राम मंदिर विवाद की आंच के बीच बीजेपी का 2027 मिशन, बूथ से चुनावी शंखनाद

अजय कुमार
अजय कुमार

अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा रखा है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार और बीजेपी को घेरने की तैयारी में है, जांच की दिशा और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं और मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 27 जुलाई को होनी है, जबकि राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए नई विशेष जांच टीम गठित करने का फैसला किया है। राजनीतिक रूप से यह विवाद बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। लेकिन पार्टी ने इस पूरे माहौल का जवाब किसी नए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से देने के बजाय अपना ध्यान सीधे संगठन पर केंद्रित करने का फैसला किया है।

बीजेपी अब राम मंदिर चढ़ावा विवाद की राजनीतिक गर्मी से आगे निकलकर 2027 के विधानसभा चुनाव की असली जमीन तैयार करने में जुट गई है बूथ।22 जुलाई को उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों में एक साथ बूथ अध्यक्ष सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे। यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार इतने बड़े स्तर पर पार्टी अपने बूथ नेटवर्क को एक साथ परखने जा रही है। बीजेपी के पास उत्तर प्रदेश में करीब 1.62 लाख बूथ अध्यक्ष हैं। इन्हीं बूथों को पार्टी अपनी चुनावी मशीनरी की सबसे निचली, लेकिन सबसे निर्णायक इकाई मानती है। सम्मेलन में केवल भाषण नहीं होंगे, बल्कि बूथ अध्यक्षों की मौजूदगी, उनके कामकाज और चुनावी तैयारियों का वास्तविक परीक्षण किया जाएगा। यानी 22 जुलाई को बीजेपी अपने कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं जुटा रही है, बल्कि अपने संगठन की जमीनी हालत का हिसाब लेने जा रही है।

पार्टी ने बूथ अध्यक्षों को उनके बूथ नंबर के हिसाब से बैठाने की व्यवस्था की है। कुर्सियों पर नाम की जगह बूथ नंबर दर्ज होगा। मंच से किसी भी बूथ अध्यक्ष को अचानक बुलाया जा सकता है और उससे उसके बूथ से जुड़े सवाल पूछे जा सकते हैं। पार्टी यह जानना चाहती है कि जिस व्यक्ति के हाथ में बूथ की जिम्मेदारी है, क्या वह वास्तव में अपने इलाके के मतदाताओं, कार्यकर्ताओं और चुनावी समीकरण से परिचित है। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन बीजेपी की तैयारी चुनावी साल के इंतजार पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पार्टी की रणनीति साफ है पहले बूथ को मजबूत करो, फिर विधानसभा क्षेत्र की चुनावी रणनीति तैयार करो। जहां बूथ अध्यक्ष सक्रिय हैं, वहां संगठन को और मजबूत किया जाएगा। जहां निष्क्रियता या कमजोरी मिलेगी, वहां सुधार, जिम्मेदारी में बदलाव या नए कार्यकर्ताओं को आगे लाने पर विचार किया जा सकता है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के हालिया उत्तर प्रदेश दौरे के बाद पार्टी के इस संगठनात्मक अभियान को और गति मिली है। जुलाई की शुरुआत में लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच नबीन ने राम मंदिर चढ़ावे के विवाद को लेकर विपक्ष पर हमला बोला था। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों पर धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, अखिलेश यादव ने नितिन नबीन के उत्तर प्रदेश दौरे को लेकर राजनीतिक तंज किया। इस तरह विवाद का राजनीतिक असर साफ दिखाई देने लगा था।लेकिन बीजेपी अब इस मुद्दे को अपनी चुनावी रणनीति का स्थायी केंद्र नहीं बनाना चाहती।

पार्टी को पता है कि अगर चुनावी राजनीति लगातार आरोप-प्रत्यारोप के इर्द-गिर्द घूमती रही तो संगठनात्मक तैयारी पीछे छूट सकती है। यही वजह है कि पार्टी ने राजनीतिक नैरेटिव को विवाद से संगठन की ओर मोड़ने की कोशिश शुरू की है। संदेश यह है कि जांच और राजनीतिक बहस अपनी जगह चलती रहेगी, लेकिन चुनावी तैयारी रुकने वाली नहीं है।22 जुलाई के सम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में बूथ अध्यक्षों से संवाद करेंगे। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी सीतापुर के लहरपुर में कार्यक्रम में शामिल होंगे। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य बरेली शहर और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक शाहजहांपुर की जलालाबाद विधानसभा में बूथ सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह वाराणसी में रहेंगे।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और स्वतंत्र देव सिंह समेत कई वरिष्ठ नेताओं को भी अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है।यह व्यवस्था अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व यह दिखाना चाहता है कि 2027 का चुनाव केवल मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं होगा। मंत्री, विधायक, संगठन पदाधिकारी और बूथ अध्यक्ष सभी को एक ही चुनावी ढांचे में काम करना होगा। पार्टी ने विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को भी कार्यक्रम में शामिल होने के निर्देश दिए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि संगठन अब चुनावी तैयारी को पूरी तरह सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है। इस अभियान का दूसरा बड़ा हिस्सा बीजेपी का डेटा आधारित संगठन है। पार्टी ने सदस्यता अभियान के दौरान उत्तर प्रदेश में करीब 2.5 करोड़ प्राथमिक सदस्य बनाए थे। अब इन सदस्यों की जानकारी को बूथ और मंडल स्तर पर व्यवस्थित करने की कोशिश हो रही है।

 इसका उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि पार्टी के कितने सदस्य हैं, बल्कि यह पता लगाना है कि इनमें से कितने लोग वास्तव में सक्रिय हैं और चुनाव के समय पार्टी के लिए काम कर सकते हैं।यही बदलाव बीजेपी की चुनावी रणनीति को पहले के मुकाबले अधिक संगठित बनाता है। किसी बूथ पर कितने कार्यकर्ता सक्रिय हैं, किन इलाकों में पार्टी की पकड़ कमजोर है, किस सामाजिक समूह तक संगठन की पहुंच कम है और किन मतदाताओं से नियमित संपर्क नहीं हो रहा इन सवालों का जवाब डेटा और जमीनी सत्यापन के जरिए खोजा जाएगा। 1.62 लाख बूथ अध्यक्षों की सक्रियता का आकलन इसी बड़ी योजना का हिस्सा है।राम मंदिर चढ़ावा विवाद ने बीजेपी को राजनीतिक रूप से रक्षात्मक स्थिति में डालने की कोशिश जरूर की है। विपक्ष इस मुद्दे को विधानसभा के आगामी मॉनसून सत्र में भी उठा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच से जुड़े सवालों ने भी मामले को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती दोहरी है। एक तरफ उसे मंदिर से जुड़े विवाद पर राजनीतिक और कानूनी सवालों का सामना करना है, दूसरी तरफ उसे 2027 की चुनावी मशीनरी को कमजोर नहीं पड़ने देना है।

यही कारण है कि 22 जुलाई का सम्मेलन बीजेपी के लिए महज संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं है। यह एक तरह से पार्टी का पहला बड़ा जमीनी ऑडिट है। मंच पर मुख्यमंत्री और बड़े नेता होंगे, लेकिन असली परीक्षा उन बूथ अध्यक्षों की होगी जो चुनाव के दिन पार्टी की पूरी रणनीति को जमीन पर उतारते हैं। मतदाता सूची से लेकर घर-घर संपर्क तक, लाभार्थियों से संवाद से लेकर मतदान के दिन की व्यवस्था तक, बूथ अध्यक्ष की भूमिका चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालती है।उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां 403 विधानसभा सीटें हैं और हर क्षेत्र में अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरण हैं, वहां किसी भी पार्टी के लिए एक समान रणनीति काम नहीं कर सकती। बीजेपी अब इसी स्थानीय अंतर को समझने के लिए बूथ स्तर तक पहुंचना चाहती है।

पार्टी के लिए चुनौती यह भी है कि 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद विपक्षी दलों ने अपने संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश तेज की है। समाजवादी पार्टी का पीडीए सामाजिक समीकरण और कांग्रेस की संगठन विस्तार की कोशिश बीजेपी के सामने अलग-अलग राजनीतिक चुनौतियां खड़ी करती हैं।ऐसे में बीजेपी की रणनीति का केंद्र एक बार फिर वही पुराना लेकिन प्रभावी मॉडल है बड़ा नेता ऊपर, मजबूत संगठन नीचे और चुनावी तैयारी लंबे समय तक। फर्क इतना है कि इस बार पार्टी बूथ अध्यक्षों की मौजूदगी और सक्रियता को केवल संगठनात्मक रिपोर्ट के आधार पर स्वीकार नहीं करना चाहती।

वह उन्हें सामने बैठाकर परखना चाहती है।22 जुलाई को 403 विधानसभा क्षेत्रों में होने वाला यह अभियान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से यह तय होगा कि बीजेपी का संगठन कागज पर कितना बड़ा है और जमीन पर कितना सक्रिय। राम मंदिर विवाद की राजनीतिक आंच के बीच बीजेपी ने अपना जवाब तैयार कर लिया है। पार्टी का संदेश साफ है विवादों का सामना राजनीतिक स्तर पर किया जाएगा, लेकिन चुनावी तैयारी बूथ से शुरू होगी। 2027 की लड़ाई अभी दूर है, मगर बीजेपी ने अपने सबसे छोटे संगठनात्मक कार्यकर्ता को मैदान में उतारकर यह संकेत दे दिया है कि उसके लिए चुनाव का असली काउंटडाउन शुरू हो चुका है।

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