सहारनपुर में सपा-कांग्रेस की कलह खुली

सहारनपुर में सपा-कांग्रेस की कलह खुली, 2027 से पहले बढ़ी वर्चस्व की जंग

अजय कुमार
अजय कुमार

सहारनपुर की एक बैठक ने उत्तर प्रदेश के विपक्षी गठबंधन की उस तस्वीर को सामने ला दिया, जिसे अब तक बयानबाजी के बीच दबा हुआ माना जा रहा था। जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा की बैठक में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के विधायक आशु मलिक आमने-सामने आ गए। मुद्दा जनता की समस्याओं का था, लेकिन बात सवाल पूछने की बारी से निकलकर राजनीतिक तेवरों तक पहुंच गई। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने हुई इस नोकझोंक का वीडियो सामने आया तो सहारनपुर की सियासत में हलचल मच गई।मंगलवार को विकास भवन सभागार में हुई बैठक में आशु मलिक अपनी विधानसभा से जुड़े मुद्दे उठा रहे थे। बेहड़ा संदल गांव में सड़क और अधूरे नाले का मामला सामने आया। विधायक का कहना था कि करीब चार साल पहले बनी सड़क के साथ नाला पूरा नहीं हुआ, जिससे पानी खेतों और कब्रिस्तान की तरफ जा रहा है।

अधिकारी की ओर से जवाब आया कि नाला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत नहीं आता। मलिक इससे संतुष्ट नहीं हुए और पुराने जवाब का हवाला देते हुए सवाल जारी रखा। यहीं से बैठक का माहौल गर्म होना शुरू हुआ। मलिक का तर्क सीधा था बैठक जनता के सवालों के लिए है और जनप्रतिनिधि सवाल नहीं पूछेंगे तो फिर कौन पूछेगा। वायरल वीडियो में वह जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कहते दिखे। दूसरी तरफ बैठक की अध्यक्षता कर रहे इमरान मसूद का कहना था कि सभी सदस्यों को बोलने का मौका मिलना चाहिए और प्रक्रिया के तहत बात रखी जानी चाहिए। मसूद ने मलिक को चेयर की अनुमति लेने की बात कही। मलिक ने इसका जवाब देते हुए बैठक को जनता के मुद्दों से जोड़ दिया। कुछ ही क्षणों में विकास की समीक्षा वाली बैठक राजनीतिक बहस में बदल गई।

इस टकराव की अहम बात यह है कि दोनों नेता एक-दूसरे के लिए नए नहीं हैं। इमरान मसूद और आशु मलिक के बीच लंबे समय से राजनीतिक खींचतान चली आ रही है। मई 2025 में यह विवाद खुलकर सामने आया था, जब मसूद ने सहारनपुर देहात सीट को लेकर कांग्रेस की सक्रियता के संकेत दिए थे। इसके बाद मलिक ने मसूद को खुली चुनौती दी थी। मसूद ने भी कांग्रेस को किसी की बैसाखी की जरूरत न होने की बात कही थी। उस समय सहारनपुर की सातों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को मजबूत करने की बात भी सामने आई थी। यहीं से आज की तस्वीर का असली मतलब समझ आता है। विवाद केवल यह नहीं है कि दिशा बैठक में कौन पहले बोला और किसने किसे रोका। असली सवाल सहारनपुर में राजनीतिक प्रभाव का है। इमरान मसूद 2024 में सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे। दूसरी तरफ आशु मलिक सहारनपुर देहात से सपा के विधायक हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले नेता हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोट का महत्व किसी से छिपा नहीं है।

यानी एक तरफ सांसद के रूप में मसूद की अपनी राजनीतिक जमीन है, तो दूसरी तरफ विधायक के रूप में मलिक की अपनी पकड़। दोनों दल गठबंधन में हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति में दोनों नेताओं की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी हों, यह जरूरी नहीं। 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, यही स्थानीय समीकरण और ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। आशु मलिक की राजनीति भी साधारण नहीं रही है। वह समाजवादी पार्टी के भीतर लंबे समय से प्रभावशाली चेहरा रहे हैं और कभी शिवपाल यादव के करीबी माने जाते थे। बाद में अखिलेश यादव के साथ उनकी राजनीतिक नजदीकी बनी। 2017 में समाजवादी पार्टी के भीतर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच चले संघर्ष के दौरान भी उनका नाम प्रमुखता से सामने आया था। ऐसे नेता के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक जमीन छोड़ना आसान नहीं होगा।

दूसरी तरफ इमरान मसूद की राजनीति भी कई पड़ावों से गुजरकर मौजूदा मुकाम तक पहुंची है। कांग्रेस से अलग होकर सपा और फिर बसपा में जाने के बाद वह 2023 में कांग्रेस में लौटे और 2024 में सहारनपुर से लोकसभा चुनाव जीत गए। ऐसे में सांसद बनने के बाद उनका राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है। 2024 के चुनाव में सहारनपुर में कांग्रेस को करीब 44.6 फीसदी वोट मिले और मसूद ने भाजपा उम्मीदवार को लगभग 5.25 प्रतिशत के अंतर से हराया। यह जीत उन्हें स्थानीय राजनीति में मजबूत दावेदार बनाती है।यही वजह है कि 2027 की आहट के बीच सहारनपुर की यह खींचतान मामूली नहीं मानी जा सकती। गठबंधन में सीटों का तालमेल ऊपर से तय हो सकता है, लेकिन नीचे कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल अलग कहानी कहता है।

अगर दो सहयोगी दलों के प्रभावशाली नेता सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे की बात काटते दिखें तो उसका असर संगठन के कार्यकर्ताओं और संभावित चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय है।हालांकि इमरान मसूद ने विवाद को बड़ा राजनीतिक टकराव मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि कोई झगड़ा नहीं हुआ था। बैठक की अध्यक्षता उनकी जिम्मेदारी थी और वह सिर्फ यह सुनिश्चित कर रहे थे कि सभी जनप्रतिनिधियों को बोलने का मौका मिले। उनके मुताबिक आशु मलिक ज्यादा समय ले रहे थे और वह दूसरे सदस्यों की बारी सुनिश्चित करना चाहते थे। बाद में उन्होंने संबंधित अधिकारी को मामले की पूरी जानकारी एक सप्ताह के भीतर बिंदुवार उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।

यानी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जिस मुद्दे पर दोनों नेता भिड़े, वह वास्तव में जनता से जुड़ा था। सड़क, नाला, पानी, टैक्स और स्थानीय विकास जैसे सवाल किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए राजनीतिक रूप से अहम हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब जनता के सवालों की लड़ाई नेताओं के आपसी वर्चस्व की लड़ाई जैसी दिखाई देने लगे।इस पूरे घटनाक्रम में इकरा हसन की मौजूदगी भी ध्यान खींचती है। सपा सांसद दोनों नेताओं के बीच हुई बहस के दौरान पास ही बैठी थीं। उन्होंने विवाद में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन उनकी मौजूदगी ने तस्वीर को और बड़ा राजनीतिक अर्थ दे दिया। एक तरफ सपा का विधायक, दूसरी तरफ कांग्रेस का सांसद और बीच में गठबंधन की राजनीति सहारनपुर की बैठक ने विपक्षी एकता की जमीनी चुनौती दिखा दी।भाजपा को भी इस विवाद पर हमला करने का मौका मिल गया। पार्टी ने इसे सपा-कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई से जोड़ते हुए गठबंधन पर सवाल उठाए।

लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि सहारनपुर में लड़ाई सिर्फ आज की बैठक की नहीं है। यह आने वाले चुनाव की जमीन तैयार होने का संकेत है। जब एक सांसद और विधायक विकास बैठक में सवालों की बारी को लेकर भिड़ते हैं, तो उसके पीछे स्थानीय राजनीति, संगठनात्मक पकड़ और भविष्य की चुनावी दावेदारी की परतें भी होती हैं।सपा और कांग्रेस के लिए चुनौती यही है कि ऊपर के नेताओं की दोस्ती को नीचे के नेताओं की प्रतिद्वंद्विता में बदलने से कैसे रोका जाए। क्योंकि चुनावी गठबंधन सिर्फ सीटों के जोड़ से नहीं चलता। उसके लिए जमीन पर भरोसा, कार्यकर्ताओं में तालमेल और स्थानीय नेताओं के बीच न्यूनतम समन्वय जरूरी होता है।सहारनपुर की दिशा बैठक ने फिलहाल यही सवाल खड़ा किया है अगर 2027 से पहले ही गठबंधन के दो मजबूत चेहरे आमने-सामने आ गए हैं, तो चुनावी मैदान में सीटों और नेतृत्व की बारी आने पर क्या होगा? यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले महीनों में सहारनपुर की राजनीति तय करेगी।

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