
भारतीय संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला मानता है। अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। साथ ही संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए निवारक निरोध की व्यवस्था को भी स्वीकार किया। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके द्वारा भविष्य में किए जा सकने वाले संभावित कृत्य के आधार पर निरुद्ध करना है, न कि किसी अपराध के लिए दंडित करना। किंतु समय के साथ यह प्रश्न गंभीर होता गया है कि क्या निवारक निरोध के असाधारण प्रावधान वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा के लिए प्रयुक्त हो रहे हैं या वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने के उपकरण बनते जा रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने इसी बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है।
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत की गई एक निरोधात्मक कार्रवाई को निरस्त करते हुए कहा कि राज्य सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्याओं और सार्वजनिक व्यवस्था के गंभीर संकट के बीच अंतर करने में विफल रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक आपराधिक घटना सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करती। यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध सामान्य आपराधिक कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई संभव है, तो निवारक निरोध का सहारा लेना संविधान प्रदत्त स्वतंत्रताओं के विपरीत होगा। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि निवारक निरोध की शक्तियाँ असाधारण हैं और उनका प्रयोग अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से इस सिद्धांत को दोहराती रही है कि “कानून-व्यवस्था” और “सार्वजनिक व्यवस्था” समानार्थी नहीं हैं। किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अपराध या स्थानीय स्तर की अशांति कानून-व्यवस्था का विषय हो सकती है, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था का प्रश्न तब उत्पन्न होता है जब व्यापक जनजीवन, सामाजिक शांति और समुदाय की सामान्य गतिविधियाँ प्रभावित हों। किंतु व्यवहार में प्रशासन अनेक बार इस भेद को अनदेखा कर देता है और सामान्य आपराधिक मामलों में भी निवारक निरोध का सहारा लेता है।
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भारत में निवारक निरोध की संवैधानिक मान्यता अनुच्छेद 22 के प्रावधानों के अंतर्गत दी गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद से ही विभिन्न कानूनों—निवारक निरोध अधिनियम, आंतरिक सुरक्षा संधारण अधिनियम, विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम तथा विभिन्न राज्य स्तरीय निरोध कानूनों—के माध्यम से इस शक्ति का प्रयोग किया जाता रहा है। इन कानूनों का मूल उद्देश्य आतंकवाद, तस्करी, सांप्रदायिक हिंसा, संगठित अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर खतरों से निपटना था। ऐसे मामलों में सामान्य आपराधिक प्रक्रिया अक्सर पर्याप्त नहीं होती क्योंकि अपराध घटित होने की प्रतीक्षा करना राज्य और समाज के लिए अत्यधिक जोखिमपूर्ण हो सकता है।
निवारक निरोध के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियाँ अत्यंत जटिल हो चुकी हैं। आतंकवादी नेटवर्क, साइबर अपराध, सीमा पार से प्रायोजित हिंसा तथा संगठित अपराध समूह ऐसे खतरे उत्पन्न करते हैं जिनसे निपटने के लिए राज्य को पूर्व-निवारक उपायों की आवश्यकता होती है। कई बार खुफिया सूचनाएँ उपलब्ध होती हैं, किंतु वे न्यायालय में अभियोजन हेतु पर्याप्त साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं की जा सकतीं। ऐसे में निवारक निरोध सार्वजनिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
इसके बावजूद, निवारक निरोध को लेकर गंभीर चिंताएँ लगातार सामने आती रही हैं। पहली समस्या इसकी प्रकृति में ही निहित है। सामान्य आपराधिक न्याय प्रणाली अपराध और साक्ष्य के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि निवारक निरोध आशंका और प्रशासनिक संतोष पर आधारित होता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को किसी सिद्ध अपराध के लिए नहीं, बल्कि संभावित भविष्य की गतिविधियों के आधार पर स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ स्वाभाविक तनाव उत्पन्न करती है।
दूसरी समस्या प्रशासनिक विवेकाधिकार के अत्यधिक विस्तार से जुड़ी है। निरोध आदेश प्रायः जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं। यद्यपि बाद में सलाहकार बोर्ड और न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था मौजूद है, फिर भी प्रारंभिक स्तर पर निर्णय काफी हद तक प्रशासनिक संतोष पर निर्भर करता है। अनेक मामलों में यह पाया गया है कि निरोध आदेशों की भाषा यांत्रिक होती है और उनमें वास्तविक खतरे का पर्याप्त विश्लेषण नहीं होता।
तीसरी चिंता यह है कि निवारक निरोध का उपयोग कई बार नियमित आपराधिक न्याय प्रक्रिया की कमियों को छिपाने के लिए किया जाता है। यदि पुलिस पर्याप्त साक्ष्य एकत्र नहीं कर पाती, अभियोजन कमजोर है या आरोपी को जमानत मिल जाती है, तो उसके विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसे कानून लगा दिए जाते हैं। इससे संविधान द्वारा प्रदत्त जमानत और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का व्यावहारिक महत्व कम हो जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी अपने हालिया निर्णय में इसी प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है।
चौथी समस्या मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर इसके प्रभाव से संबंधित है। निरुद्ध व्यक्ति को लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत में रखा जा सकता है। यद्यपि उसे निरोध के आधारों की जानकारी देने और प्रतिनिधित्व का अवसर देने की व्यवस्था है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सार्वजनिक हित के नाम पर कई सूचनाएँ उससे साझा नहीं की जातीं। परिणामस्वरूप प्रभावी प्रतिरक्षा का अधिकार सीमित हो जाता है।
आलोचकों का यह भी तर्क है कि निवारक निरोध का प्रयोग कभी-कभी राजनीतिक असहमति, विरोध प्रदर्शनों या प्रशासनिक आलोचना को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। लोकतंत्र में राज्य की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध नागरिक अधिकारों का हिस्सा हैं। यदि इन्हें सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताकर निरोधात्मक कार्रवाई की जाए तो यह संवैधानिक लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर कहा है कि राज्य की आलोचना और सार्वजनिक व्यवस्था के वास्तविक संकट के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।
हालाँकि यह भी स्वीकार करना होगा कि निवारक निरोध को पूरी तरह समाप्त करने का दृष्टिकोण व्यावहारिक नहीं है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ वास्तविक हैं। सांप्रदायिक दंगे, आतंकवादी गतिविधियाँ, मादक पदार्थों की तस्करी तथा संगठित अपराध कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जहाँ त्वरित निवारक हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। इसलिए समस्या स्वयं निवारक निरोध के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग और अपर्याप्त जवाबदेही में निहित है।
यही कारण है कि न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि निवारक निरोध की शक्तियों की संकीर्ण व्याख्या की जानी चाहिए। न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान का मूल मूल्य है और किसी भी प्रकार की निरोधात्मक कार्रवाई कठोर न्यायिक परीक्षण के अधीन होनी चाहिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इसी न्यायिक परंपरा को आगे बढ़ाता है और प्रशासन को यह संदेश देता है कि असाधारण शक्तियों का प्रयोग सामान्य प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं किया जा सकता।
आगे बढ़ते हुए कुछ सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। निरोध आदेशों के लिए अधिक कठोर कारण-लेखन अनिवार्य किया जाना चाहिए। सलाहकार बोर्डों की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। निरोध के प्रत्येक मामले की समयबद्ध न्यायिक समीक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि किसी मामले में निरोध आदेश न्यायालय द्वारा निरस्त किया जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। साथ ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को “कानून-व्यवस्था” तथा “सार्वजनिक व्यवस्था” के बीच संवैधानिक अंतर के बारे में नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
निष्कर्षतः, निवारक निरोध भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का एक अपवादात्मक किंतु मान्य उपकरण है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना है। किंतु जब इसका प्रयोग नियमित आपराधिक न्याय प्रक्रिया के विकल्प के रूप में या प्रशासनिक सुविधा के लिए किया जाने लगता है, तब यह नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इस तथ्य की पुनर्पुष्टि करता है कि लोकतंत्र में राज्य की सुरक्षा और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा आवश्यक है, किंतु यह लक्ष्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अनावश्यक बलि देकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। एक संवेदनशील, जवाबदेह और संविधानसम्मत निवारक निरोध व्यवस्था ही इस संतुलन को सुनिश्चित कर सकती है।



