1990 में मुलायम सिंह यादव ने घोषणा की कि अयोध्या में परिंदा पर भी नहीं मार सकता। इस घोषणा के बावजूद हजारों कार्यकर्ता तो अयोध्या पहुंचे ही अशोक सिंहल भी अयोध्या में प्रकट हो गए।  


 1984 में राम जानकी रथ यात्रा अयोध्या से निकाली गयी। कट्टरपंथियों की ओर से धमकियां मिलने लगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रीराम जानकी रथ यात्रा को सुरक्षा देने से इन्कार कर दिया। भेलसर पहुंचने से पहले ही यात्रा पर हमला भी हो गया। यात्रा की रक्षा के लिए सिंहल जी ने युवाओं का आहवान किया और बजरंग दल का गठन उन्होंने रास्ते में ही कर दिया। देश समाज व सनातन की रक्षा के लिए उनके अमूल्य योगदान को स्मरण करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दू परिषद ने अशोक सिंहल जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 27 सितम्बर 2026 से लेकर वर्ष भर के कार्यक्रमों की योजना बनायी है। अशोक सिंहल ने मतांतरण रोकने के लिए देशभर में जनजागरण किया। विहिप में धर्मजागरण आयाम शुरू कराया।

उनकी पहल पर बड़ी संख्या में पूज्य संतों ने सुदूर वनवासी क्षेत्रों में प्रवास किया। उसके कारण मतांतरण में कमी भी आयी और बड़ी संख्या में घरवापसी भी हुई। ज्ञान-विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने वेद विद्यालय प्रारम्भ कराये। सामाजिक समरसता के प्रेरणा पुंज थे। उनके ही निवेदन पर पूज्य संतों ने काशी में डोमराजा के यहां भोजन करना स्वीकार किया था। अवैद्यनाथ जी महाराज,पेजावर मठ के स्वामी विश्वतीर्थी जी महाराज,जगद्गगुरू शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज व महंत नृत्यगोपालदास महाराज जैसे पूज्य संतों ने डोमराजा के यहां भोजन कर संदेश दिया कि हम छुआछूत को नहीं मानते। इससे बड़ा समरसता का उदाहरण क्या हो सकता है। मतांतरण की आंधी को रोकने के लिए वनवासी क्षेत्रों में अनेक सेवा कार्य व संस्कार केन्द्र शुरू कराये। अशोक जी के आहवान पर ही बजरंग दल ने गौरक्षा का दायित्व स्वीकार किया। गाय नहीं कटने देंगे देश नहीं बंटने देंगे। यह नारा लोकप्रिय हुआ। इसलिए विहिप मतांतरण,घरवापसी, मंदिरों की सरकारी नियंत्रण से मुक्ति तथा सामाजिक समरसता व सेवा के उनके अधूरे कार्यों को गति देकर उनका पुण्य स्मरण करेगी।

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मुलायम सिंह यादव हों लालू प्रसाद यादव या अन्य बड़ा राजनेता। सबसे उनके मधुर संबंध थे। रामसेतु की रक्षा के लिए दिल्ली में प्रदर्शन की योजना थी। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। दक्षिण भारत से बड़ी संख्या में विहिप के कार्यकर्ता दिल्ली आ रहे थे। उन कार्यकर्ताओं को दिल्ली पहुंचने से पहले ही पुलिस उतार रही थी। अशोक सिंहल को खबर हुई। उन्होंने सीधे लालू यादव को फोन लगाया। राबड़ी देवी ने फोन उठाया कहा भैय्या अभी वह पूजा कर रहे हैं। इसके बाद बात कराती हूँ। थोड़ी देर में पलटकर फोन आया। लालू यादव ने कहा कैसे याद आ गयी।

अशोक सिंहल ने बताया कि हमारे कार्यकर्ता दिल्ली आ रहे हैं जीआरपी उन्हें पहले ही उतार दे रही। लालू ने कहा कि बस दो मिनट दीजिए अभी मैं इन्हें बताता हूँ। तत्काल फोन हुआ और लालू ने निर्देश दिया कि जिस भी स्टेशन पर कार्यकर्ता उतारे गये हैं उनको दिल्ली के लिए जो भी गाड़ी मिले तत्काल उन्हें बैठाकर भेजिए। वर्ष 2012 में विहिप ने अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा की योजना बनाई। अशोक सिंहल लखनऊ आये। उनके साथ पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद,पूर्व सांसद डा.राम विलास दास वेदांती,सदगुरू सदन गोलाघाट अयोध्या के महंत सियाकिशोरी शरण दास जी महाराज समेत कई संत थे। लखनऊ विश्व संवाद केन्द्र में संतों के साथ प्रेसवार्ता की। प्रेसवार्ता के बाद सभी संतों को लेकर मुलायम सिंह यादव के आवास पहुंच गये।

मुलायम सिंह यादव व उनके बेटे जो उस समय मुख्यमंत्री थे अखिलेश यादव ने पोर्टिको में आकर अशोक सिंहल समेत अन्य संतों का पैर छूकर आशीर्वाद लिया। मुलायम सिंह को 84 कोसी परिक्रमा की पूरी जानकारी दी गयी। उन्होंने सहमति दे दी। जब अशोक सिंहल मुख्यमंत्री आवास पहुंचे उसी समय अखिलेश यादव की प्रेसवार्ता पहले से तय थी। अशोक सिंहल के कारण मुख्यमंत्री की प्रेसवार्ता को दो घंटे बाद करना पड़ा। पत्रकारों ने कारण पूछा तो बताया कि अशोक सिंहल जी संतों के साथ आ गये थे। पहले से चूंकि जानकारी नहीं थी इसलिए विलम्ब हुआ।हालांकि बाद में बिगड़ैल मंत्री आजम खां के दबाव के कारण अखिलेश को 84 कोसी परिक्रमा पर रोक लगानी पड़ी। सरकार के अनेक प्रतिबंधों के बाद भी 84 कोसी परिक्रमा हुई। हजारों कार्यकर्ता जेल गये।


2002 में हमें उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अयोध्या के मंदिरों में वह छोटी—छोटी बैठकें करते थे। सु्ग्रीव किला में एक बैठक थी। उस बैठक में श्रद्धेय सिंहल जी व चंपतराय जी थी। बमुश्किल से संत व कार्यकर्ता मिलाकर 20 लोग थे। उस समय सुग्रीव किलापीठाधीश्वर जगद्गुरू पुरूषोत्तमाचार्य जी महाराज थे। महाराज जी ने स्वयं अपने हाथों से सबको प्रसाद दिया था। उस बैठक में हमें लेकर संघ के एक प्रचारक परम चैतन्य जी लेकर गए थे। उनके निकट बैठने का यह पहला अवसर था।तब हम महाराज इण्टर कालेज के छात्र थे और राजद्वार सदन की शाखा का काम अपने पास था।  


शौर्य के प्रतिमान थे। वाणी के ताकत ऐसी कि जो एक बार उन्हें सुन ले बार—बार सुनने की उत्कंठा रहती थी। उनकी सिंह गर्जना युवाओं में त्याग व उत्सर्ग की भावना और विधर्मियों के ह्रदय को कंपायमान करने वाली होती थी। सहजता,सरलता,विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। आपके नेतृत्व में विहिप विश्वव्यापी संगठन बना। संत उनका बहुत आदर करते थे। सम्पूर्ण राम मंदिर आन्दोलन संतों के नेतृत्व में चला। विभिन्न मत,पंथ,सम्प्रदाय के संतों के बीच सामंजस्य बनाकर संत शक्ति को एकजुट करने का काम अशोक सिंहल ने किया। राजनीति में हिन्दुत्व के पक्षधर थे। संसद व विधानसभा में हिन्दू सदस्य ही जीतकर पहुंचें। इसके लिए जन जागरण करते थे।


अशोक सिंहल कहते थे कि भगवान राम,कृष्ण व शिव हमारे आराध्य हैं। इसलिए उनसे जुड़े अयोध्या,मथुरा तथा काशी इन तीनों धर्मस्थलों की मुक्ति व जीर्णोद्धार होना चाहिए। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के विभिन्न चरणों में हुए अभियानों में पूज्य संतों ने अयोध्या मथुरा व काशी की बात उठायी थी। अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य दिव्य राममंदिर बन गया है। मथुरा व काशी हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। शताब्दी वर्ष में काशी और मथुरा की मुक्ति के उनके महान संकल्प को द्रुत गति से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

अशोक सिंहल का जीवन केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर की कहानी है, जिसने भारतीय समाज और राजनीति के विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर हिन्दू समाज के संगठन तक, उनकी भूमिका लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में रही। उनके समर्थकों के लिए वे हिन्दुत्व और सांस्कृतिक चेतना के प्रखर स्वर थे, जबकि उनके आलोचक उनकी राजनीति और आंदोलन के प्रभाव को अलग दृष्टि से देखते रहे। इतिहास में व्यक्तित्वों का मूल्यांकन समय के साथ होता है, लेकिन अशोक सिंहल का नाम भारतीय जनजीवन के उस अध्याय से जुड़ा रहेगा, जिसने धर्म, संस्कृति, आस्था और राजनीति के बीच संबंधों पर व्यापक बहस को जन्म दिया।

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