नियुक्ति व प्रवेश परीक्षाओं में गलत तरीके से मेरिट बनाना आरक्षण नियमावली के विरुद्ध

नियुक्ति व प्रवेश परीक्षाओं में गलत तरीके से मेरिट बनाना आरक्षण नियमावली के विरुद्ध।आरक्षण अयोग्य के चयन का रास्ता व गरीबी उन्मूलन का उपाय नहीं,प्रतिनिधित्व सुनिश्चितिकरण की व्यवस्था है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश उच्चत्तर शिक्षा सेवा आयोग द्वारा असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती विगत दिनों सम्पन्न की गई।म्यूजिक(तबला) में ओबीसी की मेरिट जनरल से अधिक है,जबकि हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत, फिज़िक्स, इतिहास,प्राचीन भारतीय इतिहास,भूगर्भ विज्ञान,दर्शनशास्त्र, सैन्य विज्ञान विषयों में यूआर,ओबीसी कटऑफ मार्क्स बराबर है और राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र इतिहास विषयों यूआर,ओबीसी,एससी का कटऑफ मार्क्स बराबर रखा गया।जो आरक्षण नीति के बिल्कुल प्रतिकूल है।


निषाद ने कहा कि जब मण्डल कमीशन के तहत ओबीसी को 27 प्रतिशत कोटा का निर्णय हुआ तो सामान्य वर्ग की जातियों ने कहा कि यह अयोग्य के चयन का रास्ता व प्रतिभा हनन का षड्यंत्र है।आरक्षण को बैसाखी बताते हुए पिछड़ों, दलितों पर तरह तरह की ओछी टिप्पणी कर गालियाँ दी गईं।उन्होंने कहा कि आरक्षण न तो अयोग्य के चयन का रास्ता है और न गरीबी उन्मूलन का उपाय,बल्कि प्रतिनिधित्व सुनिश्चितिकरण की संवैधानिक व्यवस्था है।अयोग्य का चयन जातिवाद,सुविधा शुल्क व डोनेशन से होता है।विगत कुछ वर्षों के यूपीएससी, यूपीपीएससी, जेएच पीएससी,एमपीपीएससी,यूपीएसएसएससी, यूपीएचईसी,यूपी अशासकीय प्राचार्य भर्ती,बेसिक शिक्षा भर्ती व विश्वविद्यालय, महाविद्यालय प्राध्यापक भर्ती परीक्षा के परिणाम को देख जय तो ओबीसी,एससी का कटऑफ सामान्य/अनारक्षित से अधिक जा रहा है।उन्होंने कहा कि साक्षात्कार में भेदभाव कर ओबीसी,एससी की प्रतिभाओं को बाहर किया जा रहा है।

निषाद ने उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा चयन आयोग के कटऑफ का उदाहरण देते हुए बताया कि राजनीति शास्त्र में समान्यवर्ग,ओबीसी,एससी का कटऑफ 125-125,अर्थशास्त्र का कटऑफ मार्क्स तीनों श्रेणियों का 115.79,समाजशास्त्र में 130.61,शिक्षाशास्त्र में तीनों वर्गों का कटऑफ 103.09 व इतिहास में यूआर,ओबीसी,इस का कटऑफ 148.94 रखा गया।हिंदी में यूआर,ओबीसी का कटऑफ मार्क्स 144.33,अंग्रेजी में 98.97,संस्कृत में 121.21,भौतिकी में 131.31,प्राचीन भारतीय इतिहास में 165.66,भूगोल में 141.41,सैन्यविज्ञान में 127.27 है।उन्होंने कहा कि ओबीसी,एससी का आईक्यू लेबल सामान्य वर्ग से अधिक हो सकता है,यदि समान परिवेश व समान शैक्षिक माहौल हो।सारी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी ओबीसी,एससी का कटऑफ मार्क्स व मेरिट ऊपर जा रही है।इन वर्गों के प्रतियोगियों को गलत तरीके अपनाए कर बाहर किया जा रहा है।


निषाद ने कहा कि पिछड़े वर्ग के लाल बुझक्कड़ लोग एक दूसरे को निपटाने के चक्कर में भविष्य की पीढ़ियों को ‘लटबहेर’ बना दिए हैं।आज के विद्वानों से कम पढ़े-लिखे पुरखे ही अच्छे थे जो लड़-भिड़ कर,केस-मुकदमा झेलकर,जेलों में सड़कर समाज में अपनी औलादों के लिए हिस्सेदारी सुनिश्चित कराया, विश्वविद्यालय की चौखट पर भेंज कर ‘लाट साहेब’ बनाया।लेकिन आज के ‘लाट साहेब’ लोग जमात को छोड़कर जातीय चूर में मदहोश हो गए हैं।राजनीतिक तौर पर पूरे समुदाय नहीं बल्कि अपनी जाति के नेता को मुख्यमंत्री से लेकर मुखिया/प्रधान बनते देख प्रसन्न हैं,एक नेता द्वारा दूसरे नेता द्वारा टीका-टीप्पणी करने से तुरंत भावनाएं आहत हो जाती हैं,सबके मोबाईल पर विडियो क्लिप दाना-दन चली जा रही है लेकिन नौकरी-पेशा में हिस्सेदारी कम होने पर किसी की भावनाएं आहत नहीं हो रही हैं। बल्कि जुबान में घीघी बंध जा रही है।इन्हें यह भी नहीं पता है कि जो फुटानी कर रहे हैं वह जातीय लड़ाई से नहीं बल्कि जमातीय लड़ाई से पाए धन से कर रहे हैं।उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य,भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह,अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद, ओमप्रकाश राजभर जैसे लोग जातीय व वर्गीय हित की बात कर निजस्वार्थ व परिवारवाद में अपना ज़मीर बेंच दिए हैं।इस तरह के नेताओं को गदहा पर बैठाकर घुमाइए या भीगा जुटा मारिये तो भी कोई गुनाह नहीं।क्योंकि ये काम के दुश्मन हैं।

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