
मनुष्य हजारों वर्ष से समाज बनाकर चल रहा है। इसीलिए मनुष्य को सामाजिक प्राणी भी कहा जाता है। समाज का निर्माण 100-200 साल पुरानी घटना नहीं है। मनुष्य ने समाज रचा। समाज के सदस्यों ने अपने लिए आचार संहिता बनाई। प्राचीन काल में स्वयं अपनी गढ़ी आचार संहिता को लेकर उसने समाज का संचालन किया। सामाजिक अनुबंध सिद्धांत के जन्मदाताओं में हॉब्स का नाम बहुत पुराना है। उन्होंने लिखा है कि प्रारंभ में व्यवस्था अराजक थी। उन्होंने इसे प्रकृति की स्थिति माना। अनुमान है-उन्होंने उसी अराजक व्यवस्था से मुक्त होने के लिए एक सामान्य शपथपत्र या एफिडेविट दोहराया होगा। हॉब्स के ग्रंथ ‘लेवियाथन‘ में शपथपत्र में लिखा गया है, ”मैं अपने ऊपर शासन करने का अधिकार इस एक मनुष्य या मनुष्यों की इस सभा को देता हूँ और इसे अधिकृत करता हूँ, इस शर्त पर कि तुम भी अपने ऊपर शासन करने का अधिकार इसी मनुष्य या मनुष्यों की इस सभा को अर्पित करो।
इसके सभी कार्यों को इसी रूप में स्वीकार करो।” समाज के जन्म और विकास का अध्ययन करने वाले अधिकांश विद्वानों ने समाज के जन्म के संदर्भ में लगभग यही विचार व्यक्त किए हैं। उत्तर वैदिक काल में कथा है कि समाज की दशा अराजक हो गई थी। अराजकता से पीड़ित लोग मनु के पास गए। उन्होंने मनु से शासक हो जाने की प्रार्थना की। मनु ने इंकार किया। इस काम में एकत्रित सभी लोगों ने प्रस्तावित शासक/राजा को खेती की उपज का एक भाग देते रहने और आज्ञा मानते रहने का आश्वासन दिया। मनु शासक बनने को तैयार हो गए।
समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखने का काम नेशन स्टेट का होता है। शासन व्यवस्था के संचालन में सबसे खास बात है दण्ड। दण्ड देने की व्यवस्था के चलते अपराध घटते बढ़ते रहे। देश काल के अनुसार दण्ड का स्वरूप भिन्न भिन्न तरह का था। गुप्त शासकों के शासन में उच्च कोटि की प्रशासनिक व्यवस्था थी। उस समय भारतीय दण्ड व्यवस्था के कानून भी सरल और उदार थे। अपराधों की गुणता के आधार पर दण्ड दिया जाता था। प्राण दण्ड नहीं दिया जाता था। चीनी यात्री फाह्यान ने यहां के शासन की प्रशंसा की है। भिन्न भिन्न राजाओं, तानाशाहों, बादशाहों ने अपने अपने ढंग से दण्ड व्यवस्था को लागू करने का उपक्रम किया है। दण्ड कई प्रकार के होते हैं। लेकिन प्राणदण्ड हमेशा ही बहस का मुद्दा रहा है। प्राण प्रकृति का उपहार हैं। शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए शासक अर्थदण्ड, कारागार जैसे दण्ड देते रहे हैं। भारत के राष्ट्रजीवन में प्राणदण्ड को अच्छा नहीं माना जाता। प्राणदण्ड वैसे भी बहस का विषय है। एक पक्ष चाहता है कि प्राणदण्ड न दिया जाए। दूसरा पक्ष आतंकवादी घटनाओं जैसे अपराधों में प्राणदण्ड देने को पक्षधर है। लेकिन मनुष्य का जीवन प्रकृति का असाधारण उपहार है।
दुनिया के 112 देश अपने यहां प्राणदण्ड की व्यवस्था खत्म कर चुके हैं। जान पड़ता है कि इसी के समानांतर सऊदी अरब, कुवैत, कतर आदि देशों में प्राणदण्ड की घटनाएं बढ़ रही हैं। भारत की स्थिति अलग है। यहाँ संविधान (अनुच्छेद 21) में साफ साफ कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को विधिक कार्यवाही के बिना प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। जहां भारत में दण्डात्मक कार्यवाही के प्रयोग में अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती है, वहीं पिछले सप्ताह सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को बिना किसी गहन न्यायायिक विचारण के ही मृत्यदण्ड दे दिया गया। इसे फांसी या मृत्युदण्ड कहना समझ में नहीं आता। यह सीधे राज्य प्रायोजित हत्या है। फांसी दी गई। उनके घर वालों को भी सूचित नहीं किया गया। किसी भी स्तर पर उसका अपराध नहीं बताया गया। दोनों बांग्लादेशी थे और रोजगार के सिलसिले में सऊदी अरब गए थे। नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को मक्का की एक मस्जिद में ‘गंभीर अनैतिक कृत्य‘ का दोषी बताया था। यह सजा इस्लामी शरिया कानून के तहत न्यायधीश के विवेकाधिकार (ताजीर) से दी गई। इस घटना की पहले से कोई सूचना न मिलने के कारण बांग्लादेश सरकार ने सऊदी अरब से आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है।
अपराध की गुरुता के अनुसार ही दण्ड दिये जाते हैं। लेकिन सऊदी अरब, बहरीन, कतर आदि में अपराध की गुरुता पर सम्यक विचार नहीं होता। ऐसे देशों में इस्लामिक कानून-शरिया के अनुसार किसी भी व्यक्ति का जीवन छीन लिया जाता है। हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में ईश निन्दा कानून है। इस्लामिक शरीया में अल्लाह और उसके पैगम्बर व कुरान की कथित निन्दा पर प्राणदण्ड का प्राविधान है। पाकिस्तान में कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति पर ईश निन्दा का आरोप लगाता है। न्यायायिक विचारण होता है और उसे मृत्युदण्ड दे दिया जाता है। बांग्लादेशी नागरिकों के प्राणदण्ड घोषित करने और उसे क्रियान्वित करने में अनावश्यक रूप से जल्दबाजी की गई है। अंधविश्वास को ही राजधर्म मानना और इसी आधार पर अपने ही नागरिकों को मारते जाना मानवता के प्रति अपराध है। विश्व स्तब्ध है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ऐसे प्राणदण्ड व्यवस्था को लेकर असहाय दिखाई पड़ती हैं। यह विषय गंभीर है। इस पर संयुक्त राष्ट्र सहित सभी मंचों पर विमर्श करना चाहिए। जीवन का अधिकार मौलिक है। यह मनुष्य प्रदत्त नहीं है। इस पर बहस की गुंजाइश है। सवाल उठते हैं कि व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की तरह राष्ट्र राज्य के भी अधिकार क्यों नहीं हो सकते। कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकार की आड़ में राष्ट्र राज्य के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन सकता है। तब राष्ट्र राज्य भी व्यक्ति की तरह अपनी आत्मरक्षा के लिए यथावश्यक कार्रवाई करेगा। सभी राष्ट¨ंª को ऐसे खतरनाक मौकों पर कार्रवाई करने के लिए स्थापित कठोर विधि की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसी विधि पारदर्शी हो। आरोपी को अपना स्पष्टीकरण देने के लिए पर्याप्त अवसर देती हो। दुख इस बात का है कि सऊदी अरब के ताजे मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।



