Saturday, April 25, 2026
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“रश्मिरथी” से प्रेरणा ले जातिवाद से रहे दूर:मुख्यमंत्री

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"रश्मिरथी" से प्रेरणा ले जातिवाद से रहे दूर:मुख्यमंत्री
"रश्मिरथी" से प्रेरणा ले जातिवाद से रहे दूर:मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कालजयी काव्यकृति ‘रश्मिरथी’ के हीरक जयन्ती वर्ष एवं उनकी 52वीं पुण्यतिथि के अवसर पर तीन दिवसीय ‘रश्मिरथी पर्व’ के शुभारम्भ कार्यक्रम को सम्बोधित किया। स्मारिका ‘रश्मिरथी से संवाद’ का विमोचन तथा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के सुपौत्र श्री रित्विक उदयन को सम्मानित किया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ साहित्य के शलाका पुरुष थे, दिनकर जी की रचनाआें में राष्ट्रीयता का भाव प्रदर्शित होता। धनधान्य से परिपूर्ण भारत सदैव से ही दुनिया की एक ताकत रहा, हमारी कुछ कमजोरियां भी थीं, जिन पर दिनकर जी ने प्रहार किया। यदि भारत की स्वाधीनता को अनन्त काल तक बनाये रखना है तथा आत्मनिर्भर और विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करना, तो जातिवाद से दूर रहना होगा। ‘रश्मिरथी’ जैसी कृतियां आज की पीढ़ी के लिए नयी प्रेरणा, इनका मंचन विभिन्न स्थानों पर किया जाना चाहिए। तीन दिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन स्वामी विवेकानन्द तथा तीसरे दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर आधारित नाट्य मंचन व श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं पर आधारित नृत्य-नाटिका ‘अटल स्वरांजलि’ का आयोजन होगा। ज्ञान को विज्ञान के साथ जोड़कर स्वामी विवेकानन्द ने तत्कालीन समाज को समय के अनुरूप तैयार किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणपति महोत्सव के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना उत्पन्न की, जिससे राष्ट्र चेतना को नयी ऊँचाइयां मिलीं। लखनऊ लम्बे समय तक श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कर्मभूमि रही, अटल जी के जन्म शताब्दी वर्ष में लखनऊ में ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ का निर्माण कराया गया। राष्ट्र को किस दिशा में ले जाना है, साहित्यिक कृतियां इसका आधार बनेगी, यह धारा अनवरत आगे बढ़नी चाहिए। मुख्यमंत्री ने श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानन्द, श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री ने काव्यकृति ‘रश्मिरथी’ पर आधारित नाट्य मंचन का अवलोकन किया, कलाकारों तथा आयोजकों को सम्मानित किया।

लखनऊ। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ साहित्य के शलाका पुरुष थे। दिनकर जी की जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजती थीं। यह उनकी लेखनी के माध्यम से तथा उनकी कालजयी काव्यकृतियों में पिरोए शब्दों के माध्यम से यह हम सभी को देखने को मिलता है। दिनकर जी की रचनाआें में राष्ट्रीयता का भाव प्रदर्शित होता था। आज दिनकर जी की पुण्यतिथि उनकी साहित्यिक सेवा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है। मुख्यमंत्री राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कालजयी काव्यकृति ‘रश्मिरथी’ के हीरक जयन्ती वर्ष एवं उनकी 52वीं पुण्यतिथि के अवसर पर समतामूलक, समरस, समावेशी एवं सांस्कृतिक समाज के निर्माण हेतु तीन दिवसीय ‘रश्मिरथी पर्व’ के शुभारम्भ अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने स्मारिका ‘रश्मिरथी से संवाद’ का विमोचन किया। उन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी के सुपौत्र श्री रित्विक उदयन को सम्मानित किया।


मुख्यमंत्री ने श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानन्द,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्र पर पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम में काव्यकृति ‘रश्मिरथी’ पर आधारित नाट्य का मंचन किया गया, जिसका मुख्यमंत्री जी सहित सभी उपस्थित गणमान्यजन ने अवलोकन किया। नाट्य प्रस्तुति के समापन के उपरान्त मुख्यमंत्री जी ने कलाकारों तथा आयोजकों को सम्मानित किया। ज्ञातव्य है कि तीन दिवसीय ‘रश्मिरथी पर्व’ का आयोजन संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश एवं राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। धनधान्य से परिपूर्ण भारत सदैव से ही दुनिया की एक ताकत रहा है। बल, बुद्धि व वैभव में भारत का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन हमनें सैकड़ों वर्षों की गुलामी भी सही है। हमारी कुछ कमजोरियां भी थीं, जिन पर दिनकर जी ने प्रहार किया। दिनकर जी ने ‘रश्मिरथी‘ में लिखा है कि ‘ऊंच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है’।


उन्होंने जातिवाद पर प्रहार करते हुए कहा कि ‘ मूल जानना बड़ा कठिन है, नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का, पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ’जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर क्रूर’। दिनकर जी ने अपनी कृति ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में कहा कि ‘जब किसी जाति का अहं चोट खाता है, पावक प्रचण्ड होकर बाहर आता है, यह वही चोट खाये स्वदेश का बल है, आहत भुजंग है, सुलगा हुआ अनल है’। यह पंक्तियां प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा है। यदि भारत की स्वाधीनता को अनन्त काल तक बनाये रखना है तथा आत्मनिर्भर और विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करना है, तो जातिवाद से दूर रहना होगा।


दिनकर ने कहा था कि ‘ सच है विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटो में राह बनाते हैं’। यह पंक्तियां सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने देश व समाज की चेतना को जागृत कर समाज को एकजुट किया। अपनी काव्यकृतियों के माध्यम से वह जागरूकता की अलख जगाते रहे। जब भारत के लोकतंत्र को चुनौती दी गयी थी, तब उन्होंने कहा था कि ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’। शब्द किस रूप में पिरोए जाएं कि वह प्रत्येक व्यक्ति के मन में राष्ट्र-चेतना जागृत करने वाले मंत्र बन जाएं, यह गुण दिनकर जी में था। ‘रश्मिरथी’ कर्ण की गाथा है, जो अपनी पहचान के लिए मोहताज था। रश्मिरथी ने कर्ण के गुणों की व्याख्या कर प्रत्येक व्यक्ति को सोचने के लिए मजबूर किया है।


मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘रश्मिरथी’ जैसी कृतियां आज की पीढ़ी के लिए नयी प्रेरणा है। इसका मंचन विभिन्न स्थानों पर किया जाना चाहिए। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन स्वामी विवेकानन्द पर आधारित नाट्य मंचन किया जाएगा। स्वामी विवेकानन्द जी प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने वैदिक परम्परा को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया। ज्ञान को विज्ञान के साथ जोड़कर स्वामी विवेकानन्द जी ने तत्कालीन समाज को समय के अनुरूप तैयार किया। वह भारत की चेतना को जागृत करने के लिए पूरी ताकत लगाने वाले एक संन्यासी थे। उन्होंने शिकागो की धर्मसभा के बाद लखनऊ, अयोध्या, काशी सहित उत्तर प्रदेश के कई स्थलों की यात्रा की थी।


कार्यक्रम के तीसरे दिन 26 अप्रैल को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर आधारित नाट्य मंचन किया जाएगा। सन् 1916 में लोकमान्य तिलक ने भारत की स्वाधीनता के लिए ‘स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’ का उद्घोष लखनऊ की धरती से किया था, जो भारत की आजादी का मंत्र बना। उन्होंने महाराष्ट्र में गणपति महोत्सव के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना उत्पन्न की, जिसके द्वारा राष्ट्र चेतना को नयी ऊचाइयां मिलीं। उनकी स्मृति में वर्ष 2017 में लखनऊ में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें तिलक जी के परिवार के सदस्यों को आमंत्रित किया गया था।


मुख्यमंत्री जी ने कहा कि लखनऊ लम्बे समय तक श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कर्मभूमि रही है। अटल जी के जन्म शताब्दी वर्ष में लखनऊ में ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल’ का निर्माण कराया गया है। कार्यक्रम के तीसरे दिन ही श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं पर आधारित नृत्य-नाटिका ‘अटल स्वरांजलि’ का आयोजन होगा। संस्कृति विभाग के कलाकारों, भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय व अन्य संस्थानों के युवाओं को इस कार्यक्रम में सहभागी बनाया जाना चाहिए। इससे वह साहित्य के बारे में जान सकेंगे, क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है। राष्ट्र को किस दिशा में ले जाना है, साहित्यिक कृति इसका आधार बनेगी और इनसे हम सभी को प्रेरणा प्राप्त होगी। यह धारा अनवरत आगे बढ़नी चाहिए।


उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि भारत की महान संस्कृति और शौर्य को दुनिया के समक्ष प्रदर्शित करने का निर्णय सराहनीय है। रश्मिरथी जब भी पढ़ी जाएगी, उसमें कुछ न कुछ नया सीखने को मिलेगा। कर्ण जैसे पात्रों की भूमिका हमें बताती है कि विपरीत परिस्थितियों में हमे स्वयं को खड़ा ही नहीं रखना है, बल्कि देश के सामने एक नई लकीर भी खींचनी है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया गीता का उपदेश आज भी जन-जन का उद्घोष बना हुआ है। इस अवसर पर कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह, राज्यसभा सांसद डॉ0 दिनेश शर्मा, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, अपर मुख्य सचिव पर्यटन एवं संस्कृतिअमृत अभिजात, दिनकर स्मृति न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।