“सच है लहूलुहान…”—यह सिर्फ एक भाव नहीं, बल्कि उस दौर की तस्वीर है जहाँ सच बोलना आसान नहीं और सच को स्वीकार करना उससे भी कठिन होता जा रहा है। जब सवालों पर खामोशी और असहमति पर दबाव हावी हो, तब घायल सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का विश्वास और लोकतांत्रिक संवेदना भी होती है। सवाल यही है—क्या सच की आवाज़ को दबाया जा सकता है…?
सच की राह कठिन हुई, झूठ सजे बाजार।
सच बोलो तो लोग दें, ताने बारंबार॥
सच है लहूलुहान अब, झूठ खड़ा सिरमौर।
सच के हिस्से दर्द है, झूठ बटोरे शोर॥
सच कहने की कीमतें, बढ़ती जाएँ आज।
झूठे चेहरों पर सजे, देखो कितने ताज॥
झूठ लिखे अखबार में, सच चुप बैठा आज।
शब्दों के बाजार में, बिकता झूठ समाज॥
सच की आवाज़ें थकीं, झूठ हुआ बलवान।
फिर भी सच की लौ जले, रखता जग की शान॥
झूठ भले ही जीतता, कुछ पल का संसार।
सच की नींव हिले नहीं, चाहे हो अंधकार॥
सच के पथ पर जो चले, काँटे मिलें हजार।
उनके दृढ़ विश्वास से, बदले यह संसार॥
चेहरे पर मुस्कान है, भीतर कितने घाव।
सच बोले उस सत्य के, कौन समझता भाव॥
सच को सूली मिल गई, झूठ हुआ आजाद।
फिर भी सच के साथ में, जीवित है संवाद॥
सत्ता, धन और स्वार्थ ने, बदले कितने रूप।
सच फिर भी सूरज बने, दे अंकुर को धूप॥
सच पर जितने वार हों, उतना बढ़े प्रकाश।
अंधियारे के बीच भी, जागे मन में आस॥
खून सना हो सत्य तो, मत करना इंकार।
सच की बूंदें लिख रहीं, आने वाला सार॥
सच घायल हो आज भी, हारा नहीं विचार।
समय गवाही दे यहीं, किसका था अधिकार॥
सच भले ही आज लहूलुहान दिखाई दे, लेकिन उसकी आवाज़ को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। सवाल पूछना, सच कहना और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना ही समाज को जीवंत बनाए रखता है। क्योंकि अंततः वक्त बदलता है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन सच अपनी जगह कायम रहता है।



