Thursday, May 7, 2026
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संकट की घड़ी में उम्मीद का सहारा बना रेड क्रॉस

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संकट की घड़ी में उम्मीद का सहारा बना रेड क्रॉस
संकट की घड़ी में उम्मीद का सहारा बना रेड क्रॉस

पीड़ा के अंधेरों में उम्मीद का दीप जलाता रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट आंदोलन।

सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

हर साल 8 मई को मानवता, सेवा, करुणा और निःस्वार्थ सहायता के भाव को समर्पित विश्व रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संकट, युद्ध, आपदा या महामारी जैसी परिस्थितियों में निस्वार्थ सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। रेड क्रॉस का उद्देश्य बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाना और मानव जीवन की रक्षा करना है। यह दिवस समाज में मानवता, सहयोग और संवेदनशीलता की भावना को मजबूत करने का संदेश देता है।पाठकों को बताता चलूं कि मानव सेवा और राहत कार्यों के लिए प्रसिद्ध संगठन इंटरनेशनल रेड क्रॉस एवं रेड क्रेसेन्ट मूवमेंट के संस्थापक जीन हेनरी डुनेंट, जिन्हें रेड क्रॉस आंदोलन का जनक भी माना जाता है, की जयंती पर यह दिवस मनाया जाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि हेनरी ड्यूनेन्ट को उनके अभूतपूर्व मानवीय कार्य के लिए 1901 में दुनिया का पहला नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि रेड क्रॉस इतिहास का इकलौता ऐसा संगठन है जिसे एक या दो बार नहीं, बल्कि तीन बार नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। मसलन, ​1917 में (प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मानवीय कार्यों के लिए),​1944 में (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उत्कृष्ट सेवाओं के लिए) तथा ​1963 में (संगठन की 100वीं वर्षगांठ पर) में इसे पुरस्कार दिया जा चुका है। ​इसके अलावा, इसके संस्थापक हेनरी ड्यूनेन्ट को मिला पहला नोबेल पुरस्कार (1901) जोड़ लिया जाए, तो इस आंदोलन के खाते में कुल 4 नोबेल पुरस्कार आते हैं।

वास्तव में, इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य युद्ध, आपदा और संकट के समय मानवता की सेवा करने वालों का सम्मान करना है। सरल शब्दों में कहें तो यह दिवस पूरी दुनिया में आपदा, युद्ध, किसी महामारी और संकट के समय लोगों की सहायता करने वाले लाखों स्वयंसेवकों और कर्मचारियों को सम्मान देने के क्रम में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज भी दुनिया में बहुत से लोग आपदाओं, युद्ध, तनाव आदि से पीड़ित हैं और यह दिवस ऐसे लोगों की सहायता,मदद के लिए आम लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। यह लोगों को रक्तदान करने, महामारी या युद्ध से पीड़ित लोगों का प्राथमिक उपचार करने और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करने, उन्हें समय पर विभिन्न स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने को समर्पित है। यह वोलंटियर्स के योगदान का सम्मान करता है तथा उन्हें मान्यता देता है।मानवता, निष्पक्षता, तटस्थता,स्वतंत्रता,स्वैच्छिक सेवा,एकता तथा सार्वभौमिकता इस दिवस के मूल व अहम् सिद्धांत हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह दिवस मानवता की रक्षा को समर्पित है।

बहरहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास पर नजर डालें तो, वर्ष 1859 में इटली के सोलफेरिनो की लड़ाई के दौरान हजारों घायल सैनिकों को तड़पते देखकर हेनरी ड्यूनांट अत्यंत व्यथित हुए। दरअसल, 1859 में, स्विट्जरलैंड के एक युवा व्यवसायी जीन हेनरी ड्यूनेन्ट अपने व्यापार के सिलसिले में नेपोलियन तृतीय से मिलने जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने इटली में ‘सोलफेरिनो का युद्ध’ देखा। उन्होंने यह देखा कि ​युद्ध क्षेत्र में लगभग 40,000 सैनिक मृत या तड़पते हुए पड़े थे और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। ​इस भयावह मंजर ने ड्यूनेन्ट को झकझोर दिया और उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को इकट्ठा किया और बिना यह देखे कि घायल सैनिक किस देश का है, नारा दिया-‘हम सब भाई हैं।’वास्तव में ,इसी घटना ने आगे चलकर रेड क्रॉस की नींव रखी। वास्तव में, ड्यूनेंट ने स्थानीय लोगों की सहायता से घायलों की सेवा की और बाद में ‘सोलफेरिनो की एक स्मृति'(ए मेमोरी आफ सोलफेरिनो) नामक पुस्तक लिखी। इसी विचार से साल 1863 में रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति की स्थापना हुई तथा आगे चलकर जिनेवा सम्मेलन अस्तित्व में आए। बाद में, वर्ष 1948 में आधिकारिक रूप से 8 मई को विश्व रेड क्रॉस दिवस घोषित किया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो आधिकारिक तौर पर पहला ‘अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस दिवस’ 8 मई 1948 को मनाया गया। बाद में, 1984 में इसका नाम बदलकर ‘विश्व रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट दिवस’ कर दिया गया।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि रेड क्रॉस आंदोलन दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय नेटवर्क माना जाता है, जिसमें दुनिया के करोड़ों स्वयंसेवक जुड़े हैं।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग 1.6 करोड़ (16 मिलियन) सक्रिय स्वयंसेवक और कर्मचारी इसमें शामिल हैं। पाठकों को बताता चलूं कि अंतरराष्ट्रीय युद्ध कानून (जिनेवा संधि), जो यह तय करता है कि युद्ध के दौरान भी मानवता बची रहे, उसे लागू कराने और उसकी निगरानी करने की मुख्य जिम्मेदारी रेड क्रॉस की ही है।​इसके नियमों के तहत, युद्ध के दौरान भी रेड क्रॉस के कार्यकर्ताओं को युद्धबंदियों से सीधे मिलने और उनकी स्थिति का जायजा लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

रेड क्रॉस का प्रतीक चिह्न जिनेवा सम्मेलनों के तहत संरक्षित है और इसका दुरुपयोग अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है। रेड क्रॉस के लाल रंग के ‘प्लस’ (+) चिह्न से परिचित हैं, लेकिन इसके तीन आधिकारिक प्रतीक हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है। दरअसल,रेड क्रॉस सफेद पृष्ठभूमि पर लाल क्रॉस है। पाठकों को बताता चलूं कि यह स्विट्जरलैंड के झंडे के रंगों को उलट कर संस्थापक हेनरी ड्यूनेन्ट के देश के सम्मान में बनाया गया था। वहीं पर रेड क्रिसेंट मतलब लाल अर्धचंद्र।यह ऑटोमन साम्राज्य के दौरान मुस्लिम देशों में संवेदनशीलता को देखते हुए अपनाया गया था तथा ​रेड क्रिस्टल तीसरा तटस्थ प्रतीक है, जिसे बिना किसी धार्मिक या सांस्कृतिक जुड़ाव के मानवीय कार्यों की सुरक्षा के लिए अपनाया गया। उल्लेखनीय है कि कई मुस्लिम देशों में ‘रेड क्रॉस’ की जगह ‘रेड क्रिसेंट’ प्रतीक का उपयोग किया जाता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि इंटरनेशनल रेड क्रॉस एवं रेड क्रेसेन्ट मोवमेंट के अंतर्गत ‘रेड क्रिसेंट’ एक मानवीय प्रतीक और सहायता संगठन है, जिसका उपयोग मुख्यतः मुस्लिम देशों में किया जाता है। यह कार्य और उद्देश्य में रेड क्रॉस के समान ही है, केवल इसका प्रतीक अलग होता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि रेड क्रिसेंट का प्रतीक सफेद पृष्ठभूमि पर लाल अर्धचंद्र (चाँद) होता है। इसका उपयोग युद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी और संकट के समय चिकित्सा व राहत सेवाएँ प्रदान करने के लिए किया जाता है। दरअसल, जैसा कि ऊपर भी बता चुका हूं कि 1876 में रूस-तुर्की युद्ध के दौरान ओटोमन साम्राज्य (वर्तमान तुर्की) ने रेड क्रॉस चिह्न के स्थान पर रेड क्रिसेंट का प्रयोग शुरू किया था। बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि रेड क्रिसेंट और रेड क्रॉस दोनों समान सिद्धांतों पर कार्य करते हैं तथा दोनों का उद्देश्य केवल मानव सेवा है, किसी धर्म या राजनीति से इनका संबंध नहीं होता।आज दुनिया के कई इस्लामिक देशों में रेड क्रिसेंट सोसायटी सक्रिय हैं तथा इसका संचालन मानवता, निष्पक्षता और तटस्थता जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। यहां यह भी गौरतलब है कि इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी की स्थापना 1920 में हुई थी,जो युद्ध क्षेत्रों, भूकंप, बाढ़, महामारी और शरणार्थी संकटों में सबसे पहले राहत पहुँचाने वाले संगठनों में शामिल रहता है।

बहरहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस की थीम/विषय के बारे में बात करें तो पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में इस दिवस की थीम-‘मानवता को जीवित रखना'(कीपिंग ह्यूमेनिटी अलाइव) रखी गई थी तथा कई देशों में अभियान संदेश ‘मानवता के पक्ष में'(आन द साइड आफ ह्यूमेनिटी) के रूप में भी चलाया गया था। वास्तव में, इसका उद्देश्य बढ़ते संघर्षों, स्वास्थ्य संकटों और असमानताओं के बीच मानवता को जीवित रखना था। वहीं इस वर्ष की थीम या विषय की बात करें तो यह’ यूनाइटेड इन ह्यूमेनिटी अर्थात ‘मानवता में एकजुट’ रखी गई है। यह थीम संकट के समय समुदायों के साथ खड़े रहने वाले स्वयंसेवकों और कर्मचारियों की एकता और सेवा भावना को दर्शाती है। सरल शब्दों में कहें तो यह थीम उन लाखों स्वयंसेवकों और कर्मचारियों के जज्बे को सलाम करती है जो संकट के समय समुदायों के बीच बाहरी बनकर नहीं, बल्कि उन्हीं का एक हिस्सा बनकर खड़े रहते हैं। यह कठिन समय में बिना किसी भेदभाव के आपसी जुड़ाव, करुणा और मानवीय गरिमा को बनाए रखने पर जोर देती है।

अंत में, यही कहूंगा कि कठिन से कठिन समय में भी हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी आपसी करुणा, सहानुभूति और निस्वार्थ सेवा भाव ही है यानी कि हम हर हाल और परिस्थितियों में मानवता की रक्षा, सुरक्षा करें,यही हमारा दायित्व और कर्तव्य है।विश्व रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट दिवस केवल एक दिवस मात्र ही नहीं, है बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े मानवीय नेटवर्क के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का शानदार पर्व है। युद्ध, आपदा या महामारी-जब दुनिया सबसे बुरे दौर से गुजर रही होती है, तब बिना किसी राजनीतिक या धार्मिक भेदभाव के इस संगठन के स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं।