कभी-कभी जीवन की दिशा बदलने के लिए किसी बड़े हादसे की नहीं, बल्कि किसी एक इंसान की छोटी-सी जरूरत की आवाज़ ही काफी होती है। एक प्यासे व्यक्ति की प्यास ने एक आईएएस अधिकारी को सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर समाज और इंसानियत के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया। पद और पहचान तो पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन लोगों के बीच जाकर उन्हें जीवन का असली अर्थ मिला। आखिर पदनाम के बाद मन में सिर्फ एक सवाल बचा—अब किसके लिए? यही सवाल एक अधिकारी की मंजिल बदलने वाली प्रेरक कहानी बन गया।

त्यागपत्र आमतौर पर सेवा का अंत माना जाता है, लेकिन हर विदाई अंत नहीं होती। कुछ विदाइयां यह सवाल छोड़ जाती हैं कि असली सेवा आखिर होती क्या है—कुर्सी पर बैठकर निर्णय लेना या उस कुर्सी से बाहर निकलकर उन लोगों के बीच जाना, जिनके सपनों के नाम पर व्यवस्था खड़ी की गई है। उत्तर प्रदेश कैडर की 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का लगभग 13 साल की सेवा के बाद इस्तीफा इसी सवाल को सामने रखता है। उनका कहना—‘अब जनता के सपनों को जीने का समय आ गया है’—सिर्फ नौकरी छोड़ने की घोषणा नहीं, बल्कि उस यात्रा का अगला पड़ाव है जिसमें पद साधन था और मनुष्य मंजिल।
दिव्या मित्तल की कहानी में चमक भी है और बेचैनी भी। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर से पढ़ाई, फिर लंदन में जेपी मॉर्गन जैसी प्रतिष्ठित संस्था की नौकरी—दुनिया की नजर में इससे बेहतर उपलब्धि क्या होती? मगर जीवन की कठिन कमी कभी-कभी उपलब्धियों से पूरी नहीं होती। विदेश में रहते हुए उन्हें अपने देश से दूर होने की टीस महसूस हुई। उन्होंने माना कि उनकी शिक्षा, आत्मविश्वास और दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की क्षमता इसी मिट्टी का ऋण है। उसी ऋण ने उन्हें लौटाया। दो बार यूपीएससी दी; पहली बार (2012) आईपीएस चयन और दूसरी बार (2013) अखिल भारतीय रैंक 68 के साथ आईएएस। यह केवल परीक्षा की सफलता नहीं थी, बल्कि भीतर उठती पुकार का जवाब था।
मिर्जापुर ने उस पुकार को अर्थ दिया। लहुरियादह (मिर्जापुर के हलिया ब्लॉक का पहाड़ी गांव) में जब पाइप के रास्ते पानी पहुंचा और करीब सत्तर-पचहत्तर साल बाद पहली बार किसी नल से पानी निकला, तब विकास किसी सरकारी रिपोर्ट का शब्द नहीं रहा। वह पानी बनकर सामने था। एक वृद्ध महिला ने कोई भाषण या औपचारिक धन्यवाद नहीं दिया; उन्होंने बस कांपते हाथों से दिव्या के सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। उस स्पर्श ने शायद किसी प्रशस्ति-पत्र से अधिक गहरी बात कह दी। दिव्या ने लिखा कि वह यह सोचकर आई थीं कि कुछ देने जा रही हैं, जबकि असल में सबसे ज्यादा उन्होंने ही पाया। यही वह क्षण है जब अधिकारी की आंख से फाइल हटती है और सामने इंसान दिखाई देता है।
उनके अनुभवों की दूसरी किताब देवरिया और मिर्जापुर ने मिलकर लिखी। देवरिया ने उन्हें बताया कि सही के साथ खड़ा होना सुविधा नहीं, कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ हमेशा पत्थर पर लिखी हुई सच्चाई नहीं होता; कई बार वह केवल किसी की बनाई हुई धारणा होता है। जमीन का अधिकार पाकर परिवार की आंखों में लौटती चमक, विकलांग व्यक्ति को मिलती गरिमा या किसान के खेत तक पहुंचता पानी—इन छोटे दिखने वाले बदलावों ने प्रशासन की बड़ी-बड़ी परिभाषाओं को उनके सामने छोटा कर दिया। तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिसने व्यवस्था के भीतर रहकर इतने अर्थ खोज लिए, वह उसी व्यवस्था से बाहर क्यों चला गया?
इस प्रश्न का आसान उत्तर शायद कोई नहीं है। न उन्होंने किसी एक घटना को इस्तीफे का कारण बताया, न किसी टकराव को। उनका कहना है—‘कुछ भी ट्रिगर नहीं हुआ। पिछले कुछ महीनों से लग रहा था कि मैं इस काम से हो गई हूं।’ इस वाक्य को शिकायत की तरह पढ़ना भूल होगी। यह उस व्यक्ति की स्वीकारोक्ति है जिसने अपने हिस्से का रास्ता चलकर महसूस किया कि अब दिशा बदलनी चाहिए। व्यवस्था में रहकर परिवर्तन करना एक रास्ता है, लेकिन हर परिवर्तन का पता सरकारी पदनाम से होकर नहीं गुजरता। कभी-कभी पद से बाहर निकलना भी अपने विश्वास के प्रति ईमानदारी होता है।
यही कारण है कि उनका इस्तीफा उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो सिविल सेवा को अंतिम मंजिल मानकर वर्षों तक किताबों, परीक्षाओं और रैंक के बीच अपना भविष्य खोजते हैं। दिव्या का जीवन बताता है कि आईएएस बनना उपलब्धि हो सकती है, उद्देश्य नहीं। लंदन की सुरक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर भारत लौटना एक चुनाव था; आईएएस की प्रतिष्ठित कुर्सी छोड़ना दूसरा। दोनों फैसलों के पीछे एक ही बेचैनी थी—अपने देश और लोगों के लिए कुछ करने की। अब उनके इस्तीफे के बाद राजनीति में जाने की अटकलें हैं। उनका जवाब है—‘जब समय आएगा, तब बोलूंगी।’ शायद यह मौन जल्दबाजी से बेहतर है, क्योंकि हर सपना घोषणा से नहीं, तैयारी से आकार लेता है।
दिव्या का जाना प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक असहज आईना रखता है। सिविल सेवा राज्य की रीढ़ है और स्वेच्छा से अलग होने वाला हर अधिकारी एक सवाल छोड़ता है—क्या व्यवस्था उन लोगों के लिए पर्याप्त जगह बना पा रही है, जिनकी बेचैनी केवल फाइल निपटाने से शांत नहीं होती? इसका अर्थ यह नहीं कि हर इस्तीफा व्यवस्था की विफलता है। लेकिन ऐसे फैसले हमें व्यवस्था के उद्देश्य पर फिर सोचने को मजबूर करते हैं। पद रहते हुए दिव्या ने पानी पहुंचाया; अब पद से बाहर निकलकर भी वे शायद उन प्यासों तक पहुंचना चाहती हैं, जिन्हें सरकारी सीमाएं नहीं छू पातीं। सेवा का रास्ता बदल सकता है, सेवा की प्यास नहीं।
आखिर में बचता है वही कांपता हाथ, जो एक बुजुर्ग महिला ने उनके सिर पर रखा था। सरकारी कुर्सी बदलती है, पदनाम मिट जाता है, फाइलें दूसरी मेज पर चली जाती हैं; लेकिन किसी की आंख में लौटी उम्मीद और किसी आंगन में पहली बार बहा पानी स्मृति से नहीं जाता। दिव्या मित्तल का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि एक आईएएस अधिकारी ने नौकरी छोड़ दी। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने पद और उद्देश्य में फर्क करने का साहस दिखाया। कुर्सी सेवा का माध्यम थी; जनता का सपना मंजिल। अब देखना है कि पद से मुक्त हुई यह ऊर्जा किस दिशा में बहती है। कुछ सपने कुर्सी पर बैठकर पूरे होते हैं, कुछ कुर्सी छोड़ने के बाद चलना शुरू करते हैं।



