सोनम वांगचुक और सुर्खियों से आगे का सच!

सोनम वांगचुक और सुर्खियों से आगे का सच! मीडिया नैरेटिव बनाम जनसमर्थन: क्या किसी आंदोलन की वास्तविक ताकत कैमरों से तय होती है?

प्रियंका सौरभ
डॉ.प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका वास्तविक जनसमर्थन होता है। कैमरों की चमक, सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग सूची, यूट्यूब की लाखों व्यूज़ या टीवी चैनलों की लगातार बहसें किसी आंदोलन को चर्चा का विषय तो बना सकती हैं, लेकिन वे स्वयं जनमत का प्रमाण नहीं होतीं। इतिहास गवाह है कि अनेक ऐसे आंदोलन रहे जिन्हें मीडिया ने बहुत कम स्थान दिया, फिर भी वे समाज में व्यापक परिवर्तन का कारण बने। वहीं कुछ ऐसे आंदोलन भी रहे जो मीडिया में छाए रहे, लेकिन समाज में स्थायी आधार नहीं बना सके।

पिछले कुछ वर्षों में लद्दाख और वहां के पर्यावरण, संवैधानिक अधिकारों तथा स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई है। इस विमर्श में सोनम वांगचुक एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, हिमालयी पारिस्थितिकी, स्थानीय संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर रखा। देशभर में अनेक लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि उनकी राष्ट्रीय पहचान और स्थानीय जनसमर्थन के बीच पर्याप्त अंतर है।

यही प्रश्न आज लोकतांत्रिक विमर्श के केंद्र में है—क्या किसी व्यक्ति की राष्ट्रीय लोकप्रियता ही उसके स्थानीय जनाधार का प्रमाण है? या फिर किसी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके अपने समाज के विश्वास और भागीदारी से तय होती है?

हाल ही में लद्दाख के एक सामाजिक संगठन के पदाधिकारी से हुई बातचीत में यह मत सामने आया कि लद्दाख में सोनम वांगचुक के समर्थन में वैसी व्यापक जन-लहर नहीं दिखाई देती जैसी राष्ट्रीय मीडिया में प्रस्तुत की जाती है। यदि यह आकलन सही है, तो यह विचारणीय है कि राष्ट्रीय विमर्श और स्थानीय वास्तविकता के बीच इतना अंतर क्यों दिखाई देता है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी एक संगठन या व्यक्ति की राय को पूरे लद्दाख की सामूहिक राय मान लेने से भी बचा जाए। लोकतंत्र में समाज बहुआयामी होता है और किसी भी क्षेत्र में अनेक मत, अनेक समूह और अनेक दृष्टिकोण मौजूद रहते हैं।

आज मीडिया का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा। पहले समाचारों का चयन संपादकीय विवेक से होता था, अब एल्गोरिद्म, क्लिक, व्यूज़ और ट्रेंड भी यह तय करने लगे हैं कि कौन-सा मुद्दा अधिक दिखाई देगा। परिणामस्वरूप कई बार किसी व्यक्ति की छवि उसके वास्तविक सामाजिक प्रभाव से कहीं अधिक बड़ी दिखाई देने लगती है। दूसरी ओर, कई ऐसे स्थानीय मुद्दे जो वास्तव में जनता के जीवन से जुड़े होते हैं, राष्ट्रीय विमर्श से गायब रहते हैं।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण किया है, लेकिन इसके साथ ही उसने “नैरेटिव निर्माण” को भी नई गति दी है। कुछ मिनट का वीडियो, भावनात्मक अपील, प्रभावशाली संगीत और लगातार साझा किए जाने वाले संदेश किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं। किंतु लोकतंत्र केवल डिजिटल लोकप्रियता से नहीं चलता। लोकतंत्र का आधार वास्तविक समाज, वास्तविक नागरिक और वास्तविक जनभागीदारी है।

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आज अनेक यूट्यूब चैनल स्वयं को स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतिनिधि बताते हैं। उनमें से कई उत्कृष्ट कार्य भी कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो किसी वैचारिक, राजनीतिक या व्यावसायिक उद्देश्य से एकतरफा सामग्री प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में दर्शकों के सामने चुनौती यह होती है कि वे सूचना और प्रचार के बीच अंतर कैसे करें। यदि कोई चैनल केवल एक ही पक्ष को दिखाए और दूसरे पक्ष की उपेक्षा करे, तो वह पत्रकारिता के मूल उद्देश्य से भटक जाता है।

इसी प्रकार मुख्यधारा का मीडिया भी कई बार व्यक्तियों को मुद्दों से बड़ा बना देता है। परिणाम यह होता है कि पर्यावरण, स्थानीय प्रशासन, रोजगार, शिक्षा, पर्यटन और सीमावर्ती क्षेत्रों की समस्याओं जैसे गंभीर विषय पीछे छूट जाते हैं और चर्चा केवल किसी एक चेहरे तक सीमित रह जाती है। लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति स्वस्थ नहीं मानी जा सकती।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके नेता की लोकप्रियता पर निर्भर नहीं करती। यदि स्थानीय समाज सक्रिय रूप से उसके साथ नहीं जुड़ता, तो आंदोलन की गति सीमित हो सकती है। वहीं यदि जनता व्यापक रूप से उसके साथ खड़ी हो, तो मीडिया चाहे जितना मौन रहे, आंदोलन अपनी दिशा स्वयं बना लेता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अनेक सामाजिक आंदोलनों तक यही अनुभव सामने आया है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन केवल उसके चर्चित चेहरे के आधार पर न करे। उसे यह भी देखना चाहिए कि उस आंदोलन से स्थानीय लोग कितनी संख्या में जुड़े हैं, उनके जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है और उनके भीतर उसके प्रति कितना विश्वास है। इसी प्रकार किसी आंदोलन के आलोचकों को भी तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए, न कि केवल भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर।

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना समर्थन का। यदि कोई व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, तो उसे अपनी बात रखने का अधिकार है। उसी प्रकार यदि समाज का कोई वर्ग उसकी बात से असहमत है, तो उसे भी अपनी राय रखने का समान अधिकार है। लोकतांत्रिक परंपरा का अर्थ ही यही है कि विभिन्न मत सम्मानपूर्वक सामने आएँ और जनता स्वयं निर्णय करे।

लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में विकास, पर्यावरण, सुरक्षा और स्थानीय पहचान के प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन विषयों पर गंभीर और तथ्याधारित चर्चा होनी चाहिए। यदि पूरा विमर्श केवल किसी एक व्यक्ति के समर्थन या विरोध तक सीमित हो जाए, तो वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। इससे न समाज का भला होता है और न ही लोकतंत्र का।

आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर किसी भी विषय को लेकर कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय अभियान चलाया जा सकता है। हैशटैग ट्रेंड होने लगते हैं, वीडियो वायरल हो जाते हैं और यह भ्रम पैदा हो सकता है कि पूरा देश किसी एक मत पर सहमत है। किंतु वास्तविक जनमत का आकलन केवल डिजिटल गतिविधियों से नहीं किया जा सकता। गाँव, कस्बे, स्थानीय संस्थाएँ, नागरिक संगठन और जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी कहीं अधिक महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से प्रश्न पूछना है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि वह आंदोलनों और उनके नेताओं से भी प्रश्न पूछे। यदि पत्रकारिता केवल किसी एक पक्ष की प्रवक्ता बन जाए, तो उसकी विश्वसनीयता कम हो जाती है। लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी पूँजी उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता है।

आज आवश्यकता संतुलित विमर्श की है। किसी भी व्यक्ति को देवता बनाना भी उचित नहीं और बिना पर्याप्त तथ्यों के उसे पूरी तरह खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। व्यक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण वे मुद्दे हैं जिनके लिए वे आवाज़ उठाते हैं। यदि मुद्दे सही हैं, तो उन पर चर्चा होनी चाहिए; यदि तर्क कमजोर हैं, तो उनकी आलोचना भी तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता करती है। मीडिया केवल सूचना का माध्यम हो सकता है, निर्णय का स्थानापन्न नहीं। सोशल मीडिया किसी व्यक्ति को प्रसिद्ध बना सकता है, लेकिन स्थायी सम्मान वही प्राप्त करता है जिसे समाज का विश्वास मिलता है। इसलिए किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन कैमरों की संख्या, व्यूज़, लाइक या ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक जनाधार, स्थानीय सहभागिता, लोकतांत्रिक स्वीकार्यता और समाज पर पड़े प्रभाव से किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र का भविष्य भी इसी संतुलन में सुरक्षित है—जहाँ मीडिया तथ्य प्रस्तुत करे, समाज विवेक से निर्णय ले और किसी भी व्यक्ति या आंदोलन का मूल्यांकन प्रचार नहीं, बल्कि प्रमाण और जनविश्वास के आधार पर किया जाए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान है और यही पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व भी।

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