जीवन का सबसे बड़ा भरोसा


जीवन की राह हमेशा आसान नहीं होती। कभी परिस्थितियां साथ छोड़ देती हैं, कभी अपने दूर हो जाते हैं और कभी मुश्किलें इंसान को भीतर तक हिला देती हैं। ऐसे समय में सबसे बड़ा सहारा किसी धन-दौलत का नहीं, बल्कि उस भरोसे का होता है जो हमें गिरने से पहले संभाल ले। जीवन का सबसे बड़ा भरोसा वही रिश्ता है, जहां शब्दों से ज्यादा साथ मायने रखता है और मुश्किल वक्त में बिना कहे कोई हाथ थाम लेता है।देव की उंगली थामे चलना ही तो जीवन का सबसे बड़ा भरोसा है।

राजू यादव
राजू यादव

एक नन्हा बच्चा जब पहली बार चलना सीखता है, तो उसके छोटे-छोटे कदमों में पूरा संसार समाया होता है। वह लड़खड़ाता है, गिरता है, फिर उठता है। लेकिन उसके भीतर डर नहीं होता, क्योंकि उसकी नन्ही उंगली किसी मजबूत हाथ को थामे होती है—पिता की उंगली। उसी उंगली को पकड़कर वह घर की चौखट से बाहर निकलता है। दुनिया को देखता है, रास्तों को पहचानता है, गिरने का डर छोड़कर चलना सीखता है। उसे भरोसा होता है कि वह गिर भी गया, तो पिता संभाल लेंगे।

लेकिन एक सवाल मन में ठहरता है—जब वही बच्चा बड़ा होकर जीवन के ऊबड़-खाबड़, पथरीले रास्तों पर चलता है, तब क्या उसे किसी उंगली की जरूरत नहीं होती? जरूरत होती है। बहुत ज्यादा होती है। बस उस समय वह उंगली दिखाई नहीं देती।

समाज की उंगली और भरोसे का रिश्ता

बचपन में पिता की उंगली थामने वाला मनुष्य बड़ा होकर अपने समाज की उंगली थामता है। उसे भरोसा होता है कि मुश्किल समय में कोई उसके साथ खड़ा होगा, उसके दुख को समझेगा, उसके गिरने पर उसे उठाएगा।

लेकिन समाज भी यूं ही नहीं बना रहता। समाज को भी किसी आधार की जरूरत होती है। वह आधार है—सभ्यता, संस्कृति और उसके जीवन-मूल्य। सभ्यता अपनी जड़ों से जुड़कर ही मजबूत होती है। और सनातन सभ्यता की सबसे गहरी जड़ों में एक ऐसा विश्वास है, जो हजारों वर्षों से मनुष्य को कठिन समय में सहारा देता आया है—ईश्वर पर विश्वास। वह अदृश्य उंगली, जिसे दिखाई नहीं देती, लेकिन जिसका स्पर्श मनुष्य अपने भीतर महसूस करता है।

जब विष सामने आया, तो सबने महादेव को पुकारा

समुद्र मंथन में देव और दानव अपने-अपने हिस्से के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन जब हलाहल विष निकला, तो सबके सामने संकट खड़ा हो गया। उस क्षण न देव याद रहे, न दानव। न जीत की इच्छा रही, न हार का भय। सभी की दृष्टि एक ही ओर उठी—महादेव की ओर क्योंकि जब संकट बहुत बड़ा हो जाता है, तब मनुष्य अपने अहंकार से ऊपर उठकर उस शक्ति को पुकारता है, जिस पर उसे पूर्ण विश्वास होता है।

महादेव आए। उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। और संसार निश्चिंत हो गया। शायद यही पिता होने का सबसे बड़ा अर्थ भी है। पिता वह है, जो अपने बच्चों के हिस्से का विष स्वयं पी लेना चाहता है। बच्चे को दर्द न मिले, इसके लिए जो स्वयं दर्द सह ले—वही पिता है। इसीलिए सनातन चेतना में महादेव केवल देव नहीं हैं, वे पिता जैसे भरोसे का नाम भी हैं।

राम को भी चाहिए थी वह अदृश्य उंगली

भगवान श्रीराम मर्यादा के प्रतीक थे। शक्ति थी, साहस था, सेना थी, लक्ष्य स्पष्ट था। सामने समुद्र था और उसके पार एक विशाल चुनौती। लेकिन श्रीराम मानव रूप में थे। और मनुष्य होने का अर्थ है—संशय से गुजरना, प्रकृति के सामने विनम्र होना और आवश्यकता पड़ने पर किसी बड़े सहारे की तलाश करना। समुद्र के तट पर श्रीराम ने भगवान शिव की आराधना की। रामेश्वर की स्थापना इसी भाव की स्मृति बन गई कि महान से महान मनुष्य भी अपने से बड़ी शक्ति के सामने सिर झुकाता है। फिर वही राम आगे बढ़े। वानर-भालुओं की सेना साथ थी। विश्वास साथ था। आस्था साथ थी। और जब मनुष्य की शक्ति के साथ विश्वास जुड़ जाता है, तो असम्भव दिखाई देने वाले रास्ते भी खुलने लगते हैं।

क्योंकि रास्ता केवल पैरों से नहीं बनता, विश्वास से भी बनता है।

आज भी मनुष्य को उस उंगली की जरूरत है

आज का मनुष्य पहले से ज्यादा शिक्षित है, तकनीक से जुड़ा है, दुनिया उसकी मुट्ठी में है। उसके पास साधन हैं, सुविधाएं हैं, सूचनाएं हैं।फिर भी भीतर एक सवाल अक्सर बना रहता है—क्या मैं सही रास्ते पर हूं?
क्या मेरा निर्णय सही है?
क्या मैं सफल हो पाऊंगा?
अगर असफल हो गया तो कौन संभालेगा?

यही संशय मनुष्य को भीतर से कमजोर करता है। कई बार हमारे पास रास्ता होता है, लेकिन चलने का साहस नहीं होता। कई बार मंजिल सामने होती है, लेकिन मन डरता है। और कई बार सबकुछ होने के बावजूद भीतर एक खालीपन रहता है। ऐसे समय में आस्था मनुष्य को संभालती है। आस्था समस्या को हमेशा समाप्त नहीं करती, लेकिन समस्या से लड़ने का साहस जरूर देती है।

देव की उंगली थामना भागना नहीं, भरोसा करना है

शिव की उंगली थामने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने कर्म छोड़ दे और सबकुछ भगवान पर छोड़ दे। बल्कि इसका अर्थ है—कर्म करते हुए भय को छोड़ देना। सही रास्ते पर चलते हुए परिणाम की चिंता कम करना। गिरने पर फिर उठने का विश्वास रखना। और यह मानना कि जब नीयत साफ हो और प्रयास सच्चा हो, तो कोई अदृश्य शक्ति भीतर से हमें संभाल रही है।

महादेव हमें यह भी सिखाते हैं कि जीवन में विष आएगा। हर किसी के हिस्से में आएगा। लेकिन विष देखकर जीवन छोड़ देना समाधान नहीं। उसे पहचानना, उसे रोकना और उसे अपने भीतर की शक्ति में बदलना ही जीवन की साधना है।

कभी पिता की उंगली, कभी समाज का हाथ और कभी महादेव का भरोसा

जीवन की यात्रा में हम अकेले नहीं होते। बचपन में पिता की उंगली मिलती है। यौवन में परिवार और समाज का साथ मिलता है। और जब संसार के सारे सहारे छोटे पड़ने लगते हैं, तब मनुष्य भीतर की उस शक्ति की ओर देखता है जिसे वह ईश्वर, महादेव या अपनी आस्था के नाम से पुकारता है। शायद यही जीवन का सबसे खूबसूरत सत्य है— हमें हर उम्र में किसी न किसी उंगली की जरूरत होती है। बस उम्र के साथ हाथ बदल जाते हैं। और कभी-कभी वह हाथ दिखाई भी नहीं देता।

फिर भी भरोसा बना रहता है— “महादेव हैं… वे देख रहे हैं।” तो चलिए, जीवन के इस कठिन रास्ते पर कर्म करते हुए, अपने भीतर विश्वास जगाते हुए उस अदृश्य उंगली को थाम लें। क्योंकि जब रास्ता कठिन हो, परिस्थितियां विपरीत हों और मन में संशय उठे, तब एक विश्वास बहुत कुछ बदल सकता है— “जिसका हाथ महादेव थाम लें, उसे रास्तों से डरने की जरूरत नहीं।”

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