
लखनऊ। कांग्रेस की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसे चुनाव हारने से ज्यादा परेशानी अपनी हार की जिम्मेदारी स्वीकार करने में होती है। नतीजे प्रतिकूल आए नहीं कि कभी ईवीएम कठघरे में, कभी चुनाव आयोग निशाने पर और कभी मतदाता सूची पर सवाल। लेकिन जब बैलेट पेपर से हुए चुनावों में भी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कांग्रेस की समस्या मशीन है या उसकी अपनी राजनीतिक जमीन खिसक रही है? चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव ने इसी सवाल को कांग्रेस के सामने खड़ा कर दिया है। खासकर कर्नाटक में, जहां उसकी अपनी सरकार है, भाजपा-जद(एस) गठबंधन का चारों सीटें जीतना पार्टी के लिए महज चुनावी झटका नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी है। सत्ता हाथ में होने के बावजूद यदि पार्टी शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का भरोसा नहीं जीत पा रही, तो उसे विपक्ष पर हमला करने से पहले अपने घर की हालत देखनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैलेट पेपर से हुए चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर तंज कसते हुए पूछा कि पार्टी ने आखिर कितनी सीटें जीतीं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने पलटवार करते हुए वाराणसी में भाजपा की हार और नागपुर में कांग्रेस की जीत का हवाला दिया। उनका तर्क था कि भाजपा को भी अपने राजनीतिक गढ़ों में मिली हार पर आत्ममंथन करना चाहिए। बात गलत नहीं है। भाजपा भी चुनाव हारती है तो उसे जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती। लेकिन कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि दूसरे की हार गिनाने से अपनी हार का हिसाब खत्म नहीं होता। वाराणसी में भाजपा की पराजय कांग्रेस की जीत नहीं है और नागपुर का परिणाम कर्नाटक की चारों सीटों पर मिली हार का जवाब नहीं बन सकता। राजनीति में प्रतिवाद करना आसान है, अपने संगठन की नाकामी स्वीकार करना कठिन।
नागपुर में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराया। वंजारी को 67,231 वोट मिले, जबकि कोहले को 63,960 मत प्राप्त हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय वाले शहर में कांग्रेस की इस जीत ने भाजपा के लिए भी असहज सवाल खड़े किए। मगर कांग्रेस को एक सीट की सफलता को अपनी वापसी का प्रमाण मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। एक निर्वाचन क्षेत्र में जीत संगठन की ताकत दिखा सकती है, लेकिन व्यापक चुनावी कमजोरी पर पर्दा नहीं डाल सकती। बिहार में भी कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उसके सहयोगी दलों को सफलता मिली, लेकिन कांग्रेस अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर सकी। गठबंधन का हिस्सा होना और अपने दम पर मतदाताओं का भरोसा जीतना अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस की परेशानी यही है कि वह सहयोगियों की जीत से राजनीतिक लाभ तो चाहती है, लेकिन अपने संगठन की कमजोरियों पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाती।
कर्नाटक का नतीजा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यहां कांग्रेस सरकार होने के बावजूद चारों सीटें भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन ने जीत लीं। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या उम्मीदवारों का चयन कमजोर था? क्या स्थानीय संगठन मतदाताओं तक पहुंचने में नाकाम रहा? क्या सरकार के कामकाज को लेकर शिक्षित वर्ग में असंतोष है? इन सवालों का जवाब पार्टी को जमीनी स्तर पर तलाशना होगा। सत्ता में होने का अर्थ यह नहीं कि मतदाता हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही मतदान करेंगे। यदि शिक्षक और स्नातक जैसे मतदाता भी पार्टी से दूरी बनाते हैं, तो इसे विरोधियों की साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह उस राजनीतिक आत्मविश्वास के लिए खतरे की घंटी है, जिसके सहारे कांग्रेस कर्नाटक में अपनी सरकार को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है।
इन चुनावों को लोकसभा या विधानसभा चुनावों के बराबर मानना भी उचित नहीं होगा। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं की संख्या सीमित होती है और स्थानीय मुद्दों का प्रभाव अधिक रहता है। फिर भी, इन नतीजों को मामूली बताकर किनारे नहीं किया जा सकता। शिक्षक अपने सामाजिक दायरे में जनमत तैयार करते हैं, जबकि स्नातक मतदाता शिक्षा, रोजगार, महंगाई और शासन जैसे सवालों पर दलों को परखते हैं। यदि कांग्रेस इन वर्गों के बीच प्रभाव खो रही है, तो उसे यह देखना चाहिए कि उसके राजनीतिक संदेश में कमी है या संगठन में। चुनाव केवल नारों से नहीं जीते जाते। मतदाता को यह भरोसा चाहिए कि उसकी समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने की क्षमता किस दल में है। ईवीएम पर कांग्रेस की आपत्तियों को भी इसी कसौटी पर परखना चाहिए।
चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। जहां गड़बड़ी के ठोस प्रमाण हों, वहां जांच होनी चाहिए। लेकिन हर हार के बाद व्यवस्था को दोष देना राजनीतिक जिम्मेदारी से बचने का तरीका नहीं बनना चाहिए। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम की विश्वसनीयता से संबंधित याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए बैलेट पेपर की व्यवस्था में लौटने की मांग स्वीकार नहीं की थी। इसका अर्थ यह नहीं कि चुनावी प्रक्रिया पर कभी सवाल नहीं उठाए जा सकते। इसका अर्थ यह है कि गंभीर आरोपों के लिए गंभीर प्रमाण भी चाहिए। केवल संदेह को बार-बार दोहराने से वह तथ्य नहीं बन जाता।
बैलेट पेपर से हुए चुनावों में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन उसके राजनीतिक तर्कों को असहज जरूर करता है। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि इन नतीजों से ईवीएम पर उठाए गए हर सवाल का स्वतः खंडन हो गया। असली सबक इससे कहीं अधिक सीधा है। चुनावी सफलता किसी मशीन या मतपत्र की मोहताज नहीं होती; वह संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय परिस्थितियों और मतदाताओं के भरोसे पर निर्भर करती है। कांग्रेस यदि बैलेट पेपर को अपनी समस्याओं का समाधान मान रही थी, तो इन परिणामों ने बता दिया कि मतदान का तरीका बदलने भर से राजनीतिक जमीन वापस नहीं मिलती। भाजपा को भी इन नतीजों से अजेय होने का भ्रम नहीं पालना चाहिए। वाराणसी में सपा की जीत और नागपुर में कांग्रेस की सफलता बताती है कि मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक गढ़ों में भी मुकाबला बदल सकता है। मगर कांग्रेस को यह समझना होगा कि भाजपा की कमजोरी अपने आप उसकी ताकत नहीं बन जाती।
विपक्ष बनने के लिए सरकार की आलोचना पर्याप्त नहीं है; जनता को बेहतर विकल्प भी देना पड़ता है। बेरोजगारी और महंगाई पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन इनसे निपटने की ठोस नीति पेश करना उससे भी ज्यादा जरूरी है। कांग्रेस के सामने अब दो रास्ते हैं। वह हर हार के बाद नए आरोपों की ढाल तलाशती रहे या संगठन, नेतृत्व और नीतियों की कमजोरियों पर ईमानदारी से काम करे। पहला रास्ता आसान है, लेकिन राजनीतिक रूप से खोखला। दूसरा कठिन है, मगर वापसी की संभावना उसी में है। बैलेट पेपर हो या ईवीएम, मतदाता अंततः अपने अनुभव और भरोसे के आधार पर फैसला करता है। कांग्रेस को अब यह तय करना होगा कि वह चुनाव जीतने की तैयारी करेगी या हार के बाद सफाई देने की। क्योंकि जनता को बहाने नहीं, भरोसेमंद विकल्प चाहिए और भरोसा बयानबाजी से नहीं, जमीन पर किए गए काम से बनता है।



