अपराध मुक्त राजनीति की आवश्यकता..!

सुरेश हिंदुस्तानी

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा करना होता है। जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और समस्याओं को शासन तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं। इसलिए राजनीति में शुचिता, नैतिकता और जनसेवा की भावना का होना आवश्यक है। लेकिन जब राजनीति का संबंध अपराध, बाहुबल और अवैध गतिविधियों से जुड़ने लगता है, तब लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है।

आज देश के सामने राजनीति के अपराधीकरण की चुनौती को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। राजनीति में अपराधियों का प्रवेश अथवा अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलना केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। जिस राजनीति को समाज में आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए, यदि वही अपराध और भय की प्रवृति को बढ़ावा देने लगे तो आम नागरिक का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

एक समय था जब राजनीति को त्याग, सेवा और राष्ट्रहित से जोड़कर देखा जाता था। सार्वजनिक जीवन में आने वाला व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और देश के लिए काम करने की आकांक्षा रखता था। समय के साथ राजनीति में अनेक सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं, लेकिन इसके साथ ही धनबल, बाहुबल और आपराधिक प्रभाव जैसी प्रवृत्तियों ने भी कहीं-कहीं अपनी जगह बनाई है। चुनाव जीतने की प्रतिस्पर्धा में यदि राजनीतिक दल ऐसे लोगों को महत्व देने लगें जिनकी पहचान अपराध से जुड़ी रही हो, तो यह राजनीति की विश्वसनीयता के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर कठोरता दिखाई गई है। संगठित अपराध, माफिया गतिविधियों और अवैध कब्जों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि शासन व्यवस्था में कानून का महत्व सर्वोपरि है। कभी जिन लोगों के नाम के साथ बाहुबल और भय की चर्चा होती थी, उनके प्रभाव में कमी आना इस बात का संकेत है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रशासन अपराध की जड़ों को कमजोर कर सकते हैं। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कानून के पालन को किस दृष्टि से देखा जाए। किसी अपराधी के विरुद्ध कार्रवाई केवल इसलिए गलत नहीं हो सकती कि वह किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा है या उसका सामाजिक आधार किसी विशेष समूह में है। अपराध को अपराध के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इसी प्रकार किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय हो तो उसकी भी उतनी ही दृढ़ता से निंदा होनी चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी संतुलन में निहित है कि कानून न तो किसी के प्रति पक्षपाती हो और न किसी के प्रति दुर्भावनापूर्ण।

कानून का राज तभी सार्थक होगा जब उसकी कसौटी सभी के लिए समान हो। अपराधी की पहचान, राजनीतिक संबंध, सामाजिक प्रभाव या आर्थिक स्थिति कानून के सामने उसके व्यवहार का आधार नहीं बननी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए और यदि कोई निर्दोष है तो उसे संरक्षण भी कानून के माध्यम से ही मिलना चाहिए। यही लोकतांत्रिक न्याय की मूल भावना है।

दुर्भाग्य यह है कि कई बार राजनीतिक हितों के कारण अपराध के प्रश्न को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है। किसी अपराधी पर कार्रवाई होने के बाद यह देखने के बजाय कि उसने अपराध किया है या नहीं, चर्चा इस बात पर होने लगती है कि वह किस दल, वर्ग या समुदाय से संबंधित है। यह प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। इससे अपराध की गंभीरता कम नहीं होती, बल्कि सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिलता है।

राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी इस मामले में सबसे अधिक है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि अपराध को राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलेगा। विपक्ष का काम सरकार की हर कार्रवाई का विरोध करना नहीं, बल्कि गलत कार्रवाई का तार्किक और प्रमाण आधारित विरोध करना है। उसी प्रकार सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी भी है कि कानून व्यवस्था की कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम न बनने दे। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार आवश्यक है, लेकिन अपराध के समर्थन को राजनीतिक अधिकार का नाम नहीं दिया जा सकता।

राजनीति में तुष्टिकरण की प्रवृत्ति भी इसी संदर्भ में विचारणीय है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व किसी एक समूह को खुश करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना है। विकास और अवसरों का आधार नागरिकता होना चाहिए, राजनीतिक निकटता नहीं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसी भावना तभी वास्तविक रूप ले सकती है जब शासन की नीतियाँ न्यायपूर्ण हों और कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो।

आम नागरिक की सबसे बड़ी अपेक्षा सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने की है। वह चाहता है कि उसकी जमीन सुरक्षित रहे, उसका व्यापार सुरक्षित रहे, उसकी मेहनत की कमाई सुरक्षित रहे और उसके परिवार को भयमुक्त वातावरण मिले। यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति राजनीतिक संरक्षण के बल पर सामान्य नागरिक के अधिकारों को चुनौती देता है तो यह केवल उस व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।

इसलिए अपराधमुक्त राजनीति का प्रश्न केवल नेताओं की छवि सुधारने का प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र को मजबूत करने का प्रश्न है। राजनीति में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि जनप्रतिनिधित्व विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। जनता किसी नेता को कानून से ऊपर नहीं मानती और लोकतंत्र भी किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर होने की अनुमति नहीं देता।

अपराधमुक्त राजनीति के लिए केवल सरकार की कठोर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। राजनीतिक दलों को अपने स्तर पर भी आत्म अनुशासन विकसित करना होगा। उम्मीदवारों के चयन में आपराधिक पृष्ठभूमि को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। जिन लोगों पर गंभीर आरोप हों, उनके मामलों का शीघ्र और निष्पक्ष न्यायिक निपटारा हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल आरोप लग जाने से किसी व्यक्ति को अपराधी मान लेने की प्रवृत्ति न बढ़े। न्याय का अंतिम आधार प्रमाण और विधि ही होना चाहिए।

मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अपराध और राजनीति के संबंधों पर तथ्य आधारित चर्चा होनी चाहिए। किसी व्यक्ति या समूह को बिना प्रमाण दोषी ठहराने से बचना चाहिए और किसी अपराध को केवल राजनीतिक सुविधा के कारण नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए। सार्वजनिक विमर्श जितना तथ्यपरक और संयमित होगा, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ रहेगा।

राजनीतिक दल यदि वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं तो उन्हें इस विषय पर दलगत सीमाओं से ऊपर उठना होगा। अपराध के विरुद्ध लड़ाई को सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं बनाया जा सकता। आज जो दल सत्ता में है, वह कल विपक्ष में हो सकता है और आज जो विपक्ष में है, वह कल सत्ता में आ सकता है। इसलिए कानून की निष्पक्षता और राजनीति की शुचिता का सिद्धांत सबके लिए समान होना चाहिए।

वास्तव में अपराधमुक्त राजनीति की शुरुआत समाज से ही होगी। मतदाता को भी चुनाव के समय केवल जाति, धर्म, क्षेत्र या व्यक्तिगत समीकरणों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय उम्मीदवार के चरित्र, कार्य और सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता को महत्व देना होगा। जब जनता अपराध और बाहुबल के बजाय ईमानदार नेतृत्व को प्राथमिकता देगी, तब राजनीतिक दलों पर भी बेहतर उम्मीदवार सामने लाने का दबाव बनेगा।

राजनीति को स्वच्छ करना किसी एक सरकार या किसी एक दल का दायित्व नहीं है। यह लोकतंत्र के प्रत्येक पक्ष, राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, मीडिया और मतदाताओं की साझा जिम्मेदारी है। अपराध के विरुद्ध कठोरता और निर्दोष के अधिकारों की रक्षा, दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति फिर से सेवा, संस्कार और राष्ट्रहित के मूल मार्ग पर लौटे। सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन राजनीतिक संस्कृति में सकारात्मक परिवर्तन लोकतंत्र की वास्तविक उपलब्धि होगी। यदि सभी राजनीतिक दल यह संकल्प लें कि वे अपराध को संरक्षण नहीं देंगे, अपराधी छवि वाले लोगों को राजनीतिक शक्ति का माध्यम नहीं बनने देंगे और कानून के समान शासन का समर्थन करेंगे, तो राजनीति की विश्वसनीयता निश्चित रूप से बढ़ेगी।

अंततः लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने से नहीं होती; लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता को विश्वास हो कि कानून उसके साथ खड़ा है और राजनीति उसके हित में काम कर रही है। इसलिए समय की मांग स्पष्ट है, राजनीति में अपराध के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। कानून से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं और जनसेवा से बड़ा राजनीति का कोई उद्देश्य नहीं। अपराधमुक्त राजनीति ही स्वच्छ राजनीति की दिशा में पहला और सबसे आवश्यक कदम है।

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