

राहुल कांग्रेस का हिंदुओं को लड़ाने, मुस्लिम तुष्टिकरण का एजेंडा।देश की राजनीति में एक बार फिर बयानबाज़ी का दौर तेज हो गया है, जहां आरोप-प्रत्यारोप के बीच नीतियों और मंशाओं पर सवाल उठ रहे हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीतियों को लेकर विरोधी दल लगातार निशाना साध रहे हैं, खासकर “तुष्टिकरण” और “वोट बैंक राजनीति” जैसे मुद्दों पर बहस तेज हो गई है।जहां एक ओर कांग्रेस खुद को समावेशी और सभी वर्गों के हितों की पक्षधर बताती है, वहीं दूसरी ओर विरोधी दल इसे चुनावी रणनीति करार देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में सामाजिक संतुलन की कोशिश है या फिर राजनीतिक लाभ के लिए तैयार की गई रणनीति?
राहुल गांधी लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर बोल रहे थे। वे हिंदुओं को दलितों और पिछड़ों में बांटने पर जोर दे रहे थे। तभी उनके मुस्लिम सांसद मेज थपथपा कर तालियां बजा रहे थे। सवाल उठता है कि राहुल गांधी मुसलमानों के पसमांदा समाज की बात क्यों नहीं करते? पसमांदा समाज को पिछड़ों में ही गिना जाता है। समाजवादी पार्टी जैसे दल तुष्टिकरण की सियासत करते हैं, फिर भी उन्होंने पिछड़े मुसलमानों के लिए अलग आरक्षण की मांग क्यों नहीं उठाई? राहुल गांधी अपनी पार्टी की पुरानी विचारधारा से क्यों भटक रहे हैं? दक्षिण और उत्तर के बीच आरक्षण पर खाई क्यों खोदी जा रही है? इन सवालों का जवाब कांग्रेस के शासनकाल के पूर्व प्रधानमंत्रियों के आरक्षण संबंधी रुख से मिलता है।
कांग्रेस का आरक्षण दौर जवाहरलाल नेहरू से शुरू होता है। नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने। वे समाजवाद के पुजारी थे। लेकिन आरक्षण पर उनका रुख सख्त था। 1950 के संविधान में उन्होंने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण दिया। पिछड़ों के लिए कुछ नहीं। नेहरू का मानना था कि जाति आधारित आरक्षण से देश का विकास रुकेगा। वे मेरिट को सर्वोपरि मानते थे। 1961 में वे संसद में बोले, आरक्षण से प्रतिभाओं का दमन होगा। उनका सपना था आर्थिक आधार पर विकास। जाति को वे पुरानी बेड़ी मानते थे। नेहरू के समय मुस्लिम पसमांदा या दक्षिण के पिछड़ों की कोई बात नहीं हुई। उनका फोकस सामान्य कल्याण पर था। लेकिन यही नींव बाद में विवाद का कारण बनी।
नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री आए। 1964 से 1966 तक उनका छोटा कार्यकाल था। शास्त्री जी गरीबी हटाओ के प्रणेता थे। आरक्षण पर वे नेहरू के रास्ते पर चले। अनुसूचित जातियों का आरक्षण जारी रखा। लेकिन पिछड़ों या मुस्लिम पसमांदाओं के लिए कोई नया कदम नहीं। शास्त्री का जोर खेती और आत्मनिर्भरता पर था। वे कहते थे, जय जवान जय किसान। जातिगत बंटवारे से वे दूर रहे। उनका मानना था कि एकता ही देश की ताकत है। दक्षिण भारत में तब मंडल जैसे आंदोलन की बुनियाद पड़ रही थी। लेकिन शास्त्री ने उसे दबाया। कांग्रेस की पुरानी विचारधारा यही थी, सीमित आरक्षण, व्यापक विकास।इंदिरा गांधी ने इस विचारधारा को मोड़ दिया। 1966 से 1977 और फिर 1980 से 1984 तक वे प्रधानमंत्री रहीं। इंदिरा ने राजनीतिक लाभ के लिए आरक्षण का विस्तार किया।
1970 के दशक में गुजरात और बिहार में आरक्षण आंदोलन भड़के। इंदिरा ने पिछड़े वर्गों को आकर्षित करने की कोशिश की। लेकिन ठोस कदम कम ही उठाए। मुस्लिम पसमांदा समाज को उन्होंने अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर लुभाया। अलग आरक्षण की बात नहीं की। इंदिरा का फोकस आपातकाल और गरीबी हटाओ पर था। उन्होंने संविधान में दलितों का आरक्षण 10 वर्ष बढ़ाया। लेकिन दक्षिण के मंडल आयोग को नजरअंदाज किया। कर्नाटक में वहां की सरकार ने 1975 में पिछड़ों को आरक्षण दिया। इंदिरा ने केंद्र से समर्थन नहीं दिया। इससे उत्तर-दक्षिण में दरार की शुरुआत हुई। इंदिरा की सियासत तुष्टिकरण वाली थी, लेकिन जाति आधारित नहीं।

राजीव गांधी ने 1984 से 1989 तक सत्ता संभाली। वे आधुनिक चेहरा थे। लेकिन मंडल आयोग ने उन्हें चुनौती दी। 1990 में वीपी सिंह ने मंडल को लागू किया। राजीव ने इसका विरोध किया। वे संसद में बोले, यह जातिवाद को बढ़ावा देगा। राजीव का मानना था कि आरक्षण से युवाओं का भविष्य बर्बाद होगा। उन्होंने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण का विरोध किया। मुस्लिम पसमांदा पर चुप्पी साधे रहे। राजीव ने कंप्यूटर क्रांति और पंचायती राज लाए। उनका जोर विकास पर था। दक्षिण में तमिलनाडु ने 69 प्रतिशत आरक्षण कर लिया था। राजीव ने केंद्र से इसे सीमित करने की कोशिश की। इससे दक्षिणी राज्य नाराज हुए। कांग्रेस की पुरानी विचारधारा यहीं टूटने लगी। राजीव तुष्टिकरण से दूर रहे।
पीवी नरसिम्हा राव ने 1991 से 1996 तक शासन किया। वे आर्थिक उदारीकरण के जनक थे। मंडल आयोग को लागू करने का श्रेय उन्हें मिला। लेकिन मजबूरी में। वीपी सिंह के बाद सरकार संभाली तो ओबीसी आरक्षण जारी रखा। राव ने मुस्लिम पसमांदा के लिए कुछ नहीं किया। उनका फोकस अर्थव्यवस्था पर था। बाबरी विध्वंस के बाद उन्होंने मुसलमानों को सांत्वना दी, लेकिन आरक्षण नहीं। दक्षिण के तमिलनाडु और कर्नाटक ने उच्च आरक्षण बनाए रखा। राव ने सुप्रीम कोर्ट के 50 प्रतिशत की सीमा का सम्मान किया। लेकिन उत्तर में मंडल ने हिंदुओं को बांटा। राव की कांग्रेस ने तुष्टिकरण का रास्ता अपनाया। पिछड़े मुसलमान उपेक्षित रहे।
मंडल के बाद कांग्रेस कमजोर हुई। फिर सोनिया गांधी का दौर आया। 2004 से 2014 तक यूपीए शासन चला। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। वे अर्थशास्त्री थे। आरक्षण पर उनका रुख नरम था। 2006 में ओबीसी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी दिलाई। लेकिन मुस्लिम पसमांदा को साइडलाइन किया। सच्चर समिति बनी, जिसमें मुसलमानों की पिछड़गी बताई गई। लेकिन पसमांदा के लिए अलग कोटा नहीं। यूपीए ने अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय बनाया। तुष्टिकरण चरम पर पहुंचा। दक्षिण में आरक्षण पहले से ऊंचा था। उत्तर में राहुल गांधी ने दलित-ओबीसी कार्ड खेला। लेकिन पुरानी नेहरूवादी विचारधारा भूल गई। मनमोहन ने कहा, आरक्षण विकास का साधन है। लेकिन हिंदू विभाजन पर जोर दिया। मुस्लिम पसमांदा की अनदेखी जारी रही। अब राहुल गांधी का समय है। वे लोकसभा में हिंदुओं को दलित-पिछड़े में बांटते हैं।
मुस्लिम सांसद तालियां बजाते हैं। लेकिन पसमांदा समाज क्यों भूला? पसमांदा मुसलमान जुलाहा, अंसारी जैसे समुदाय हैं। वे ओबीसी सूची में हैं। लेकिन अलग पहचान की मांग करते हैं। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम ओबीसी को 8 प्रतिशत कोटा दिया। लेकिन केंद्र में चुप। राहुल की सियासत तुष्टिकरण वाली है। वे कहते हैं, आरक्षण न्याय है। लेकिन नेहरू की मेरिट वाली सोच भूल गए। इंदिरा-राजीव ने भी जाति बंटवारे से परहेज किया। अब राहुल दक्षिण की तर्ज पर उत्तर को बांट रहे हैं। तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण है। उत्तर में 27 प्रतिशत ओबीसी। राहुल दक्षिण मॉडल चाहते हैं। इससे उत्तर-दक्षिण खाई गहरी हो रही है।
कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों की श्रृंखला देखें। नेहरू-शास्त्री ने सीमित आरक्षण रखा। इंदिरा ने राजनीतिक लाभ लिया। राजीव ने विरोध किया। राव ने मजबूरी में लागू किया। मनमोहन ने विस्तार किया। राहुल अब हिंदू-केंद्रित बंटवारा कर रहे हैं। मुस्लिम पसमांदा उपेक्षित क्यों? क्योंकि तुष्टिकरण ऊपरी मुसलमानों तक सीमित है। समाजवादी पार्टी भी यही करती है। मुलायम-अखिलेश ने पसमांदा को लुभाया, लेकिन केंद्र में चुप। भाजपा ने पसमांदा को ओबीसी में शामिल किया। लेकिन कांग्रेस चुप। राहुल की पुरानी विचारधारा से दूरी साफ है। नेहरू का समाजवाद जाति-रहित था। अब जाति-केंद्रित हो गया। दक्षिण-उत्तर खाई का कारण यही है। दक्षिण ने मंडल से पहले ही आरक्षण बढ़ा लिया। कर्नाटक, तमिलनाडु ने स्थानीय पिछड़ों को प्रमुखता दी। उत्तर में मंडल 1990 में आया। अब राहुल दक्षिण मॉडल थोपना चाहते हैं।
महिला आरक्षण में भी वे जाति जोड़ते हैं। सवाल वही है पसमांदा क्यों भूले? क्योंकि सियासत ऊपरी वर्गों पर टिकी है। कांग्रेस सरकारों ने कभी मुस्लिम पिछड़ों के लिए अलग कोटा नहीं मांगा। सच्चर समिति की सिफारिशें दब गईं। राहुल का प्रवचन हिंदू विभाजन पर केंद्रित है। मुस्लिम तालियां इसलिए बजाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है, हिंदू बंटेंगे तो उनका वोट सुरक्षित। लेकिन पसमांदा समाज सड़कों पर है। वे कहते हैं, हमें भी न्याय दो। इस कहानी से सीख मिलती है। कांग्रेस की पुरानी विचारधारा विकास-केंद्रित थी। अब वोट-केंद्रित हो गई। राहुल गांधी नेहरू के रास्ते से भटक गए। समाजवादी दल भी पसमांदा को सियासत का मोहरा बनाते हैं। असली सवाल है क्या आरक्षण एकता का हथियार बनेगा या विभाजन का? पूर्व प्रधानमंत्रियों के रुख से साफ है कि शुरुआत एकता से हुई, लेकिन सियासत ने बंटवारा किया। दक्षिण-उत्तर की खाई इसी का नतीजा है। राहुल अगर पुरानी राह अपनाएं तो शायद समाधान निकले। लेकिन फिलहाल तालियां तो बज रही हैं, न्याय अधर में लटका है।






















