
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसकी संवैधानिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा को बनाए रखना भी है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जन-महाभियोग जैसा अभियान चलाना कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर और असाधारण परिस्थिति का संकेत है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक असहमति को इस स्तर तक ले जाना उचित है और क्या इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास मजबूत होगा?कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन-महाभियोग प्रस्ताव कार्यक्रम के माध्यम से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस की चुनाव आयुक्त से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, बल्कि उसकी लड़ाई निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र की रक्षा के लिए है।
खडग़े ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के निर्देश पर चुनाव आयोग काम कर रहा है तथा देश में मताधिकार की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। इन आरोपों के बीच उन्होंने विपक्ष की ओर से लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प भी व्यक्त किया। निश्चित रूप से चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की निष्पक्षता पर सवाल उठना गंभीर विषय है, लेकिन इस विषय को समझने के लिए राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं का परीक्षण करना आवश्यक है।भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता की राजनीतिक इच्छा और संवैधानिक अधिकारों की अभिव्यक्ति हैं। चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी संविधान ने सौंपी है।
इसलिए उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठना अस्वाभाविक नहीं है। विपक्ष को यह अधिकार है कि वह चुनाव प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता, पक्षपात या मतदाता अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध आवाज उठाए। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक मंचों से लगातार आरोप लगाने और जन-महाभियोग जैसी पहल करने से समस्या का समाधान निकल सकता है?महाभियोग की अवधारणा अपने आप में अत्यंत गंभीर है। यह किसी राजनीतिक असहमति का सामान्य हथियार नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा विषय है। मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया भी संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप है। इसके लिए संसद में विशेष बहुमत की संवैधानिक प्रक्रिया आवश्यक होती है। ऐसे में किसी व्यक्ति के खिलाफ जन-महाभियोग का राजनीतिक अभियान चलाना और वास्तविक संवैधानिक महाभियोग की प्रक्रिया अलग-अलग बातें हैं। जनता के बीच विरोध दर्ज कराना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसे संवैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं माना जा सकता।
यह भी समझना होगा कि किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह का अभियान चलाना कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। इससे देश और विदेश में लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। यदि चुनाव आयोग वास्तव में किसी प्रकार की अनियमितता कर रहा है तो उसके प्रमाण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। चुनावी आंकड़ों, मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर ठोस सवाल उठाए जाने चाहिए। विपक्ष को संसद, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक मंचों का इस्तेमाल करना चाहिए। केवल राजनीतिक भाषणों और आरोपों से किसी संस्था की निष्पक्षता प्रमाणित या खारिज नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष की भी यह जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की हर आलोचना को राजनीतिक हताशा बताकर खारिज न करे। लोकतंत्र में विपक्ष केवल चुनाव लडऩे और सरकार बदलने के लिए नहीं होता, बल्कि वह सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली महत्वपूर्ण शक्ति है। यदि विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है तो सरकार और आयोग को तथ्यों के आधार पर जवाब देना चाहिए। पारदर्शिता से बचने या सवाल पूछने वालों को राजनीतिक विरोधी बताने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है।
वास्तविक चिंता यह है कि देश की राजनीति में संवैधानिक संस्थाएं भी आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में आती जा रही हैं। कभी संसद की कार्यवाही पर सवाल उठते हैं, कभी न्यायपालिका की टिप्पणियों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है और कभी चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर विवाद खड़ा होता है। ऐसी परिस्थितियां किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा किसी सरकार या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती। उनका सम्मान और स्वतंत्रता पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है।
खडग़े की पहल को केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा और उसे लोकतंत्र की रक्षा का अंतिम रास्ता मान लेना भी सही नहीं है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध की भी एक संवैधानिक मर्यादा होती है। किसी पदाधिकारी को हटाने की मांग करने से पहले आरोपों की प्रमाणिकता, प्रक्रिया की वैधता और उसके परिणामों पर गंभीर विचार होना चाहिए। अन्यथा संस्थाओं के प्रति अविश्वास की ऐसी राजनीति जन्म ले सकती है, जिसका नुकसान अंतत: आम मतदाता को उठाना पड़ेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को केवल बयानों से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्यप्रणाली और जवाबदेही से साबित करे। विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए आरोपों के साथ ठोस प्रमाण प्रस्तुत करे। सरकार को चाहिए कि वह चुनावी व्यवस्था से जुड़े हर संदेह का समाधान लोकतांत्रिक संवाद के माध्यम से करे। आखिरकार चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के मताधिकार का संरक्षक है।
लोकतंत्र में किसी के खिलाफ जन महाभियोग जैसी असाधारण पहल होना अपने आप में सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती। यह राजनीतिक व्यवस्था में गहरे अविश्वास और संवाद की कमी का संकेत है। लेकिन इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब होगी, जब चुनाव जैसी लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ जाए। इसलिए जरूरी है कि न सत्ता पक्ष अपनी शक्ति के अहंकार में संवैधानिक मर्यादाएं भूले और न विपक्ष राजनीतिक विरोध को संस्थागत टकराव का रूप दे। लोकतंत्र की असली जीत किसी व्यक्ति के इस्तीफे या किसी दल की राजनीतिक सफलता में नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाओं और जनता के अटूट विश्वास में निहित है।



