प्रेम-डोर जब थाम ली…

प्रेम केवल साथ चलने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने की सबसे सुंदर अनुभूति है। जब रिश्ते विश्वास, सम्मान और समर्पण की डोर से बंधते हैं, तभी उनका वास्तविक अर्थ सामने आता है। सच्चा प्रेम हर परिस्थिति में साथ निभाने की प्रेरणा देता है और जीवन को नई दिशा देता है। “प्रेम-डोर जब थाम ली…” तब एहसास हुआ कि प्रेम सिर्फ़ एक भावना नहीं, बल्कि दो दिलों की अनमोल साझेदारी है।

प्रेम केवल संग चलना नहीं, मन से मन का मेल है। विश्वास, समर्पण, सम्मान से सजा हर एक खेल है॥

जब रिश्तों की डोर स्नेह से हर पल जुड़ जाती है।जीवन की हर मुश्किल भी मुस्कुराकर कट जाती है॥

सच्चा प्रेम शब्दों से नहीं, एहसासों से बोलता है।टूटे मन को भी अपनाकर, उम्मीदों से जोड़ता है॥

प्रेम-डोर जब थाम ली… तब यह जाना संसार। दो दिल जब एक हो जाएँ, वही प्रेम का विस्तार॥

प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान। अहं तनिक जो बीच में, उजड़े सब उद्यान॥

धागे के दो छोर हैं, दो जीवन के द्वार। एक सँभाले याद को, दूजा दे विस्तार॥

कंपन-कंपन कह रहा, जीवन रचा विधान। प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

खींचा यदि अहंकार ने, टूटी हर पहचान। जीत गए शब्दों मगर, हार गया इंसान॥

झुककर जिसने बाँध ली, वही रहता महान। प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

प्रेम न केवल भाव है, जीवन का आधार। सूखे मन में भी जगा, हरियाला संसार॥

बाँट सका जो नेह को, पाया अमृत-दान। प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

विश्वासों की उँगलियाँ, थामे जब विश्वास। अदृश्यों में दिखने लगे, सृष्टि-हृदय के पास॥

ब्रह्मांडों की डोर भी, प्रेममयी पहचान। प्रेम-डोर जब थाम ली, जुड़ते सकल जहान॥

प्रेम का सबसे सुंदर रूप वह है, जहाँ अपनापन शब्दों से नहीं, एहसासों से झलकता है। रिश्ते तब तक मजबूत रहते हैं, जब तक उनमें विश्वास, सम्मान और समर्पण जीवित रहता है। आइए, प्रेम की डोर को स्नेह, संवेदनाओं और अपनत्व से हमेशा मजबूत बनाए रखें।

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