सुशासन की सबसे बड़ी परीक्षा

अवनीश कुमार गुप्ता
अवनीश कुमार गुप्ता

भ्रष्टाचार पर चर्चा प्रायः किसी घोटाले, आरोप या राजनीतिक विवाद के समय तेज़ हो जाती है, किंतु सुशासन का वास्तविक मूल्यांकन उन क्षणों में नहीं होता जब समाचार सुर्खियाँ बनते हैं, बल्कि तब होता है जब सामान्य नागरिक बिना किसी भय, सिफारिश या अतिरिक्त बोझ के अपने अधिकार प्राप्त कर सके। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि उसकी संस्थाएँ नियमों से संचालित होती हैं या व्यक्तियों की इच्छा से। यही कारण है कि भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक अपराध मानना पर्याप्त नहीं है। यह शासन व्यवस्था की गुणवत्ता, संस्थागत संस्कृति, सार्वजनिक नैतिकता और नागरिक विश्वास का भी प्रश्न है।

आधुनिक समय में भ्रष्टाचार का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक जटिल हो चुका है। पहले इसे मुख्यतः रिश्वत, कमीशन या सरकारी धन के दुरुपयोग तक सीमित माना जाता था, जबकि आज इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं। नीतिगत पक्षपात, नियामकीय प्रभाव, हितों का टकराव, अपारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण, सार्वजनिक खरीद में अनियमितता, डिजिटल मंचों पर डेटा का दुरुपयोग और प्रभावशाली समूहों द्वारा नीति निर्माण को प्रभावित करने के प्रयास भी इसी व्यापक परिघटना का हिस्सा हैं। इसलिए भ्रष्टाचार की चर्चा केवल आपराधिक कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय प्रशासनिक सुधार, संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया से जोड़ना आवश्यक है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2025 के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स ने एक बार फिर संकेत दिया कि विश्व के अधिकांश देशों में सार्वजनिक क्षेत्र की पारदर्शिता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी है। रिपोर्ट में वैश्विक औसत स्कोर में गिरावट तथा अनेक लोकतांत्रिक देशों में भी संस्थागत चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। यह निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि केवल आर्थिक विकास भ्रष्टाचार को स्वतः समाप्त नहीं करता। यदि स्वतंत्र निगरानी संस्थाएँ, निष्पक्ष जांच व्यवस्था, प्रभावी न्यायिक प्रक्रिया और जवाबदेह प्रशासन समान गति से विकसित न हों, तो आर्थिक प्रगति भी सीमित प्रभाव छोड़ती है।

डिजिटल शासन को भ्रष्टाचार कम करने का प्रभावी माध्यम माना गया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ऑनलाइन भुगतान, ई-टेंडरिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण और सेवा वितरण की ऑनलाइन व्यवस्था ने अनेक स्तरों पर मानवीय हस्तक्षेप कम किया है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और कई प्रक्रियाएँ पहले की तुलना में सरल हुई हैं। किंतु यह मान लेना उचित नहीं होगा कि तकनीक स्वयं भ्रष्टाचार समाप्त कर देती है। यदि डिजिटल प्रणाली का ऑडिट, साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और स्वतंत्र निगरानी कमजोर रहे तो अनियमितताओं का स्वरूप केवल बदल जाता है, समाप्त नहीं होता।

भ्रष्टाचार का सबसे गंभीर प्रभाव आर्थिक असमानता पर पड़ता है। जब संसाधनों का वितरण योग्यता के बजाय प्रभाव के आधार पर होने लगे, तब प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ती है। ईमानदार उद्यमियों का विश्वास घटता है, निवेश की गुणवत्ता प्रभावित होती है और नवाचार की गति धीमी हो जाती है। इसका प्रत्यक्ष असर रोजगार, उत्पादकता और कर संग्रह पर दिखाई देता है। अंततः इसकी कीमत वही नागरिक चुकाता है जिसका शासन व्यवस्था में सबसे कम प्रभाव होता है।

READ ALSO : पुलिस नहीं सरकारी वकीलों की कमी से लड़खड़ा रही न्याय व्यवस्था

राजनीतिक वित्तपोषण का प्रश्न भी इस विमर्श का महत्वपूर्ण भाग है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव अत्यंत आवश्यक हैं, किंतु चुनावी प्रक्रिया जितनी महंगी होती जाएगी, उतनी ही पारदर्शिता की आवश्यकता भी बढ़ेगी। चुनावी चंदे, व्यय, प्रचार और वित्तीय स्रोतों के संबंध में स्पष्ट नियम, स्वतंत्र लेखा परीक्षण और समयबद्ध सार्वजनिक प्रकटीकरण लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करते हैं। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वस्थ तभी मानी जाएगी जब वित्तीय पारदर्शिता सभी पक्षों पर समान रूप से लागू हो।

समान रूप से महत्वपूर्ण विषय नियामकीय संस्थाओं की स्वतंत्रता है। जब किसी संस्था पर अत्यधिक राजनीतिक, आर्थिक या प्रशासनिक प्रभाव पड़ने लगे, तब उसका निर्णय सार्वजनिक हित के बजाय विशेष हितों की ओर झुक सकता है। इसलिए नियामक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल, वित्तीय स्वायत्तता और जवाबदेही का संतुलित ढाँचा लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला माना जाना चाहिए। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका निष्पक्ष क्रियान्वयन अधिक महत्वपूर्ण है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में न्यायपालिका की दक्षता भी निर्णायक भूमिका निभाती है। यदि जांच वर्षों तक लंबित रहे, मुकदमे अनिश्चितकाल तक चलते रहें या दोषसिद्धि की प्रक्रिया अत्यधिक धीमी हो, तो कानून का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। समयबद्ध जांच, आधुनिक फोरेंसिक क्षमता, डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन और न्यायालयों में तकनीकी संसाधनों का विस्तार इस दिशा में आवश्यक सुधार हैं। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया और सक्रिय नागरिक समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। खोजी पत्रकारिता, सूचना के अधिकार का प्रभावी उपयोग, सामाजिक लेखा परीक्षा और जनभागीदारी प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करते हैं। साथ ही मीडिया की विश्वसनीयता भी तथ्यपरकता, स्रोतों की पुष्टि और संतुलित प्रस्तुति पर निर्भर करती है। सूचना की गति जितनी बढ़ी है, उतनी ही जिम्मेदारी सत्यापन की भी बढ़ी है।

शिक्षा व्यवस्था में नैतिक प्रशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व को अधिक महत्व दिए जाने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का भी प्रश्न है। यदि नई पीढ़ी यह मानने लगे कि नियमों का उल्लंघन सफलता का सामान्य साधन है, तो कोई भी कानूनी व्यवस्था पर्याप्त सिद्ध नहीं होगी। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों में ईमानदारी, सार्वजनिक संसाधनों के सम्मान और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित नागरिक शिक्षा को व्यवहारिक रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है।

व्हिसलब्लोअर संरक्षण भी सुधार का एक महत्वपूर्ण आयाम है। अनेक मामलों में अनियमितताओं की जानकारी सबसे पहले संस्थानों के भीतर कार्यरत लोगों को होती है, किंतु पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में वे सामने आने से हिचकते हैं। प्रभावी कानूनी संरक्षण, गोपनीय शिकायत व्यवस्था और प्रतिशोध से सुरक्षा किसी भी पारदर्शी शासन प्रणाली के लिए अनिवार्य है। इससे संस्थागत सुधार भीतर से प्रारंभ होते हैं और अनियमितताओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

सार्वजनिक खरीद प्रणाली में खुली प्रतिस्पर्धा, डिजिटल निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट और अनुबंधों का सार्वजनिक प्रकटीकरण भी भ्रष्टाचार नियंत्रण के प्रभावी साधन हैं। विश्व बैंक, ओईसीडी तथा संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अनेक अध्ययन यह संकेत देते हैं कि प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी खरीद व्यवस्था सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता बढ़ाती है तथा संसाधनों के दुरुपयोग की संभावना घटाती है। इसलिए सरकारी व्यय की प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रक्रिया नागरिकों के लिए अधिकाधिक पारदर्शी बनाई जानी चाहिए।

यह भी समझना होगा कि भ्रष्टाचार का समाधान केवल कठोर दंड से संभव नहीं है। दंड आवश्यक है, किंतु उससे पहले ऐसी प्रशासनिक संरचना विकसित करनी होगी जिसमें विवेकाधीन शक्तियाँ सीमित हों, प्रक्रियाएँ सरल हों, सेवा वितरण समयबद्ध हो और निर्णयों का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे। जितनी कम अनावश्यक जटिलता होगी, उतने ही कम अवसर अनियमितताओं के लिए बचेंगे।

अंततः किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाओं पर जनता का विश्वास होता है। यह विश्वास भाषणों या अभियानों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रशासन, पारदर्शी नीति निर्माण, समान कानून, प्रभावी निगरानी और समयबद्ध न्याय से निर्मित होता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध वास्तविक सफलता तभी संभव है जब सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज अपनी-अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें। सुशासन कोई एक बार प्राप्त होने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर आत्मसमीक्षा, संस्थागत सुधार और सार्वजनिक उत्तरदायित्व की सतत प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया लोकतंत्र टैक्स केवल चुनावों तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि उसे नागरिक विश्वास, समान अवसर और न्यायपूर्ण विकास की स्थायी आधारशिला में परिवर्तित करती है।

Related Articles

Back to top button