ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू मंदिर के मिलने लगे सबूत

ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू मंदिर के सबूत मिलने से अब वामपंथी लेखन की पोल खुल रही है। यही स्थिति आगरा में ताजमहल और मथुरा में कृष्ण जन्म भूमि प्रकरण में देखने को मिलेगी।सौहार्द के लिए जरूरी है हिन्दू धार्मिक स्थलों का सम्मान लौटाया जाए।

एस0 पी0 मित्तल

सब जानते हैं कि हिन्दुस्तान पर करीब 600 वर्षों तक मुगल शासकों ने शासन किया। आक्रांता माने जाने वाले मुगलों ने किस नीयत से शासन किया, यह किसी से छिपा नहीं है। न केवल बड़े पैमाने पर जबरन धर्मांतरण करवाया बल्कि हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को भी तोड़ा गया। 600 वर्षों के मुगलों के शासन के बाद 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने शासन किया। अंग्रेजों के शासन में ही वामपंथी विचारधारा पनपी। इस विचारधारा के लेखकों ने वो ही लिखा जो अंग्रेजों ने चाहा। अंग्रेजों अपने शासन में शांति चाहते थे, इसलिए मुगलों ने अत्याचारों के इतिहास को दबा दिया गया। वामपंथी लेखकों ने अत्याचारी मुगलों की छवि एक उदार शासकों की बनाने की पूरी कोशिश की। न केवल जबरन धर्मांतरण पर पर्दा डाला गया, बल्कि मुगलों ने मंदिर तोड़ने को भी जायज ठहराया गया।

1947 में जब देश आजाद हुआ, तब इतिहास को सुधारने और हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों का सम्मान लौटाने की जरुरत थी। यह जरुरत इसलिए भी जरूरी थी कि मोहम्मद अली जिन्ना ने धर्म के आधार पर पाकिस्तान ले लिया था, लेकिन इसे अफसोसनाक ही कहा जाएगा कि जिन लोगों ने 60 वर्षों तक हिंदुस्तान पर शासन किया, उन्होंने अंग्रेजों की नीति को ही जारी रखा। इतिहास में वामपंथी विचारधारा को ही बढ़ावा दिया। लेकिन अब जब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, बनारस में ज्ञानवापी मस्जिद, आगरा में ताजमहल प्रकरण सामने आ रहे हैं तो वामपंथी लेखन की पोल खुल रही है। सबूत ज्ञानवापी मस्जिद के हो या कृष्ण जन्म भूमि के सभी से पता चलता है कि मुगल शासकों ने हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को क्षतिग्रस्त किया। वह भी धर्म के आधार पर। अब वामपंथी विचारधारा के लोग ही कह रहे हैं कि पुराने मामलों को उजागर कर देश का साम्प्रदायिक माहौल खराब किया जा रहा है। ऐसा कहने में कांग्रेस के नेता भी शामिल हैं। तो क्या सच्चाई सामने आने से साम्प्रदायिक तनाव हो जाएगा? होना तो यह चाहिए कि हिन्दू धार्मिक स्थलों को सम्मान से लौटा कर देश में सौहार्द का माहौल बनाया जाए। इस मामले में बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के रुख की प्रशंसा करनी होगी। कमेटी के पदाधिकारियों ने बिना किसी विवाद के न्यायालय द्वारा गठित सर्वे की टीम को सहयोग किया है।

असल में देश का आम मुसलमान हिंदुस्तान में अमन और सुकून के साथ रहना चाहता है। आम मुसलमान को भी पता है कि हम हिन्दुओं के साथ रह कर कितना सुरक्षित है, उतना किसी मुस्लिम राष्ट्र में सुरक्षित नहीं रह सकते। यदि मुस्लिम राष्ट्र में रहने से ही मुसलमान सुरक्षित होता तो फिर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश जैसे मुस्लिम राष्ट्रों में आए दिन विस्फोट नहीं होते। क्या इन विस्फोटों में कोई हिन्दू या ईसाई मरा जा रहा है? इन विस्फोटों में मुसलमान ही मर रहा है। दूसरी तरफ हिंदुस्तान के मुसलमान हैं जो पूरे मान सम्मान के साथ रह रहे हैं। जो कट्टरपंथी मुस्लिम नेता हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलते हैं उन्हें कानून का संरक्षण मिला हुआ है। हिन्दुओं की उदारता का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि लाखों हिन्दू मुस्लिम सूफी संतों की दरगाह और मजारों पर जाकर मन्नत मांगते हैं। अब समय आ गया है, जब आम मुसलमान को कट्टरपंथियों का विरोध करना ही चाहिए। यदि कट्टरपंथी हावी होंगे तो हिंदुस्तान में सुकून के साथ रहने वाले मुसलमान को भी नुकसान होगा।

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