
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की आहट जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे देश के सबसे बड़े सूबे की राजनीतिक हलचल और तेज होती जा रही है। लखनऊ के सियासी गलियारों से लेकर दिल्ली के सत्ता केंद्रों तक, उत्तर प्रदेश को लेकर नई रणनीतियों का ताना-बाना बुना जाने लगा है। इस पूरी कवायद में सबसे प्रमुख और केंद्रीय चेहरा बनकर उभरे हैं देश के गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह। उत्तर प्रदेश में अमित शाह की लगातार बढ़ती मौजूदगी और उनके ताबड़तोड़ दौरे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि भाजपा इस बार किसी भी स्तर पर कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। वह केवल मंचों से चुनावी भाषण नहीं दे रहे हैं, बल्कि जमीनी स्तर पर जाकर पार्टी के भीतर उस माइक्रो मैनेजमेंट को अंजाम दे रहे हैं, जिसके लिए उन्हें भारतीय राजनीति का चाणक्य माना जाता है। हालांकि, इस बार शाह के सामने चुनौतियां अतीत की तुलना में कहीं अधिक जटिल और आंतरिक रूप से गहरी हैं।
अमित शाह के इस बार के उत्तर प्रदेश अभियान के सामने सबसे बड़ी और तात्कालिक चुनौती विपक्षी दलों की घेराबंदी नहीं, बल्कि खुद उनकी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का गिरा हुआ मनोबल है। बीते कुछ समय में पार्टी के भीतर एक अजीब-सी खामोशी और दूरी देखी गई है। कई कर्मठ, पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं ने यह महसूस किया है कि सरकार और संगठन के शीर्ष स्तर पर उनकी लगातार अनदेखी की जा रही है। सत्ता के केंद्रीयकरण और नौकरशाही के कथित बढ़ते प्रभाव के चलते जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे थे। इसी उपेक्षा के परिणामस्वरूप, पार्टी के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों, रैलियों और स्थानीय स्तर की बैठकों से इन जमीनी कार्यकर्ताओं ने एक सोची-समझी दूरी बना ली थी। भाजपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी के लिए, जिसके चुनाव जीतने का पूरा दारोमदार उसके पन्ना प्रमुखों और बूथ कार्यकर्ताओं पर होता है, यह आंतरिक उदासीनता किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं थी।
कार्यकर्ताओं की इसी नाराजगी और बिखराव को भांपते हुए अमित शाह ने हाल ही में लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में सीधे कमान संभाली। हाल ही में दो दिवसीय दौरे के दौरान जब वह कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने मंच पर आए, तो उनके तेवर और शब्दों में एक अलग तरह की संवेदनशीलता और रणनीतिक दबाव साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने कार्यकर्ताओं के भीतर सुलग रहे असंतोष को शांत करने के लिए एक बेहद भावुक और सीधा संवाद स्थापित किया। शाह ने मंच से कहा कि कार्यकर्ता अपनी आपसी नाराजगी, मतभेदों और शिकायतों को लखनऊ की गोमती नदी में बहा दें और एक बार फिर एकजुट होकर प्रदेश में तीसरी बार भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने के संकल्प में जुट जाएं। शाह का यह बयान राजनीतिक पंडितों के बीच गहरी चर्चा का विषय बन गया, क्योंकि यह सीधे तौर पर स्वीकारोक्ति थी कि संगठन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है और कार्यकर्ताओं को मनाने की सख्त जरूरत है।
यह बयान अमित शाह के ही उस पुराने और चिरपरिचित राजसी दावे से बिल्कुल उलट नजर आता है, जिसमें उन्होंने बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार अंगद के पांव की तरह अडिग है, जिसे कोई भी विरोधी ताकत हिला नहीं सकती। एक तरफ सरकार को अंगद के पांव की तरह अजेय बताना और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं से अपनी नाराजगी गोमती में बहाने की भावुक अपील करना, शाह के दो अलग-अलग राजनीतिक संकटों और समय के बदलाव को दर्शाता है। अंगद के पांव वाला बयान जहां विपक्ष को मनोवैज्ञानिक रूप से पछाड़ने और मतदाताओं में पार्टी की मजबूती का अहसास कराने के लिए था, वहीं गोमती में नाराजगी बहाने का आह्वान आत्ममंथन और संगठन को बिखरने से बचाने की एक व्यावहारिक कोशिश है। यह विरोधाभास दिखाता है कि जब चुनावी जमीन खिसकने का डर हो या आंतरिक मोर्चे पर दरारें दिखने लगें, तो बड़े से बड़े रणनीतिकार को भी अपनी भाषा और तेवर बदलने पड़ते हैं।
कार्यकर्ताओं को साधने के इस प्रयास के साथ ही भाजपा की आगे की चुनावी रणनीति का खाका भी पूरी तरह तैयार कर लिया गया है। अमित शाह के इस दौरे से जो सबसे बड़ा संदेश निकला है, वह यह है कि पार्टी अब पूरी तरह से चुनावी मोड में आ चुकी है और उसकी रणनीति बहुआयामी होने वाली है। भाजपा की आगे की चुनावी रणनीति का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक सक्रियता है। शाह ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि आगामी चुनाव केवल सरकार के कामकाज या बड़े नेताओं के चेहरे के भरोसे नहीं जीते जा सकते, इसके लिए हर एक बूथ को सबसे मजबूत किला बनाना होगा। इसके तहत जहां कम, वहां हम की नीति अपनाई जा रही है, जिसका मतलब है कि जिन क्षेत्रों या बूथों पर पार्टी पिछले चुनावों में कमजोर रही थी, वहां विशेष ध्यान दिया जाएगा और नए मतदाताओं, विशेषकर युवाओं और महिलाओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएंगे।
इसके अतिरिक्त, भाजपा ने अपने पारंपरिक और सबसे मजबूत हथियार वैचारिक ध्रुवीकरण और हिंदुत्व को धार देना शुरू कर दिया है। इस चुनावी समर में भाजपा का सबसे बड़ा और मास्टरस्ट्रोक दांव समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी बनने जा रहा है। अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी है कि उत्तर प्रदेश में तीसरी बार भाजपा की सरकार बनते ही राज्य में समान नागरिक संहिता को लागू कर दिया जाएगा। यह घोषणा सीधे तौर पर विपक्ष के जातिगत गोलबंदी के फॉर्मूले को काटने के लिए की गई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और जातिगत जनगणना के दांव के मुकाबले भाजपा यूसीसी और राष्ट्रवाद का एक ऐसा नैरेटिव खड़ा करना चाहती है, जो हिंदू मतों को जातियों में बंटने से रोक सके और उन्हें एक बड़े वैचारिक मंच पर एकजुट कर सके।
इसके साथ ही, रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश सरकार के विकास कार्यों और कानून-व्यवस्था के रिकॉर्ड को जनता के सामने प्रमुखता से रखा जाएगा। योगी आदित्यनाथ सरकार की सख्त प्रशासक वाली छवि और अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को चुनाव प्रचार के केंद्र में रखा जाएगा। अमित शाह का मानना है कि विकास और बेहतर कानून-व्यवस्था के साथ जब संगठन की जमीनी ताकत और हिंदुत्व का वैचारिक पुट मिलेगा, तो विपक्ष के लिए भाजपा के इस चक्रव्यूह को भेदना लगभग असंभव हो जाएगा। पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 313 से अधिक सीटों का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी निर्धारित किया है, जो संगठन के भीतर एक नया जोश भरने की कोशिश है, तो कार्यकर्ताओं की नाराजगी से बीजेपी आलाकमान बुरी तरह से हिला हुआ है, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।



