Friday, May 15, 2026
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गंगा पुनर्जागरण में उत्तर प्रदेश मॉडल बना मिसाल

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गंगा पुनर्जागरण में उत्तर प्रदेश मॉडल बना मिसाल, राज्य बना नमामि गंगे का “एंकर स्टेट”। नमामि गंगे के तहत ₹16,201 करोड़ का महाअभियान, CPCB रिपोर्ट ने दर्ज की ऐतिहासिक सफलता।

लखनऊ, 15 मई, 2026 । एक समय प्रदूषण, सीवर डिस्चार्ज और बदहाल जल गुणवत्ता की पहचान बन चुकी गंगा आज उत्तर प्रदेश में पुनर्जीवन की नई कहानी लिख रही है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश अब देश के सबसे बड़े नदी पुनर्स्थापन अभियान का “एंकर स्टेट” बनकर उभरा है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) द्वारा राज्य में सीवेज अवसंरचना के लिए स्वीकृत ₹16,201 करोड़ का निवेश न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि नीति, तकनीक और सतत निगरानी का संगम किस तरह एक मृतप्राय नदी तंत्र में नया जीवन फूंक सकता है।

₹16,201 करोड़ का निवेश और 80 परियोजनाओं का असर

यह राशि नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर में स्वीकृत कुल सीवेज अवसंरचना निवेश का लगभग 45 प्रतिशत है। 80 स्वीकृत परियोजनाओं में से 53 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं, जबकि 2,701 MLD उपचार क्षमता में से 1,520 MLD क्षमता पहले ही संचालन में आ चुकी है। उत्तर प्रदेश में गंगा का सबसे लंबा प्रवाह क्षेत्र और दशकों से जमा सबसे भारी प्रदूषण भार इस निवेश की प्राथमिक वजह रहा, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है और यह बदलाव सरकारी दावों से आगे बढ़कर आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज हो चुका है।

CPCB रिपोर्ट में दर्ज हुआ ऐतिहासिक बदलाव

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 आकलन रिपोर्ट ने गंगा की सेहत में आए बदलाव को औपचारिक मान्यता दे दी है। वर्ष 2018 में कन्नौज से वाराणसी तक गंगा का पूरा हिस्सा “प्राथमिकता-IV” प्रदूषित खंड घोषित था, लेकिन आज वही सतत प्रदूषित पट्टी समाप्त हो चुकी है। अब प्रदूषण केवल तीन छोटे हिस्सों — फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर, डालमऊ और मिर्जापुर डाउनस्ट्रीम से तारीघाट — तक सीमित रह गया है। इन्हें भी “प्राथमिकता-V” श्रेणी में रखा गया है, जो “अप्रदूषित” स्थिति से ठीक पहले की सबसे निम्न प्रदूषण श्रेणी मानी जाती है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के उपमहानिदेशक नलिन कुमार श्रीवास्तव ने बताया की CPCB की स्वतंत्र निगरानी के अनुसार उत्तर प्रदेश में गंगा की मुख्य धारा का अधिकांश भाग अब स्नान-योग्य BOD मानकों को पूरा कर रहा है। यह केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि दशकों बाद गंगा की जल गुणवत्ता में दर्ज हुआ वास्तविक और मापनीय सुधार है।

शहरों में बदल रही सीवर व्यवस्था की तस्वीर

वाराणसी से लेकर प्रयागराज, कानपुर, आगरा, मथुरा, वृंदावन, मुरादाबाद, भदोही, बिजनौर और शुक्लागंज तक उत्तर प्रदेश के 11 प्रमुख शहरों में सीवेज नेटवर्क और STP परियोजनाएँ युद्धस्तर पर संचालित हो रही हैं। वाराणसी के अस्सी-BHU में 55 MLD क्षमता वाला STP लगभग 18 लाख लोगों की सीवेज जरूरतों को संभाल रहा है, जबकि आगरा के 31 MLD और 35 MLD STP संयुक्त रूप से लगभग 25 लाख नागरिकों को राहत दे रहे हैं। जाजमऊ और मथुरा के CETP संचालन में हैं, वहीं उन्नाव के बंथर CETP का निर्माण तेजी से जारी है। यह केवल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण नहीं, बल्कि गंगा में बिना उपचार के गिरने वाले सीवर प्रवाह को रोकने की निर्णायक कार्रवाई है।

प्रयागराज बना “ग्रीन STP मॉडल” की मिसाल

नमामि गंगे चरण-II के तहत प्रयागराज में विकसित “ग्रीन STP मॉडल” देश के लिए नई मिसाल बन रहा है। संगम नगरी के चार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अब अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्वयं पैदा कर रहे हैं। 80 MLD नैनी STP प्रतिदिन 5,900 यूनिट बिजली सौर ऊर्जा और बायोगैस से उत्पन्न कर रहा है, जबकि 42 MLD नैनी STP का 1,000 kW सोलर प्लांट प्रतिदिन 3,850 यूनिट बिजली बना रहा है। झूंसी और फाफामऊ STP पूरी तरह सौर ऊर्जा आधारित संचालन की दिशा में अग्रसर हैं।

महाकुंभ 2025 में भी नहीं रुका संचालन

महाकुंभ 2025 के दौरान जब प्रयागराज में करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन से अपशिष्ट जल भार कई गुना बढ़ गया, तब भी ये संयंत्र निर्बाध रूप से चलते रहे। इससे यह सिद्ध हुआ कि विकेंद्रीकृत और ऊर्जा-सकारात्मक उपचार प्रणाली भविष्य के शहरी भारत के लिए व्यवहारिक मॉडल बन सकती है।

अस्सी नाला पर तकनीकी हस्तक्षेप

वाराणसी के अस्सी नाला संगम क्षेत्र में NMCG ने “एडवांस्ड ऑक्सिडेशन टेक्नोलॉजी” तैनात कर प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी हस्तक्षेप किया है। यह तकनीक सीधे डिस्चार्ज प्वाइंट पर अतिरिक्त अपशिष्ट जल का उपचार करती है, जिससे बिना उपचार वाला सीवर गंगा में प्रवेश नहीं कर पाता।

प्रदूषण के सबसे संवेदनशील मोर्चे पर निगरानी

कम समय में स्थापित होने वाली यह प्रणाली उन स्थानों पर लगाई गई है जहाँ ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक रहा है। जब तक स्थायी सीवरेज नेटवर्क पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता, तब तक यह तकनीक गंगा संरक्षण की अग्रिम पंक्ति में तैनात रहेगी।

अब लक्ष्य: शून्य प्रदूषण की ओर

फर्रुखाबाद-पुराना राजापुर, डालमऊ और मिर्जापुर-तारीघाट जैसे शेष प्रदूषित हिस्सों की पहचान कर उन्हें सक्रिय परियोजना पाइपलाइन में शामिल कर लिया गया है। आने वाले चरणों में इन क्षेत्रों पर केंद्रित निवेश, तेज निर्माण और सघन निगरानी अभियान चलाया जाएगा।

गंगा किनारे बह रहा है परिवर्तन

उत्तर प्रदेश में गंगा की यह बदलती तस्वीर बताती है कि जब नीति निर्माण, वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति एक दिशा में काम करें, तो दशकों पुरानी पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी बदली जा सकती हैं। गंगा के किनारे अब केवल आस्था नहीं बह रही — परिवर्तन भी बह रहा है।