समान नागरिक संहिता:समानता और विविधता के बीच संतुलन

अवनीश कुमार गुप्ता
अवनीश कुमार गुप्ता

कानून किसी समाज की केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं होता, बल्कि वह उसकी सामाजिक चेतना, न्याय-बोध और बदलती परिस्थितियों का दर्पण भी होता है। मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में विवाह, परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय मुख्यतः परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय रीति-रिवाजों से संचालित होते थे। जैसे-जैसे राज्य संगठित हुए और नागरिक जीवन जटिल होता गया, इन बिखरे नियमों को लिखित और व्यवस्थित रूप देने की आवश्यकता महसूस हुई। नागरिक संहिताओं का विकास इसी दीर्घ यात्रा का परिणाम है।

प्राचीन विधि-व्यवस्थाओं से लेकर रोमन विधि और यूरोपीय संहिताकरण तक कानून निरंतर बदलता रहा। 1804 की नेपोलियन संहिता इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। उसने अनेक स्थानीय और परंपरागत नियमों को एक संगठित नागरिक विधि में पिरोने का प्रयास किया। इससे दुनिया के अनेक हिस्सों में संहिताबद्ध कानून की अवधारणा को बल मिला। हालांकि इतिहास यह भी बताता है कि कोई संहिता अपने समय की सामाजिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं होती। इसलिए कानून बन जाना अंतिम मंजिल नहीं; बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार उसका पुनर्मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी है।

भारत की विधिक यात्रा अपनी विविध सामाजिक संरचना के कारण अधिक जटिल रही है। यहां अनेक धर्मों, भाषाओं, समुदायों और परंपराओं का सहअस्तित्व रहा है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार जैसे विषय लंबे समय तक अलग-अलग व्यक्तिगत विधियों से प्रभावित रहे। स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं के सामने चुनौती थी कि नागरिकों को समानता और समान अधिकार दिए जाएं, लेकिन साथ ही देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान भी बना रहे।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 इसी विमर्श का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की अपेक्षा की गई है। दूसरी ओर संविधान समानता, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता को भी महत्वपूर्ण स्थान देता है। इसलिए समान नागरिक संहिता केवल कानून बनाने का प्रश्न नहीं है; यह विभिन्न संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी है।

स्वतंत्र भारत में व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। विवाह, उत्तराधिकार और परिवार से जुड़े अनेक कानूनों में परिवर्तन किए गए। इन सुधारों ने यह सिद्ध किया कि परंपरा और कानून स्थायी रूप से एक-दूसरे से बंधे नहीं होते। समाज में जब समानता और न्याय की नई अपेक्षाएं पैदा होती हैं, तो कानून को भी उनका उत्तर देना पड़ता है। इसी क्रम में महिलाओं के अधिकार, विवाह में समानता, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे विषय व्यापक विधिक विमर्श का हिस्सा बने।

समान नागरिक संहिता के पक्ष में सबसे प्रमुख तर्क विधिक समानता और लैंगिक न्याय का है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में नागरिकों के अधिकार केवल धार्मिक पहचान के आधार पर अलग क्यों हों—यह प्रश्न स्वाभाविक है। विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि समान परिस्थितियों में किसी महिला के अधिकार केवल अलग व्यक्तिगत विधि के कारण बदल जाते हैं, तो संवैधानिक समानता की कसौटी पर उस व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।

लेकिन समानता का अर्थ हर स्थिति में एकरूपता नहीं है। भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत विविध है। अनेक आदिवासी और स्थानीय समुदायों की अपनी पारिवारिक तथा उत्तराधिकार परंपराएं हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता बनाते समय यह सावधानी जरूरी है कि समानता के नाम पर सांस्कृतिक विविधता को अनावश्यक रूप से समाप्त न किया जाए। जो अंतर सामाजिक विविधता को व्यक्त करते हैं और जो अंतर किसी नागरिक को असमान अधिकार देते हैं, दोनों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा।

यहीं इस विमर्श की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी सामने आती है—समान कानून का लक्ष्य केवल समान नियम नहीं, बल्कि समान न्याय होना चाहिए। कानून को यह देखना होगा कि नागरिक की गरिमा, स्वतंत्रता और अधिकार सुरक्षित रहें। कोई परंपरा केवल इसलिए न्यायपूर्ण नहीं हो जाती कि वह पुरानी है; उसी तरह कोई नया नियम केवल इसलिए उचित नहीं हो जाता कि वह आधुनिक दिखाई देता है। कानून की असली परीक्षा उसके प्रभाव में होती है।

भारत में गोवा की नागरिक विधि लंबे समय से समान नागरिक व्यवस्था की चर्चा का उदाहरण रही है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता को विधायी रूप देकर इस विमर्श को व्यावहारिक धरातल प्रदान किया। इससे बहस केवल सैद्धांतिक नहीं रही। अब यह देखने का अवसर है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य नागरिक मामलों को समान नियमों में लाने से प्रशासन, समाज और नागरिक अधिकारों पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ता है।

किसी भी नागरिक संहिता की वास्तविक परीक्षा उसके लागू होने के बाद शुरू होती है। कानून की धाराएं बनाना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन उन्हें समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी रूप से पहुंचाना कठिन कार्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता, दस्तावेजों की उपलब्धता, पंजीकरण की सरल प्रक्रिया, अधिकारियों का प्रशिक्षण, न्यायालयों की क्षमता और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को विधिक सहायता जैसे प्रश्न निर्णायक होंगे। कानून समान हो, लेकिन उसे समझने और लागू कराने की प्रक्रिया कठिन हो, तो समानता का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

डिजिटल युग में निजता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और निजी संबंधों से जुड़ी सूचनाएं अत्यंत संवेदनशील होती हैं। इसलिए आधुनिक नागरिक संहिता को नागरिक अधिकारों के साथ निजी जानकारी की सुरक्षा का मजबूत ढांचा भी सुनिश्चित करना होगा। राज्य की भूमिका नागरिक को कानूनी सुरक्षा देना है, उसके निजी जीवन पर अनावश्यक नियंत्रण बढ़ाना नहीं।

समान नागरिक संहिता को किसी समुदाय की जीत और दूसरे समुदाय की हार के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा। ऐसा दृष्टिकोण विधिक सुधार को सामाजिक न्याय के प्रश्न से हटाकर पहचान की राजनीति में ले जाता है। यदि इसे समान नागरिकता, लैंगिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के विस्तार के रूप में देखा जाए तो संवाद की संभावना अधिक मजबूत होगी। कानून जितना व्यापक हो, उसकी भाषा उतनी ही संयमित और प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।

वास्तव में समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी चुनौती कानून की एकरूपता नहीं, बल्कि न्याय की समानता है। कानून की किताब में सभी बराबर हों और व्यवहार में कमजोर व्यक्ति न्याय से दूर रह जाए, तो संहिता का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए विधिक सुधार के साथ सस्ती न्याय व्यवस्था, प्रभावी विधिक सहायता, सरल प्रशासन और व्यापक कानूनी जागरूकता भी आवश्यक है।

अंततः समान नागरिक संहिता को केवल ‘एक कानून’ के रूप में देखना उसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा। इसका मूल प्रश्न यह है कि आधुनिक भारत में नागरिक के अधिकार कितने समान, स्पष्ट और न्यायपूर्ण हैं। इतिहास बताता है कि नागरिक संहिताएं समय के साथ बदलती रही हैं और भविष्य में भी बदलेंगी। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो लैंगिक न्याय को मजबूत करे, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करे, धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करे, सामाजिक विविधता को समझे और कानून के समक्ष समान नागरिकता को वास्तविक अर्थ प्रदान करे।

कानून की अंतिम सफलता उसकी धाराओं की संख्या में नहीं, बल्कि उस क्षण में दिखाई देती है जब एक सामान्य नागरिक बिना भेदभाव, भय और अनावश्यक जटिलता के अपने अधिकार का उपयोग कर सके। समान नागरिक संहिता की सबसे बड़ी कसौटी भी यही होगी। यदि वह नागरिक को केवल समान नियम नहीं, बल्कि समान सम्मान, समान सुरक्षा और न्याय तक समान पहुंच दे सके, तभी नागरिक संहिताओं के सदियों पुराने विकास की भारतीय यात्रा अपने सार्थक पड़ाव तक पहुंच पाएगी।

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