सत्ता का अभिमान…

सत्ता का अभिमान जो, चढ़ता सिर पर आज। जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

ऊँचे पद पर बैठकर, भूले अपनी रीत। मीठे वचन सभी गए, कड़वी होती प्रीत॥

जन-मन की आवाज़ का, क्यों न किया लिहाज़। जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

वोटों की खातिर झुके, करते थे सत्कार। जीत मिली तो भूल गए, जनता का उपकार॥

कुर्सी केवल साधन है, सेवा उसका राज।जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

कुर्सी आती-जायगी, रहता केवल नाम। जैसा होगा आचरण, वैसा होगा काम॥

अहंकार के पंख से, गिरता हर परवाज़।जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

सत्ता का वैभव सदा, रहता पल-दो-चार। सद्व्यवहार अमर रहे, पीढ़ी-पीढ़ी पार॥

प्रेम, विनय, सब हित बने, नेता का सरताज़।जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

‘सौरभ’ सेवा से बड़ा, जग में नहीं मुकाम। जन-मन जीते जो सदा, अमर रहे वह नाम॥

लोकतंत्र का मूल है, जनहित का आगाज़। जन-विश्वास ही ताज है, बाकी सब अंदाज़॥

—– डॉ. प्रियंका सौरभ

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