
कारागार विभाग में बगैर चढ़ावे के नहीं होती बहाली! विभाग की फाइलों में कैद हुआ बहाली का शासनादेश। निलंबित हुए महीनों बीत गए फिर भी नहीं हो रही कोई सुनवाई। औपचारिकता पूरी होने के बाद भी शासन ने नहीं किया बहाली का आदेश।
राकेश यादव
लखनऊ। न बाप बड़ा न भईया सबसे बड़ा रुपईया… यह कहावत प्रदेश कारागार विभाग के आला अफसरों पर एकदम फिट बैठती है। यही वजह है कि इस विभाग में शासनादेश का भी कोई मायने नहीं रह गया है। विभाग में बगैर चढ़ावा के निलंबित अधिकारियों की बहाली नहीं होती है। शासनादेश के मुताबिक निलंबित अधिकारी को तीन माह में बहाल किए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। लेकिन इस विभाग में यह व्यवस्था फाइलों में कैद होकर रह गई है। यही वजह है कि विभाग में एक साल और छह माह पूर्व निलंबित किए गए अधीक्षकों को अभी तक बहाल नहीं किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि निलंबित अधिकारियों को बगैर किसी काम के आधा वेतन दिया जा रहा है और बहाली होने के बाद इन अधिकारियों को निलंबन अवधि के वेतन का भी भुगतान कर दिया जाता है। उधर शासन के अधिकारी इस मसले पर कोई भी टिप्पणी करने से बच रहे हैं।
मिली जानकारी के मुताबिक करीब सवा साल पहले गाजीपुर जेल में अनधिकृत तरीके से संचालित हो रहे मोबाइल फोन मामले में जेल अधीक्षक अरुण प्रताप सिंह को निलंबित किया गया। इसी प्रकार बीते जनवरी माह में 24 दिन के अंतराल में कन्नौज और अयोध्या जेल से दो दो बंदियों की फरारी हो गई थी। इस फरारी में अयोध्या जेल अधीक्षक यूपी मिश्रा को तत्काल और कन्नौज जेल अधीक्षक भीमसेन मुकुंद को घटना के करीब डेढ़ माह बाद निलंबित कर दिया गया। सूत्रों के मुताबिक इस तीन निलंबित अधीक्षकों की बहाली के लिए लगभग सभी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। इसके बाद भी बहाली की फाइल शासन में अधिकारियों ने दबा रखी है। इन अधीक्षकों को अभी तक बहाल नहीं किया गया है। सूत्रों की माने तो इस विभाग में बगैर चढ़ावे के बहाली की ही नहीं जाता है।
शासनादेश के मुताबिक निलंबन को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं रखा जा सकता है। निलंबन 90 दिन में रिव्यू होना चाहिए। सुप्रीमकोर्ट के निर्देशानुसार यदि 90 दिन के भीतर चार्जशीट नहीं दी जाती तो निलंबन जारी रखना उचित नहीं माना जाता जब तक विशेष कारण न हो। 90 दिन के अंदर चार्जशीट दी जानी चाहिए। चार्जशीट का जवाब देने के लिए 10 से 15 दिन का समय दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाया जा सकता है। जवाब संतोषजनक नहीं होनेबपर जांच अधिकारी नियुक्त हो सकता है। वह गवाहों की जांच के साथ दस्तावेजों का परीक्षण और कर्मचारी को अपना पक्ष का पूरा मौका दिया जाता है। निलंबन के दौरान कर्मचारी को भत्ता मिलता है। यदि आरोप गंभीर नहीं है तो लंबे निलंबन को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। इस प्रक्रिया के लिए लगभग तीन माह की समयावधि तय की गई है। विभाग में तीनों अधीक्षक को निलंबित हुए लंबी समयावधि बीत जाने के बाद भी चढ़ावे के इंतजार में अभी तक बहाल नहीं किया गया है।
जिम्मेदार आला अफसर नहीं उठाते सीयूजी फोन
कारागार विभाग के लंबे समय से निलंबित तीन अधिकारियों की बहाली के संबंध में जब विभागाध्यक्ष डीजी जेल पीसी मीणा से बात की गई तो उन्होंने बताया कि निलंबित अधीक्षकों की बहाली के संबंध में शासन को कई बात पत्र लिखा जा चुका है। बहाली की समस्त औपचारिकता जो पूरा कर शासन को भेज भी दिया गया है। उधर जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से इस संबंध में बात करने का प्रयास किया गया तो कई प्रयासों के बाद भी उनका फोन नहीं उठा। विभाग में तबादलों और फाइलों को निपटाने में वसूली के लिए चर्चित संयुक्त सचिव शिवगोपाल सिंह ने भी फोन नहीं उठाया।
























