Monday, April 27, 2026
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भारतीय जीवनशैली अपनाएं पर्यावरण बचायें

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भारत की पर्यावरणीय समस्याओं में विभिन्न प्राकृतिक खतरे, विशेष रूप से चक्रवात और वार्षिक मानसून बाढ़, जनसंख्या वृद्धि, बढ़ती हुई व्यक्तिगत खपत, औद्योगीकरण, ढांचागत विकास, घटिया कृषि पद्धतियां और संसाधनों का असमान वितरण हैं और इनके कारण भारत के प्राकृतिक वातावरण में अत्यधिक मानवीय परिवर्तन हो रहा है। एक अनुमान के अनुसार खेती योग्य भूमि का 60% भूमि कटाव, जलभराव और लवणता से ग्रस्त है। यह भी अनुमान है कि मिट्टी की ऊपरी परत में से प्रतिवर्ष 4.7 से 12 अरब टन मिट्टी कटाव के कारण खो रही है। 1947 से 2002 के बीच, पानी की औसत वार्षिक उपलब्धता प्रति व्यक्ति 70% कम होकर 1822 घन मीटर रह गयी है तथा भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश में एक समस्या का रूप ले चुका है। भारत में वन क्षेत्र इसके भौगोलिक क्षेत्र का 18.34% (637,000 वर्ग किमी) है। देश भर के वनों के लगभग आधे मध्य प्रदेश (20.7%) और पूर्वोत्तर के सात प्रदेशों (25.7%) में पाए जाते हैं; इनमें से पूर्वोत्तर राज्यों के वन तेजी से नष्ट हो रहे हैं। वनों की कटाई ईंधन के लिए लकड़ी और कृषि भूमि के विस्तार के लिए हो रही है। यह प्रचलन औद्योगिक और मोटर वाहन प्रदूषण के साथ मिल कर वातावरण का तापमान बढ़ा देता है जिसकी वजह से वर्षण का स्वरुप बदल जाता है और अकाल की आवृत्ति बढ़ जाती है।


पर्यावरण की रक्षा के लिए जरूरी है मानव और प्रकृति के बीच संतुलन,पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनाएं भारतीय जीवनशैली।भारतीय जीवनशैली का अर्थ प्रकृति के साथ जीवनयापन है। प्रकृति को मानव के लिए ईश्वर का सर्वोत्तम वरदान कहा गया है। भारतीय जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण पर अधिक ज़ोर देती है। सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं।मानव और प्रकृति के बीच संतुलन का आधार समरसता है जो मानव और प्रकृति को आपस में जोड़ती है।

भारत में पर्यावरण की कई समस्या है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कचरा, और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण भारत के लिए चुनौतियाँ हैं। पर्यावरण की समस्या की परिस्थिति 1947 से 1995 तक बहुत ही खराब थी। 1995 से 2010 के बीच विश्व बैंक के विशेषज्ञों के अध्ययन के अनुसार, अपने पर्यावरण के मुद्दों को संबोधित करने और अपने पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने में भारत दुनिया में सबसे तेजी से प्रगति कर रहा है। फिर भी, भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के स्तर तक आने में इसी तरह के पर्यावरण की गुणवत्ता तक पहुँचने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है। भारत के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर है। पर्यावरण की समस्या का, बीमारी, स्वास्थ्य के मुद्दों और भारत के लिए लंबे समय तक आजीविका पर प्रभाव का मुख्य कारण हैं।

भारतीय जीवनशैली प्रकृति और मानव के मध्य आश्रय और आश्रित के संबंध की शिक्षा देती है। भारतीय जीवनशैली में प्रकृति अपने भीतर संपूर्ण प्राणी जगत को संरक्षण देती है। भारतीय जीवनशैली के अनुसार ‘प्रकृति’ किसी व्यक्ति, समाज, राज्य, या देश, की निजी संपत्ति नहीं होती। भारतीय जीवनशैली से युक्त हमारे देश का प्रकृति के साथ सदियों से एक भिन्न एवं अनोखा संबंध रहा है। विश्व की प्राचीनतम सभ्यता होने के कारण भारतीयों का जीवन अनुभव अन्य सभ्यताओं की अपेक्षा प्रकृति के समीप अधिक रहा है।

दुनियाँ की चिंता ग्लोबल वार्मिंग –

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के अंतर्राष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट “रेड कोड”, जो ग्लोबल वार्मिंग के बारे में स्पष्ट चेतावनी है, से पूरी दुनियाँ में चिंता की लहर दौड़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2040 तक ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री बढ़ चुका होगा। भारत के संदर्भ में तो ग्लोबल वार्मिंग की यह चेतावनी अधिक गंभीर है क्योंकि दूसरे महासागरों की तुलना में हिन्द महासागर का तापमान अधिक तेजी से बढ़ रहा है। वरिष्ठ जलवायु वैज्ञानिक और रिपोर्ट की सहलेखक लिंडा मर्न्स के औसर इससे बचाव का कोई रास्ता नहीं है। फिर भी, आज सभी एकमत हैं कि पृथ्वी पर मंडरा रहे इस भयानक संकट को टालने के लिए तत्काल कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

चूंकि पर्यावरण प्रकृति का अभिन्न अंग है और पर्यावरण संरक्षण को लेकर दुनियाँ भर में जागरूकता अभियान भी चल रहे हैं। प्रकृति का जो मह्त्व पश्चिमी देश आज समझ रहे हैं और उसके संरक्षण के लिए अत्यधिक चिंतित हैं, वह महत्व भारतीय जीवनशैली में हजारों-लाखों वर्ष पूर्व हमारे देश के ऋषि-मुनियों द्वारा वेद, उपनिषद, शास्त्र महाकाव्य आदि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप में परिलक्षित किया गया है। भारतीय जीवनशैली में हमारे तत्वज्ञानी ऋषि-मुनियों ने हजारों-लाखों वर्ष पहले ही यह पता लगा लिया था कि प्रत्येक जीव का शरीर पांच महाभूतों- आकाश, वायु, अग्नि तथा पृथ्वी से ही निर्मित है और वे इस बात को भलीभाँति जानते थे कि यदि इन पंच तत्वों में से एक भी प्रदूषित हो गया तो इसका दुष्प्रभाव समस्त मानव जाति को प्रभावित करेगा क्योंकि ये पंचमहाभूत ही समस्त समस्त सृष्टि का आधार हैं।

पंचमहाभूतों से सृष्टि का निर्माण –

महाभारत के शांति पर्व में भारतीय जीवनशैली के विषय में उल्लेख है कि “इत्यैतैः पञ्चभिभूतैयुक्तं स्थावरजंगमम्।” अर्थात संपूर्ण चल और अचल जगत इन पांच महाभूतों से बना हुआ है। इन पांच महाभूतों में क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गन्ध गुण विद्यमान होते हैं। भीष्म पर्व के अनुसार, गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां भूमिः प्रधानतः।।”, अर्थात, आकाश में 1 गुण ‘शब्द’, वायु में 2 गुण ‘शब्द एवं स्पर्श’, तथा अग्नि में 3 गुण ‘शब्द, स्पर्श, एवं, रूप’, जल में 4 गुण, शब्द, स्पर्श, रूप, एवं रस विद्यमान हैं किन्तु पृथ्वी में पांचो गुण व्याप्त होने के कारण पृथ्वी पंच महाभूतों में है और पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन भी श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है।