
आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत ने देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की चमकदार इमारतों के पीछे छिपे एक गंभीर सवाल को फिर सामने ला खड़ा किया है—क्या हमारे उच्च शिक्षण संस्थान प्रतिभा को केवल परख रहे हैं, या उसे संभालने की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं? साहिल की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच अभी जारी है। इसलिए इस समय किसी एक व्यक्ति, घटना या कथित भेदभाव को उनकी आत्महत्या का अंतिम कारण घोषित करना उचित नहीं होगा। उनके परिजनों ने जातिगत भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं, जबकि संस्थान की ओर से कहा गया है कि उसे ऐसी कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई थी। ऐसे में सच्चाई तक पहुंचने का रास्ता निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही होकर गुजरना चाहिए। लेकिन जांच के निष्कर्ष का इंतजार करते हुए भी एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है—आखिर देश के प्रतिभाशाली युवा इतनी बड़ी संख्या में अपनी जिंदगी क्यों समाप्त कर रहे हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े इस संकट की गंभीरता की ओर संकेत करते हैं। 2013 में देश में छात्रों द्वारा आत्महत्या के 8,423 मामले दर्ज हुए थे। 2023 में यह संख्या बढ़कर 13,892 और 2024 में 14,488 तक पहुंच गई। यानी एक दशक से अधिक समय में दर्ज मामलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि इन आंकड़ों को केवल संख्या के रूप में देखकर निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि इस अवधि में विद्यार्थियों की कुल आबादी और उच्च शिक्षा में नामांकन भी बढ़ा है। इसलिए छात्र आबादी के अनुपात में आत्महत्या की दर, आयु, लिंग, सामाजिक पृष्ठभूमि, संस्थान, पाठ्यक्रम और क्षेत्र के आधार पर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि छात्र आत्महत्या अब व्यक्तिगत घटनाओं की अलग-अलग खबर नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है।
आईआईटी जैसे संस्थानों में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। शिक्षा मंत्रालय ने संसद में बताया था कि 2018 से 2023 के बीच आईआईटी परिसरों में 39 छात्रों की आत्महत्या से मृत्यु हुई। दूसरी ओर, अलग-अलग आरटीआई प्रतिक्रियाओं और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित संकलनों में इससे अधिक संख्या सामने आती रही है। अलग-अलग स्रोतों में संख्या अलग होने का एक कारण यह भी है कि उनकी समयावधि, परिभाषा और डेटा-संग्रह की पद्धति समान नहीं है। इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम सत्य मानने के बजाय सरकारी रिकॉर्ड, संस्थागत रिकॉर्ड और स्वतंत्र अध्ययनों को एक साथ रखकर राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, बहस आंकड़ों और दावों के बीच उलझती रहेगी और समस्या की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाएगी।
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इस पूरी बहस में सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। आईआईटी और अन्य केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी विद्यार्थियों से जुड़े भेदभाव, सामाजिक अलगाव, अकादमिक दबाव और ड्रॉपआउट की घटनाओं पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में छात्रों की आत्महत्याओं में किसी एक सामाजिक वर्ग की बहुत बड़ी हिस्सेदारी के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन ऐसे दावों को प्रमाणित सरकारी डेटा, स्पष्ट समयावधि और विश्वसनीय अध्ययन के बिना अंतिम तथ्य मान लेना उचित नहीं है। फिर भी यदि किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति या किसी अन्य सामाजिक पहचान के कारण अतिरिक्त मानसिक दबाव या भेदभाव झेलना पड़ता है, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। प्रतिभा का मूल्यांकन विद्यार्थी की क्षमता से होना चाहिए, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं।
साथ ही यह भी समझना होगा कि हर आत्महत्या का कारण केवल भेदभाव या संस्थागत उत्पीड़न नहीं होता। कई बार परीक्षा और प्रदर्शन का दबाव, असफलता का भय, परिवार की अपेक्षाएं, आर्थिक कठिनाइयां, अकेलापन, रिश्तों से जुड़ी समस्याएं, भविष्य की चिंता और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां एक साथ काम करती हैं। कई मामलों में कारणों की पूरी श्रृंखला घटना के बाद भी स्पष्ट नहीं हो पाती। इसलिए किसी भी छात्र की मृत्यु को केवल एक कारण से जोड़ देना उतना ही खतरनाक है जितना संस्थागत समस्याओं की संभावना को पूरी तरह नकार देना। आवश्यकता इस बात की है कि हर घटना की स्वतंत्र, संवेदनशील और वैज्ञानिक तरीके से कारण-पड़ताल हो और उसके निष्कर्षों को संस्थागत सुधार से जोड़ा जाए।
उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य को अब वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि मूलभूत संस्थागत जिम्मेदारी मानना होगा। केवल काउंसलिंग सेंटर का बोर्ड लगा देना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध और गोपनीय मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं, प्रशिक्षित काउंसलर, संवेदनशील वार्डन, प्रशिक्षित फैकल्टी मेंटर, भरोसेमंद शिकायत प्रणाली और समयबद्ध शिकायत-निवारण व्यवस्था जरूरी है। यदि किसी विद्यार्थी को जातिगत भेदभाव, रैगिंग, बुलिंग, लैंगिक उत्पीड़न, अकादमिक अपमान या किसी अन्य प्रकार के दबाव का सामना करना पड़ रहा है तो उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी शिकायत सुनी जाएगी और उसके खिलाफ प्रतिशोध नहीं होगा। इसी तरह संस्थानों को अनुशासन, परीक्षा की निष्पक्षता और अकादमिक मानकों को भी बनाए रखना होगा। संवेदनशीलता और गुणवत्ता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं।
सबसे बड़ी आवश्यकता उस संस्कृति को बदलने की है जिसमें असफलता को अपराध और मदद मांगने को कमजोरी समझ लिया जाता है। आईआईटी में प्रवेश जीवन की अंतिम उपलब्धि नहीं है और किसी परीक्षा में असफल होना जीवन की असफलता नहीं हो सकता। एक विषय में कम अंक, किसी परीक्षा में असफलता, पाठ्यक्रम बदलने की इच्छा या करियर को लेकर असमंजस जीवन के स्वाभाविक पड़ाव हो सकते हैं। लेकिन जब विद्यार्थी को लगता है कि उसके पास लौटने, रुकने या सहायता मांगने का कोई रास्ता नहीं है, तब संकट गहरा सकता है। इसलिए परिवार, शिक्षक और संस्थान तीनों को यह समझना होगा कि विद्यार्थी केवल अंक, रैंक या प्लेसमेंट का आंकड़ा नहीं है; वह भावनाओं, आकांक्षाओं और संघर्षों वाला एक मनुष्य है।
हमने शिक्षा को सफलता की सीढ़ी तो बना दिया, लेकिन उसे जीवन जीने की तैयारी बनाने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। माता-पिता बच्चे से सफलता चाहते हैं, संस्थान उत्कृष्टता चाहते हैं और समाज रैंक चाहता है; लेकिन विद्यार्थी किस मानसिक दबाव से गुजर रहा है, उसे किस बात का डर है और वह किससे अपनी परेशानी साझा कर सकता है—इन सवालों के लिए अक्सर पर्याप्त समय नहीं निकलता। यही वह जगह है जहां शिक्षा व्यवस्था को आत्ममंथन करना होगा।
साहिल की मौत की जांच अपना रास्ता तय करेगी। उनके परिवार द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, यह निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से तय होना चाहिए। लेकिन इस घटना से उठे सवालों को केवल एक छात्र, एक संस्थान या एक घटना तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। देश को यह तय करना होगा कि उसके शीर्ष शिक्षण संस्थान केवल श्रेष्ठ इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टर और शोधकर्ता तैयार करेंगे या ऐसे संवेदनशील मनुष्य भी तैयार करेंगे जिन्हें कठिन समय में संभाला जा सके। एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी की मृत्यु केवल उसके परिवार की त्रासदी नहीं होती; वह पूरी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक कठोर प्रश्न होती है। इस प्रश्न का उत्तर आरोप-प्रत्यारोप, सोशल मीडिया की बहस या आंकड़ों की राजनीति से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, विश्वसनीय आंकड़ों, वैज्ञानिक अध्ययन, संवेदनशील संस्थागत सुधार और हर विद्यार्थी के जीवन को सर्वोच्च महत्व देने वाली संस्कृति से देना होगा। आखिर किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारतें, संस्थान या रैंकिंग नहीं, बल्कि उसके युवा हैं। यदि वही युवा असहाय होकर जीवन से हारने लगें, तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया; हमें यह भी पूछना चाहिए कि उनके आसपास की व्यवस्था उन्हें बचाने के लिए समय पर क्या कर रही थी।



