महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा आर.टी.आई. के तहत पूछे गये सवाल

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक आर.टी.आई. के तहत पूछे गये सवाल के जवाब में कहा गया है कि पिछले साल नवम्बर तक देश में छः महीने से छः साल तक के करीब 9,27,606 गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की गयी है। प्रस्तुत चिन्ताजनक आंकड़े भयावह हैं और कोरोना महामारी की तीसरी लहर की आशंका के बीच गरीब तबके के स्वास्थ्य एवं पोषण के संकट को और बढ़ा सकती है।

यह जानकारी देते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री अजय कुमार लल्लू ने कहा कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े के अनुसार जिन 22 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का सर्वे किया गया है, उसमें बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों की संख्या है। मंत्रालय के मुताबिक भी सर्वाधिक 398356 गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान उत्तर प्रदेश में ही की गयी है।

महिलाओं और बच्चों के पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा कोराना महामारी काल में केन्द्र सरकार द्वारा 27 सौ करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं, जबकि पिछले साल कोरोना महामारी के आगमन से पहले यह राशि लगभग 37 सौ करोड़ रुपये थी। उन्होंने बताया कि जब विशेषज्ञों द्वारा कोरोना की तीसरी लहर को लेकर बच्चों पर कोरोना संक्रमण के तीव्र प्रहार की आशंका जताई जा रही है, ऐसे में पिछले साल की तुलना में 27 प्रतिशत बजट की कटौती के चलते तीसरी लहर को पार पाने में कुपोषण बड़ी बाधा बनकर उभरने वाला है।

भारत में पाँच साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है और 15 से 49 साल के उम्र की लगभग आधी महिलाएं एनेमिक हैं। इस महामारी काल में पोषण के लिए बजट दोगुना होना चाहिए था या कम? इस बार सरकार को कम से कम 35 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करनी ही चाहिए थी।

मुख्यमंत्री मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बजट की स्वीकृतियों और खर्चों की समीक्षा के बावजूद पिछले वर्ष कोरोना महामारी समेत कुपोषण और महिला बाल-विकास संबंधी खर्च का अभी तक का जो ब्योरा नियोजन विभाग ने तैयार किया है, वह चिन्ताजनक है। कोरोना और लाॅकडाउन के चलते स्वास्थ्य, बाल विकास पुष्टाहार, नगरीय रोजगार व गरीबी उन्मूलन, शिक्षा जैसे कई अहम विभाग प्रावधानिक बजट का एक तिहाई ही खर्च कर पाये थे। नियोजन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 7 हजार 700 करोड़ में मात्र 7405 करोड़ ही कोविड की दूसरी लहर तक प्रदेश सरकार खर्च कर पाई।

उन्होंने कहा कि कोरोना काल के शुरूआत में ही आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार एक साल की उम्र के बच्चों की मौत के मामले में बिहार के बाद पूरे देश में उत्तर प्रदेश टाॅप पर है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा में माना है कि प्रदेश में पाँच साल तक के 46.3 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन के शिकार हैं, कुपोषण का दूसरा प्रकार उम्र के हिसाब से वजन न बढ़ना है- इसमें भी उत्तर प्रदेश के 39.5 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं, जबकि समूचे भारत में अभी 35.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। यानी उत्तर प्रदेश में स्थिति औसत से ज्यादा है।

वर्ष 2019 में आई स्टेट न्यूटीशन मिशन की रिपोर्ट के अनुसार भी उत्तर प्रदेश में हर रोज 650 बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हो रही है। 50 फीसदी माताएं खून की कमी से जूझ रही हैं। सरकारी आंकड़ों से इतर बात करें तो साल भर में तीन लाख से ज्यादा बच्चों की मौत लगभग हर वर्ष कुपोषण से हो रही है। प्रदेश में 12 लाख 60 हजार बच्चे अतिकुपोषित हैं।

उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सवाल किया कि सर्वाधिक कुपोषण वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार अपने 46 प्रतिशत कुपोषित बच्चों के बारे में क्या योजना धरातल पर चला रही है ? उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने शहर के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों की खराब स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। वहीं कई ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की बदहाली की खबरें सामने आ र्हैंं। कोरोना काल में आलम यह है कि कई गांवों में स्वास्थ्य केन्द्र ही नहीं हैं और जहाँ हैं, वहां संसाधन के अभाव के चलते लोग झोला छाप डाक्टरों से इलाज कराने के लिए मजबूर हैं।

लाॅकडाउन के स्कूल बन्द होने के कारण- लाखों बच्चे जिन्हें पूरक पोषण आहार के रूप में मध्यान्ह भोजन मिलता था- अब नहीं मिल पा रहा है। इस तरह ग्रामीण स्तर पर व कच्ची बस्तियों में एकीकृत बाल विकास योजना के तहत आंगनबाड़ी केन्द्रों एवं अन्य स्थानों पर कुपोषण से निपटने की लड़ाई धीमी पड़ गई है।

पोषण पुर्नवास केन्द्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाना चाहिए, इसके अतिरिक्त कुपोषण से लड़ने के लिए अन्य इण्टरवेंशन जैसे माइक्रो न्यूट्रिएण्ट सपलीमेण्ट, नवजात शिशुओं के लिए स्तन पान की आदतें, पोषण परामर्श एवं खाद्य वितरण तंत्र को नये सिरे से और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। कोविड 19 को ध्यान में रखकर मध्यम कुपोषित और गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों हेतु पोषण पुर्नवास केन्द्रों पर उपचार इन्टरवेंशन को रि-डिजाइन करना चाहिए।

कुपोषण ऐसी स्थिति नहीं है कि सरकारें कोरोना वाइरस के समाप्त होने का इन्तजार करेगी। अदृश्य कोविड 19 वाइरस बच्चों और महिलाआंे के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा। अन्ततः गरीबी और कुपोषण के दुष्चक्र में फंसे लाखों बच्चों की जान बचाना आज प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए। कोरोना संक्रमण के पश्चात इन्टरवेंशन रणनीति के रूप में सरकार को ग्रामीण और शहरी बस्तियां जो कुपोषण से गम्भीर रूप से प्रभावित हैं, उसकी पहचान करवाकर क्लस्टर और क्षेत्रीय मैपिंग करवानी चाहिए, जिससे कुपोषण को दूर करने के कार्यक्रम युद्ध स्तर पर चलाये जा सकें।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी मिस कोरोना मैंनेजमेण्ट और महिलाओं, बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, वह उत्तर प्रदेश को शर्मसार करने वाली है। जो आंकड़े सामने आये हैं अब देखना होगा कि प्रदेश सरकार इस कोरोना महामारी की तीसरी लहर की आशंका के बीच उत्तर प्रदेश के इस कलंक को अपने ऊपर से कैसे साफ करती है? कोरोना के साथ ही सरकार को उत्तर प्रदेश में हर साल फैलने वाली संक्रामक बीमारियों- डेंगू (लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी, सीतापुर सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम इलाके, इन्सेफ्लेलाटिस (पूर्वांचल) स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, पीलिया, डायरिया जैसे रोगों से भी निपटने की नये सिरे से मजबूत कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक वर्ष उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में संक्रमण से भारी संख्या में लोगों की जान जाती है।

प्रदेश सरकार ने सदन में भी कहा है कि राज्य के शासकीय अस्पतालों में करीब 7348 डाक्टरों की कमी है- इसे पिछले वर्ष ही स्वीकार चुकी है। इसके बावजूद टेक्नालाॅजी और ट्रेनिंग, साथ ही डायग्नोस्टिक मामलों को लेकर सरकार के सारे दावे अभी तक हवाई साबित हुए हैं। 100 जिला चिकित्सालयों में ई.व्यवस्था का आश्वासन देने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के दावे भी हवाई साबित हुए। सरकार को इस दिशा में भी व्यवहारिक दृष्टिकोण के साथ जल्द कदम उठाते हुए खाली पड़े चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों की भर्ती और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था में अविलम्ब निर्णय लेना चाहिए।

केन्द्रीय बजट पेश करते समय पोषण कार्यक्रम को मजबूत करने के लिए सप्लीमेण्ट्री पोषण कार्यक्रम और पोषण अभियान का विलय करके मिशन पोषण 2.0 की शुरुआत को लेकर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए अपनी पीठ थपथपाई थी। जबकि पोषण परिणामों में सुधार के लिए पूरक पोषण कार्यक्रम, पोषण अभियान, आंगनबाड़ी सेवाएं, प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना, किशोरियों के लिए योजना, जननी सुरक्षा योजना युद्ध स्तर पर शुरू की गयी थी।

बजट 2021-22 के दस्तावेजों में सक्षम योजना के लिए आवंटित संयुक्त बजट 20,105 करोड़ रुपये दिखाया गया है, इसमें चार कार्यक्रम- आई.सी.डी,एस. पोषण, क्रेच और किशोरियों के लिए योजना शामिल है, जबकि पिछले बजट 2020-2021 में अकेले आई.सी.डी.एस. को दी गयी धनराशि के बराबर थी। केन्द्र सरकार द्वारा कोरोना महामारी के संकट के दौरान लगातार स्वास्थ्य संबंधी बजट में कटौती से हालात और भी बद से बदतर हो रहे हैं।

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