पिता नीम का पेड़…

हम कच्चे से हैं घड़े, पिता कुशल कुम्हार। 

ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

सिर पर छाया बन खड़े, बने नीम का पेड़।

 कड़वे लगते हैं मगर, जीवन की हैं मेड़॥ 

धूप भले कितनी पड़े, झेलें हर आघात।

 संतानों की राह में, बन जाते सौगात॥

 घर-आँगन की शान हैं, खुशियों के भंडार।

 ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

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पाई-पाई जोड़कर, करते दिन-भर काम। 

संतानों के हित लिए, भूलें अपना नाम॥

 अपने सपनों को रखे, देकर सदा विराम।

 बच्चों के उज्ज्वल भवित, करते रहे प्रणाम॥ 

पिता खड़े हर मोड़ पर, बनकर पहरेदार॥ 

ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

पापा ही अभिमान हैं, पापा ही संसार।

 पर्वत जैसे अडिग हैं, देते दृढ़ आधार॥ 

गिरने से पहले सदा, थामें अपनी बाँह। 

उनके कारण ही मिली, जीवन को हर राह॥

 उनके जैसा कौन है, इस जग में हितकार॥ 

ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

मन में सागर-सी व्यथा, मुख पर गहरी धीर। 

माँ-सा कोमल प्रेम है, किंतु अलग तस्वीर॥ 

दर्द छिपाकर हँस दिए, सहकर हर संताप। 

अपने हिस्से रख लिए, जीवन के अभिशाप॥ 

सपनों को साकार कर, करते बेड़ा पार। 

ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

पिता ऋणों की थाह को, पाया किसने जान।

 चुप हो आँसू पी गए, करके सब बलिदान॥ 

‘सौरभ’ उनके त्याग का, नहीं कहीं प्रतिदान।

 नीम सरीखे हैं पिता, धरती का वरदान॥ 

पिता हमारे साथ हों, क्या डर क्या मझधार॥ 

ठोक-पीटकर प्रेम से, देते सही आकार॥

रौनक, शोहरत, मान सब, इनसे ही पहचान।

 साहस, शक्ति, हौसला, पिता हमारी शान॥

—–डॉ. सत्यवान सौरभ

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